Thursday, November 1, 2018

क्षण-भंगुरता (दोहे)


||दोहे||

अकड़ रहे हम अस्मिता, शून्य विवर संसार!
भ्रमित पवन सी जिंदगी, ले लो नेह अपार !!१

जाना  कब  है सोच मे , लगे नही अनुमान!
जीने का पल आज है,आगे का अभिमान!!२

देह रेत दीवार है, या फिर कुसुम कपोल!
मृत्यु बवंडर  क्रूर है, लेत प्राण अनमोल!!३

रिश्तो  के संसार मे, मोह भरा जंजाल!
नदी नीर के वेग सा ,छूटे साथ विशाल!!४

कच्चा तन आकार है, कागा छल अतिसार!
सत्य बड़प्पन छोड़ के, जीता मन अभिसार!!५

सतगुरु लौ है रश्मि की, परम ब्रह्म   अवतार!
रैन राग अब त्याग दे ,  प्राण  चहे   करतार!!६

चमक दमक पल देह रे,  धोखे  मे संसार!
मोह मदन रस छोड़ दे , जाना  है  उस पार! ७

आँखो देखा सत्य है, भीतर किया विचार!
जो भी होता अन्य  है, मै भी खड़ा कतार!!८

भज प्राणी चित राम को, केवल यही उपाय!
तज माया सच जान के, साधो शरण सुहाय !!९

सतगुरु मेरे दीप है, रोशन चित संसार !
दिव्य ज्योति मे लीन है,श्वासों का व्यापार!!१०

जाग मना अब भोर है, कर्म धर्म चहुँओर!
सतगुरु रज मे सार है, माया है  चितचोर!!११

छगन लाल गर्ग "विज्ञ"!

सवैया


||मदिरा सवैया ||
७भगण १ गुरू २२ वर्ण !

आज विचार अचेत हुआ , अब भक्ति जगी मिटती रजनी !
नेह सुधा बरसे विधु से ,भव सागर पार तरे तरनी!
अंतर मंगल भाव भरे ,जलजात खिले चित की धरनी!
देह विकार निशा जलती , गुरु ज्ञान बसा नगरी अपनी!!१

छगन लाल गर्ग "विज्ञ "!


||दुर्मिल सवैया||
८सगण २४ वर्ण !

नव रूप उषा नभ मे दिखती ,मधु रश्मि भरे मृदु रंग धरे !
नवनीत प्रभा भर पावनता , तल सुन्दर पीत उजास भरे !
घन श्याम बडे अब मोहित है  , चित पावन धार सरिता निकले !
गुरु ज्ञान सुधा रस पान किया, नव रूप धरातल दीप जले !!२

छगन लाल गर्ग "विज्ञ" !!
 ||दुर्मिल सवैया||

विधान - ८ सगण  , २४ वर्ण !

तन ताप जले चित आग लगे , जब औरन को  सुविधा बढती!
सब लोग लगे अब लूट रहे , हर पीर  बढे उनकी गलती !
छवि दाग लखे चित पीड़ित है , यह देख बड़ी  दुविधा रहती !
मनुवा सुख खोज गुरू रज मे , तज लोभ वही खुशियाँ बसती !!३

छगन लाल गर्ग "विज्ञ"!
||मानिनी सवैया||
७ जगण व लघु गुरु कुल २३वर्ण ।

अधीर हिया जग देख विकास, चहे सुख चैन अनंत धरा।
विकार बढे मन दौड लगाय , लगा रस भौतिक मोह खरा ।
नही धन तोष भरे मन कोश , सदा चित चाहत और जरा।
तनाव मिटे गुरु छांव सदैव, रहे मन पावन भक्ति भरा ।।४

छगन लाल गर्ग "विज्ञ"!

||गंगोदक सवैया|| ++++भाषा सहोदरी!

