Thursday, February 4, 2016

जटिल जरूरत ।

परमेश्वर दाता रहा
जगत अनुभूति से रहस्य जाना
नहीं देखा कभी
अपनी नजर उसे देते
दाता बनकर
कहते जाते घने विवेक विख्यात
ईश्वर अदृश्य बना
देता रहता सामर्थ्य शक्ति
कि हो सके जरूरत पूरी
ओर इसी राह
आती रहती परीक्षाऐ
देनी अनिवार्य
आगे कि जरूरत जिन्दगी जीने की
सफलता पाये
होगी आसान उपलब्धि पाने निमित्त
जीवन की जटिलता हैं परीक्षा
यही होता आकलन
व्यक्तित्व का
ज्ञान व चेतना का
सूझ व क्षमता का
यही प्रकटती हैं निष्पक्षता
मौनता के साथ
समूचा व्यक्तित्व लिए
यही हैं जीवन सूत्र
घना जटिल
जिसे समझते सुलझाते
कम पड जाती मानव की जिन्दगी
कहना पडेगा
समस्त जीवन हैं
एक जटिल परीक्षा
सफल परीक्षार्थी
नहीं आता फिर
मानव जन्म लेकर
परीक्षार्थी बनकर ।
छगन लाल गर्ग।