||मदिरा सवैया ||
७भगण १ गुरू २२ वर्ण !
आज विचार अचेत हुआ , अब भक्ति जगी मिटती रजनी !
नेह सुधा बरसे विधु से ,भव सागर पार तरे तरनी!
अंतर मंगल भाव भरे ,जलजात खिले चित की धरनी!
देह विकार निशा जलती , गुरु ज्ञान बसा नगरी अपनी!!१
छगन लाल गर्ग "विज्ञ "!
||दुर्मिल सवैया||
८सगण २४ वर्ण !
नव रूप उषा नभ मे दिखती ,मधु रश्मि भरे मृदु रंग धरे !
नवनीत प्रभा भर पावनता , तल सुन्दर पीत उजास भरे !
घन श्याम बडे अब मोहित है , चित पावन धार सरिता निकले !
गुरु ज्ञान सुधा रस पान किया, नव रूप धरातल दीप जले !!२
छगन लाल गर्ग "विज्ञ" !!
||दुर्मिल सवैया||
विधान - ८ सगण , २४ वर्ण !
तन ताप जले चित आग लगे , जब औरन को सुविधा बढती!
सब लोग लगे अब लूट रहे , हर पीर बढे उनकी गलती !
छवि दाग लखे चित पीड़ित है , यह देख बड़ी दुविधा रहती !
मनुवा सुख खोज गुरू रज मे , तज लोभ वही खुशियाँ बसती !!३
छगन लाल गर्ग "विज्ञ"!
||मानिनी सवैया||
७ जगण व लघु गुरु कुल २३वर्ण ।
अधीर हिया जग देख विकास, चहे सुख चैन अनंत धरा।
विकार बढे मन दौड लगाय , लगा रस भौतिक मोह खरा ।
नही धन तोष भरे मन कोश , सदा चित चाहत और जरा।
तनाव मिटे गुरु छांव सदैव, रहे मन पावन भक्ति भरा ।।४
छगन लाल गर्ग "विज्ञ"!
||गंगोदक सवैया|| ++++भाषा सहोदरी!
८ रगण २४ वर्ण।
प्राण मे प्रीत है हिंद की लेखनी, जिंदगी की यही साधना सत्य है!
आस की रोशनी घेरती भावना , साथ है शब्द का भीतरी कथ्य है!
जन्म से ढालती मानवी प्रेरणा , अंश भाषा रहे प्रेम का लक्ष्य है !
सोच लो राष्ट्र की बात ही सार है , भाष्य हो देश का मूल ये तथ्य है !!५
मतगंयद सवैया
७ भगण २ गुरु २३ वर्ण
नाम सहोदर पावन सुन्दर, काम क्रिया रचना हितकारी !
प्रेम विशाल सभी कवि साधक ,पंथ बढे कविता शुभकारी !
लेखक विश्व सुशोभित अंचल , हिन्द सरोज पले गुण धारी !
मानस मंगल भाव धरे मन , संग मनोहर है सुखकारी !!६
वाम सवैया
७ जगण १यगण २४ वर्ण ।
सुधा रस पान सहोदर संग , मिले यश हिन्द विचारक पाया !
भरो गगरी मति सार अथाह , खिले पट पावन भीतर माया !
जगो पल साधक नागर नेह , जले सब तामस गागर काया !
महा उपकार हुआ जय कांत , उजास मिला चित शीतल छाया !!७
मदिरा सवैया ।
७भगण १ गुरू २२ वर्ण ।
नेह अपार विराट हुआ , जब आस पले जय मे ढलती ।
हिन्द सुधा बरसे विधु से , जग मे तप की महिमा पलती।
भीतर सुन्दर शब्द भरे , नवनीत प्रभा खिलने लगती।
काव्य सहोदर कंचन से , रवि रश्मि भरी लहरे बहती ।।८
||दुर्मिल सवैया||
८सगण २४ वर्ण !
नव रूप उषा नभ मे दिखती ,मधु रश्मि भरे मृदु रंग धरे !
नवनीत प्रभा भर पावनता , तल सुन्दर पीत उजास भरे !
पल आज अलौकिक मोहित है ,नित लेखक लेख कविता निकले !
जय कांत प्रभा कर ज्योति मिले, नव रूप विशारद दीप जले !!९
छगन लाल गर्ग "विज्ञ" !!