अब नहीं फूटती
आनंद की उर्मी
प्राण की गहरी उष्मा का
अंश पाये
अब बदले बदले लगते
आनंद के छीटे
आधुनिक रंग रूप मे
हो चुके अधिक लुभावने
लोभ ओर मोह की चमक
हो उठी चमकिली
सभी शास्वत चमक फीकी सी
धूधली हो चूकी
अब नहीं तडप देता
अहंकार
ओर चोट नहीं पाता प्रेम
अब आत्मा हो चूकी रूग्ण
कि पा सके दर्द
मिलते हैं रूपक ओर शालीन
चंचल
देते रहते अलौकिक उन्माद
प्रेम का घनत्व
डूबता हूँ आकंठ
हिलोरे ही हिलोरे
घेरती असीम अचेतना आने तक
नव युग बोध का
नवल स्नेह बोध
प्रगति मय उपकरणों से
संस्कारित हुआ
देता अब मेरे जीवन मे
अद्भुत उर्मी ।
छगन लाल गर्ग ।
आनंद की उर्मी
प्राण की गहरी उष्मा का
अंश पाये
अब बदले बदले लगते
आनंद के छीटे
आधुनिक रंग रूप मे
हो चुके अधिक लुभावने
लोभ ओर मोह की चमक
हो उठी चमकिली
सभी शास्वत चमक फीकी सी
धूधली हो चूकी
अब नहीं तडप देता
अहंकार
ओर चोट नहीं पाता प्रेम
अब आत्मा हो चूकी रूग्ण
कि पा सके दर्द
मिलते हैं रूपक ओर शालीन
चंचल
देते रहते अलौकिक उन्माद
प्रेम का घनत्व
डूबता हूँ आकंठ
हिलोरे ही हिलोरे
घेरती असीम अचेतना आने तक
नव युग बोध का
नवल स्नेह बोध
प्रगति मय उपकरणों से
संस्कारित हुआ
देता अब मेरे जीवन मे
अद्भुत उर्मी ।
छगन लाल गर्ग ।