Wednesday, February 10, 2016

क्षण बोध ।

हाँ अभी तो मौजूद हूँ
तुम्हारे बीच
सपनों का देता हूँ हवाला
जीने हैं आगत मे
जानते हो
आज हूँ तो कहता हूँ
तुम हो तो सुनते हो
अन्यथा सब जुटे हैं
सपने पाने मे
कि खुली ऑखो देखने मे
ठीक मेरी तरह
अब देखते हो सामने
फूल खिला
पते हरे फूल लाल
हवाऐ चलती
ओर देखो थोड़ी दूर
धूधले छाया लिऐ
सिर ऊँचा किये पहाड़
लगता हैं ध्यानस्थ हैं
अस्तित्व चिन्तन मे
मेरी तरह
सोच लेता हूँ इस पल
अभी तो हूँ
जेसे कि प्रकृति का यह चित्र
ओर महसूस करता
भीतर भीतर
जैसे समुद्र मे लहर तंरगित
हृदय मे धड़कन
ठीक वैसे ही
यह क्षण भी साक्षी
मेरे होने का
तुम्हारी तरह प्रकृति की तरह
ओर यह अस्तित्व
शायद हो ईश्वरीय ।
छगन लाल गर्ग ।