Saturday, April 3, 2021

काल चक्र

 विषय - काल - चक्र! 

सरसी छन्द आधारित गीत!
विधान ~[ 27 मात्रा, 16,11 पर यति,
            चरणान्त में 21,कुल चार चरण,
                क्रमागत दो-दो चरण तुकांत]

काल चक्र के तमस जाल में, स्तब्ध हुआ  गतिमान !
ऊपर महा शून्य डरा रहा, छूट रहा पल दिनमान!

संध्या  आई  चला अधिक हूँ, जाना है परदेश !
साहस छूट गया है मेरा , थका हुआ अवशेष!
तृष्णा वंचित काल अनूठा, कैसा है अनजान!
काल चक्र के तमस जाल में, स्तब्ध हुआ गतिमान !!

छूना मत गंभीर बिमारी, तन मन बना अछूत !
निस्संबल बेकाम पथिक मैं, सारे मिले सबूत!
गया काल हाँ थे मेरे सब , बीत गया दिनमान!
काल चक्र के तमस जाल में, स्तब्ध हुआ  गतिमान !!

नियति खेल देखूँ अब कैसे, उखड़ी मेरी श्वांस!
दे अवलंबन मेरे जीवन, क्यों भरता निश्वास!
रे विडंबना बोल बोध से, होगी निज पहचान!
काल चक्र के तमस जाल में, स्तब्ध हुआ  गतिमान !!

जीवन के गैरिक अंचल में, संध्या का उपकार!
व्याकुल घन नभ तिमिर जाल ले , ढँकने को तैयार!
धैर्यमयी स्मृति मलयानिल का, होता अब अवसान!
काल चक्र के तमस जाल में, स्तब्ध हुआ  गतिमान !!

देह- विखंडित पल असीम नभ , चिंतन  में है राज !
निराधार यह मानव जीवन, समय चक्र सरताज!
शून्य पवन से प्राण हमारे, कर ले उर अनुमान!
काल चक्र के तमस जाल में, स्तब्ध हुआ  गतिमान !!

छगन लाल गर्ग 'विज्ञ' !


Sunday, March 17, 2019

होली (विधाता छंद )

होली !

दिया क्या घोल ठंडाई , लगे उड़ने नशे में हैं !
लगे हैं बाह से तेरी , बड़ा तूफान थामें हैं !
जरा सा पेक पीते हैं , नशीली नैन प्याली से !
धमा धम ढोल बाजे है, खुशी होली निराली से!!

अहा लगती बड़ी प्यारी, लगें झूमें लता सजनी !
सुहानी रूप की रानी, सजी तुम चाँद सी रजनी !
मचलती प्यार में नाचो , रसीला फाग आया है!
न बोलो बोल कड़वे अब , सजा लो रंग भाया हैं!!

हमारे पास आ जाओ , गुलाबी गाल रंगीली !
जरा सा रंग भर दे हम , सुहानी भोर शर्मीली!
सभी पकवान खायेंगे , घरों में तस्तियाँ होगी!
पिता मेरे गले सासू , मिलेंगे मस्तियाँ होगी!!

रहेगी साथ मम्मी भी , चली दिल्ली रवाना हो!
बड़े अरमान लेके सब , हमारे साथ खाना हो !
भरी है बालटी भारी , लबालब रंग में सारी!
छिपा है चेहरा तेरा , छबीले रंग में प्यारी !!

हमें मत दोष फिर देना , पड़ोसन में न खो जाये !
हमे तो भ्रम रहेगा ही , बला तुम सी नशा लाये!
बड़ी प्रेमी निगाहों से , करे बांका इशारा वो !
तभी तो रंग में थोड़ा, नशे का साथ प्यारा वो !!

छगन लाल गर्ग विज्ञ!

Thursday, November 1, 2018

क्षण-भंगुरता (दोहे)


||दोहे||

अकड़ रहे हम अस्मिता, शून्य विवर संसार!
भ्रमित पवन सी जिंदगी, ले लो नेह अपार !!१

जाना  कब  है सोच मे , लगे नही अनुमान!
जीने का पल आज है,आगे का अभिमान!!२

देह रेत दीवार है, या फिर कुसुम कपोल!
मृत्यु बवंडर  क्रूर है, लेत प्राण अनमोल!!३

रिश्तो  के संसार मे, मोह भरा जंजाल!
नदी नीर के वेग सा ,छूटे साथ विशाल!!४

कच्चा तन आकार है, कागा छल अतिसार!
सत्य बड़प्पन छोड़ के, जीता मन अभिसार!!५

सतगुरु लौ है रश्मि की, परम ब्रह्म   अवतार!
रैन राग अब त्याग दे ,  प्राण  चहे   करतार!!६