८ रगण २४ वर्ण।

प्राण मे प्रीत है हिंद की लेखनी,  जिंदगी की यही साधना सत्य है!
आस की रोशनी घेरती भावना , साथ है शब्द का भीतरी कथ्य है!
जन्म से ढालती मानवी प्रेरणा , अंश भाषा रहे प्रेम का लक्ष्य है !
सोच लो राष्ट्र की बात ही सार है , भाष्य हो देश का मूल ये तथ्य है !!५

मतगंयद सवैया
७ भगण २ गुरु  २३ वर्ण
नाम सहोदर पावन सुन्दर, काम क्रिया रचना हितकारी !
प्रेम विशाल सभी कवि साधक ,पंथ बढे कविता शुभकारी !
लेखक विश्व सुशोभित अंचल , हिन्द सरोज पले गुण धारी !
मानस मंगल भाव धरे मन , संग मनोहर  है  सुखकारी !!६

वाम सवैया
७ जगण १यगण २४ वर्ण ।

सुधा रस पान सहोदर संग , मिले यश हिन्द विचारक पाया !
भरो गगरी मति सार अथाह , खिले पट पावन भीतर माया !
जगो पल साधक नागर नेह , जले सब तामस गागर काया !
महा उपकार हुआ जय कांत , उजास मिला चित शीतल छाया !!७

मदिरा सवैया ।

७भगण १ गुरू २२ वर्ण ।

नेह अपार विराट हुआ , जब आस पले जय मे ढलती ।
हिन्द सुधा बरसे विधु से , जग मे तप की महिमा पलती।
भीतर सुन्दर शब्द भरे  , नवनीत प्रभा खिलने लगती।
काव्य सहोदर कंचन से , रवि रश्मि भरी लहरे बहती ।।८


||दुर्मिल सवैया||
८सगण २४ वर्ण !

नव रूप उषा नभ मे दिखती ,मधु रश्मि भरे मृदु रंग धरे !
नवनीत प्रभा भर पावनता , तल सुन्दर पीत उजास भरे !
पल आज अलौकिक मोहित है ,नित लेखक लेख कविता निकले !
जय कांत प्रभा कर ज्योति मिले, नव रूप विशारद दीप जले !!९

छगन लाल गर्ग "विज्ञ" !!













      










सवैया छंद


||मदिरा सवैया ||
७भगण १ गुरू २२ वर्ण !

आज विचार अचेत हुआ , अब भक्ति जगी मिटती रजनी !
नेह सुधा बरसे विधु से ,भव सागर पार तरे तरनी!
अंतर मंगल भाव भरे ,जलजात खिले चित की धरनी!
देह विकार निशा जलती , गुरु ज्ञान बसा नगरी अपनी!!१

छगन लाल गर्ग "विज्ञ "!


||दुर्मिल सवैया||
८सगण २४ वर्ण !

नव रूप उषा नभ मे दिखती ,मधु रश्मि भरे मृदु रंग धरे !
नवनीत प्रभा भर पावनता , तल सुन्दर पीत उजास भरे !
घन श्याम बडे अब मोहित है  , चित पावन धार सरिता निकले !
गुरु ज्ञान सुधा रस पान किया, नव रूप धरातल दीप जले !!२

छगन लाल गर्ग "विज्ञ" !!
 ||दुर्मिल सवैया||

विधान - ८ सगण  , २४ वर्ण !

तन ताप जले चित आग लगे , जब औरन को  सुविधा बढती!
सब लोग लगे अब लूट रहे , हर पीर  बढे उनकी गलती !
छवि दाग लखे चित पीड़ित है , यह देख बड़ी  दुविधा रहती !
मनुवा सुख खोज गुरू रज मे , तज लोभ वही खुशियाँ बसती !!३

छगन लाल गर्ग "विज्ञ"!
||मानिनी सवैया||
७ जगण व लघु गुरु कुल २३वर्ण ।

अधीर हिया जग देख विकास, चहे सुख चैन अनंत धरा।
विकार बढे मन दौड लगाय , लगा रस भौतिक मोह खरा ।
नही धन तोष भरे मन कोश , सदा चित चाहत और जरा।
तनाव मिटे गुरु छांव सदैव, रहे मन पावन भक्ति भरा ।।४

छगन लाल गर्ग "विज्ञ"!

||गंगोदक सवैया|| ++++भाषा सहोदरी!

