Wednesday, February 10, 2016

वहम मोहब्बत ।


अच्छा लगता
जब सोचता हूँ तुम्हें
गुजरते वक्त का
 नहीं रहता माप
कब आया कि गया
ख्याल खोता
ख्वाब भाता तुम्हारा
एक अजीब शमा
बंधता निरंतर
तुम्हारी खुशबू देती
रूपमय बिम्ब तुम्हारा
कि मदहोशी जीता जाता
केवल  ख्यालो की दुनिया
देखते ही होता अधीर
पाने तुझे कि हमसफर बने
नहीं धुऑ पर उठता भीतर
ऑशंकाओ का धुऑ
खालिश मे अभी मोहब्बत का
दर्द आया कहां हैं
अनहोनी का दौर अभी बाकी
मोहब्बत अभी दर्द दौर
गुजरनी बाकी हैं
मैं ओर तू का भेद गहराया हैं
जिस्म से ज्यादा
दिल का इम्तहान अभी बाकी हैं
अब रहने दे इश्क के परवाने
अभी वहमे मोहब्बत
सुबह ओर शाम मेरा हर कदम
की ठावस बाकी हैं ।
छगन लाल गर्ग।