चमक दमक पल देह रे,  धोखे  मे संसार!
मोह मदन रस छोड़ दे , जाना  है  उस पार! ७

आँखो देखा सत्य है, भीतर किया विचार!
जो भी होता अन्य  है, मै भी खड़ा कतार!!८

भज प्राणी चित राम को, केवल यही उपाय!
तज माया सच जान के, साधो शरण सुहाय !!९

सतगुरु मेरे दीप है, रोशन चित संसार !
दिव्य ज्योति मे लीन है,श्वासों का व्यापार!!१०

जाग मना अब भोर है, कर्म धर्म चहुँओर!
सतगुरु रज मे सार है, माया है  चितचोर!!११

छगन लाल गर्ग "विज्ञ"!

सवैया


||मदिरा सवैया ||
७भगण १ गुरू २२ वर्ण !

आज विचार अचेत हुआ , अब भक्ति जगी मिटती रजनी !
नेह सुधा बरसे विधु से ,भव सागर पार तरे तरनी!
अंतर मंगल भाव भरे ,जलजात खिले चित की धरनी!
देह विकार निशा जलती , गुरु ज्ञान बसा नगरी अपनी!!१

छगन लाल गर्ग "विज्ञ "!


||दुर्मिल सवैया||
८सगण २४ वर्ण !

नव रूप उषा नभ मे दिखती ,मधु रश्मि भरे मृदु रंग धरे !
नवनीत प्रभा भर पावनता , तल सुन्दर पीत उजास भरे !
घन श्याम बडे अब मोहित है  , चित पावन धार सरिता निकले !
गुरु ज्ञान सुधा रस पान किया, नव रूप धरातल दीप जले !!२

छगन लाल गर्ग "विज्ञ" !!
 ||दुर्मिल सवैया||

विधान - ८ सगण  , २४ वर्ण !

तन ताप जले चित आग लगे , जब औरन को  सुविधा बढती!
सब लोग लगे अब लूट रहे , हर पीर  बढे उनकी गलती !
छवि दाग लखे चित पीड़ित है , यह देख बड़ी  दुविधा रहती !
मनुवा सुख खोज गुरू रज मे , तज लोभ वही खुशियाँ बसती !!३

छगन लाल गर्ग "विज्ञ"!
||मानिनी सवैया||
७ जगण व लघु गुरु कुल २३वर्ण ।

अधीर हिया जग देख विकास, चहे सुख चैन अनंत धरा।
विकार बढे मन दौड लगाय , लगा रस भौतिक मोह खरा ।
नही धन तोष भरे मन कोश , सदा चित चाहत और जरा।
तनाव मिटे गुरु छांव सदैव, रहे मन पावन भक्ति भरा ।।४

छगन लाल गर्ग "विज्ञ"!

||गंगोदक सवैया|| ++++भाषा सहोदरी!

८ रगण २४ वर्ण।

प्राण मे प्रीत है हिंद की लेखनी,  जिंदगी की यही साधना सत्य है!
आस की रोशनी घेरती भावना , साथ है शब्द का भीतरी कथ्य है!
जन्म से ढालती मानवी प्रेरणा , अंश भाषा रहे प्रेम का लक्ष्य है !
सोच लो राष्ट्र की बात ही सार है , भाष्य हो देश का मूल ये तथ्य है !!५

मतगंयद सवैया
७ भगण २ गुरु  २३ वर्ण
नाम सहोदर पावन सुन्दर, काम क्रिया रचना हितकारी !
प्रेम विशाल सभी कवि साधक ,पंथ बढे कविता शुभकारी !
लेखक विश्व सुशोभित अंचल , हिन्द सरोज पले गुण धारी !
मानस मंगल भाव धरे मन , संग मनोहर  है  सुखकारी !!६

वाम सवैया
७ जगण १यगण २४ वर्ण ।

सुधा रस पान सहोदर संग , मिले यश हिन्द विचारक पाया !
भरो गगरी मति सार अथाह , खिले पट पावन भीतर माया !
जगो पल साधक नागर नेह , जले सब तामस गागर काया !
महा उपकार हुआ जय कांत , उजास मिला चित शीतल छाया !!७

मदिरा सवैया ।

७भगण १ गुरू २२ वर्ण ।

नेह अपार विराट हुआ , जब आस पले जय मे ढलती ।
हिन्द सुधा बरसे विधु से , जग मे तप की महिमा पलती।
भीतर सुन्दर शब्द भरे  , नवनीत प्रभा खिलने लगती।
काव्य सहोदर कंचन से , रवि रश्मि भरी लहरे बहती ।।८


||दुर्मिल सवैया||
८सगण २४ वर्ण !