८ रगण २४ वर्ण।

प्राण मे प्रीत है हिंद की लेखनी,  जिंदगी की यही साधना सत्य है!
आस की रोशनी घेरती भावना , साथ है शब्द का भीतरी कथ्य है!
जन्म से ढालती मानवी प्रेरणा , अंश भाषा रहे प्रेम का लक्ष्य है !
सोच लो राष्ट्र की बात ही सार है , भाष्य हो देश का मूल ये तथ्य है !!५

मतगंयद सवैया
७ भगण २ गुरु  २३ वर्ण
नाम सहोदर पावन सुन्दर, काम क्रिया रचना हितकारी !
प्रेम विशाल सभी कवि साधक ,पंथ बढे कविता शुभकारी !
लेखक विश्व सुशोभित अंचल , हिन्द सरोज पले गुण धारी !
मानस मंगल भाव धरे मन , संग मनोहर  है  सुखकारी !!६

वाम सवैया
७ जगण १यगण २४ वर्ण ।

सुधा रस पान सहोदर संग , मिले यश हिन्द विचारक पाया !
भरो गगरी मति सार अथाह , खिले पट पावन भीतर माया !
जगो पल साधक नागर नेह , जले सब तामस गागर काया !
महा उपकार हुआ जय कांत , उजास मिला चित शीतल छाया !!७

मदिरा सवैया ।

७भगण १ गुरू २२ वर्ण ।

नेह अपार विराट हुआ , जब आस पले जय मे ढलती ।
हिन्द सुधा बरसे विधु से , जग मे तप की महिमा पलती।
भीतर सुन्दर शब्द भरे  , नवनीत प्रभा खिलने लगती।
काव्य सहोदर कंचन से , रवि रश्मि भरी लहरे बहती ।।८


||दुर्मिल सवैया||
८सगण २४ वर्ण !

नव रूप उषा नभ मे दिखती ,मधु रश्मि भरे मृदु रंग धरे !
नवनीत प्रभा भर पावनता , तल सुन्दर पीत उजास भरे !
पल आज अलौकिक मोहित है ,नित लेखक लेख कविता निकले !
जय कांत प्रभा कर ज्योति मिले, नव रूप विशारद दीप जले !!९

छगन लाल गर्ग "विज्ञ" !!













      










दीपावली

विषय - दीपावली!
विधा -चौपाई छन्द आधारित गीतिका!

दीपावली  रश्मि  रोनक घेरा!
सत्य  पताका  का फल हेरा !
राम विजय की कथा निराली!
पाप  नष्ट  कर  पुण्य बिखेरा !!

सामाजिक समरसता आये!
धर्म  कर्म   का  पर्व  घनेरा !
सूत्र उपनिषद का उजियारा !
करे  प्राण   रोशन  बहुतेरा!!

सभी   धर्म   चाहे   उजियारा!
पाप   मिटे   जग  रोशन  तेरा !
तिथि कार्तिक माह अमावस्या !
जले   दीप  बहु  भया  सवेरा!!

राम नाम है बहु गुण कारी!
धर्म भक्ति  आदर्श बसेरा !!
रावण  पापी  दुष्ट  मिटाये!
तन मन रोशन भाव उकेरा!

गूँज  उठा  आंगन गलियारा!
दीप ज्योति चमके महिघेरा!!
मिट्टी  मे  लघु  दीप  जले रे!
दीपक  पात्र   गढे  कसेरा !!

मान   करे    मर्यादा   ऐसी!
रीति नीति बहु चले चितेरा!!
मात सिया त्याग संग जीना!
भाया सुन्दर  भोर बिखेरा !!

उत्सव  है  यह साफ-सफाई !
रंगोली    रंगे    चित   मेरा !!
सजधज कर सब सुन्दर होई!
घर  आंगन  उजला बहुतेरा !!

टूट   फूट   मरम्मत   सुधारे!
नवल निशा घर हुआ बसेरा!!
दीप  माल बहु घर घर शोभे !
रश्मि पंथ तल जगमग फेरा!!

आओ हिलमिल प्रेम बढाये !
दीपोत्सव  रस  भरे  ठठेरा!!
राम  राज्य  की  गंग बहाये!
प्रियजन प्रेम बसे चित घेरा!!


छगन लाल गर्ग "विज्ञ"!
गांव - जीरावल , सिरोही!
राजस्थान!