नव रूप उषा नभ मे दिखती ,मधु रश्मि भरे मृदु रंग धरे !
नवनीत प्रभा भर पावनता , तल सुन्दर पीत उजास भरे !
पल आज अलौकिक मोहित है ,नित लेखक लेख कविता निकले !
जय कांत प्रभा कर ज्योति मिले, नव रूप विशारद दीप जले !!९

छगन लाल गर्ग "विज्ञ" !!













      










सवैया छंद


||मदिरा सवैया ||
७भगण १ गुरू २२ वर्ण !

आज विचार अचेत हुआ , अब भक्ति जगी मिटती रजनी !
नेह सुधा बरसे विधु से ,भव सागर पार तरे तरनी!
अंतर मंगल भाव भरे ,जलजात खिले चित की धरनी!
देह विकार निशा जलती , गुरु ज्ञान बसा नगरी अपनी!!१

छगन लाल गर्ग "विज्ञ "!


||दुर्मिल सवैया||
८सगण २४ वर्ण !

नव रूप उषा नभ मे दिखती ,मधु रश्मि भरे मृदु रंग धरे !
नवनीत प्रभा भर पावनता , तल सुन्दर पीत उजास भरे !
घन श्याम बडे अब मोहित है  , चित पावन धार सरिता निकले !
गुरु ज्ञान सुधा रस पान किया, नव रूप धरातल दीप जले !!२

छगन लाल गर्ग "विज्ञ" !!
 ||दुर्मिल सवैया||

विधान - ८ सगण  , २४ वर्ण !

तन ताप जले चित आग लगे , जब औरन को  सुविधा बढती!
सब लोग लगे अब लूट रहे , हर पीर  बढे उनकी गलती !
छवि दाग लखे चित पीड़ित है , यह देख बड़ी  दुविधा रहती !
मनुवा सुख खोज गुरू रज मे , तज लोभ वही खुशियाँ बसती !!३

छगन लाल गर्ग "विज्ञ"!
||मानिनी सवैया||
७ जगण व लघु गुरु कुल २३वर्ण ।

अधीर हिया जग देख विकास, चहे सुख चैन अनंत धरा।
विकार बढे मन दौड लगाय , लगा रस भौतिक मोह खरा ।
नही धन तोष भरे मन कोश , सदा चित चाहत और जरा।
तनाव मिटे गुरु छांव सदैव, रहे मन पावन भक्ति भरा ।।४

छगन लाल गर्ग "विज्ञ"!

||गंगोदक सवैया|| ++++भाषा सहोदरी!

८ रगण २४ वर्ण।

प्राण मे प्रीत है हिंद की लेखनी,  जिंदगी की यही साधना सत्य है!
आस की रोशनी घेरती भावना , साथ है शब्द का भीतरी कथ्य है!
जन्म से ढालती मानवी प्रेरणा , अंश भाषा रहे प्रेम का लक्ष्य है !
सोच लो राष्ट्र की बात ही सार है , भाष्य हो देश का मूल ये तथ्य है !!५

मतगंयद सवैया
७ भगण २ गुरु  २३ वर्ण
नाम सहोदर पावन सुन्दर, काम क्रिया रचना हितकारी !
प्रेम विशाल सभी कवि साधक ,पंथ बढे कविता शुभकारी !
लेखक विश्व सुशोभित अंचल , हिन्द सरोज पले गुण धारी !
मानस मंगल भाव धरे मन , संग मनोहर  है  सुखकारी !!६

वाम सवैया
७ जगण १यगण २४ वर्ण ।

सुधा रस पान सहोदर संग , मिले यश हिन्द विचारक पाया !
भरो गगरी मति सार अथाह , खिले पट पावन भीतर माया !
जगो पल साधक नागर नेह , जले सब तामस गागर काया !
महा उपकार हुआ जय कांत , उजास मिला चित शीतल छाया !!७

मदिरा सवैया ।

७भगण १ गुरू २२ वर्ण ।

नेह अपार विराट हुआ , जब आस पले जय मे ढलती ।
हिन्द सुधा बरसे विधु से , जग मे तप की महिमा पलती।
भीतर सुन्दर शब्द भरे  , नवनीत प्रभा खिलने लगती।
काव्य सहोदर कंचन से , रवि रश्मि भरी लहरे बहती ।।८


||दुर्मिल सवैया||
८सगण २४ वर्ण !

नव रूप उषा नभ मे दिखती ,मधु रश्मि भरे मृदु रंग धरे !
नवनीत प्रभा भर पावनता , तल सुन्दर पीत उजास भरे !
पल आज अलौकिक मोहित है ,नित लेखक लेख कविता निकले !
जय कांत प्रभा कर ज्योति मिले, नव रूप विशारद दीप जले !!९

छगन लाल गर्ग "विज्ञ" !!













      










दीपावली

विषय - दीपावली!
विधा -चौपाई छन्द आधारित गीतिका!

दीपावली  रश्मि  रोनक घेरा!
सत्य  पताका  का फल हेरा !
राम विजय की कथा निराली!
पाप  नष्ट  कर  पुण्य बिखेरा !!

सामाजिक समरसता आये!
धर्म  कर्म   का  पर्व  घनेरा !
सूत्र उपनिषद का उजियारा !
करे  प्राण   रोशन  बहुतेरा!!

सभी   धर्म   चाहे   उजियारा!
पाप   मिटे   जग  रोशन  तेरा !
तिथि कार्तिक माह अमावस्या !
जले   दीप  बहु  भया  सवेरा!!

राम नाम है बहु गुण कारी!
धर्म भक्ति  आदर्श बसेरा !!
रावण  पापी  दुष्ट  मिटाये!
तन मन रोशन भाव उकेरा!

गूँज  उठा  आंगन गलियारा!
दीप ज्योति चमके महिघेरा!!
मिट्टी  मे  लघु  दीप  जले रे!
दीपक  पात्र   गढे  कसेरा !!

मान   करे    मर्यादा   ऐसी!
रीति नीति बहु चले चितेरा!!
मात सिया त्याग संग जीना!
भाया सुन्दर  भोर बिखेरा !!

उत्सव  है  यह साफ-सफाई !
रंगोली    रंगे    चित   मेरा !!
सजधज कर सब सुन्दर होई!
घर  आंगन  उजला बहुतेरा !!

टूट   फूट   मरम्मत   सुधारे!
नवल निशा घर हुआ बसेरा!!
दीप  माल बहु घर घर शोभे !
रश्मि पंथ तल जगमग फेरा!!

आओ हिलमिल प्रेम बढाये !
दीपोत्सव  रस  भरे  ठठेरा!!
राम  राज्य  की  गंग बहाये!
प्रियजन प्रेम बसे चित घेरा!!


छगन लाल गर्ग "विज्ञ"!
गांव - जीरावल , सिरोही!
राजस्थान!

Thursday, February 23, 2017

कुण्डलियां ।

कुण्डलियां छंद ।

असमंजस घनी घीरा , अकाल पडा विकास ।
स्वीकृति स्वहित काज,जनहित बना  विनाश ।
जनहित बना विनाश, सुशासन भरता दावा ।
खिल रहा फूल  कमल, विरोध पर करे धावा ।
पलटन भक्त लूटो,  अधिकार सबसे बलवस।
शासन धनिक मद से , करो चुकाना समंजस ।।

दुर्दिन निर्धन  जानकर , हम पर  है  विश्वास ।
अच्छे दिन की आस मे, वोट दिये अधिकांश।
वोट दिये अधिकांश, भाषण खूब बरसाये।
नोट बंदी कारनामा, निर्धन जन को सताये।
सुशासन अहंकार ,खूब प्रचारित नित दिन ।
अवसर सुंदर हाथ, सुधरे  घर मिटे दुर्दिन ।।

छगन लाल गर्ग ।

,

Monday, October 17, 2016

तपिश उदगार । (1 से 9 )

    (1)
कब तक यह कहूँ अकेला
कह ना सकूँ घिरा हूँ मेला
दुख सुख सब मेरा अपना
स्थूल तन जुडे मन अकेला ।
क्या कहूँ क्या मेरी पहचान
भटका भ्रमित रूप अनजान
तनिक मोह ढूँढ रहा रसकोष
शून्य हुआ सा मन चेतन मान।
तृष्णा की तन रहती नित प्यास
वही मन रस रही वितृष्णा पास
तन लावण्य कोष कुसुम मकरंद
सुख आकर तनिक न ठहरा पास ।
नील गगन गागर छलक जब जाता
झील बनकर रस घनीभूत छा जाता
नयनो की मृदुल स्वप्न लहरिया तब
झिलमिल अमंद सुख तन ढक जाता ।।
छगन लाल गर्ग ।

(2)


ले चल कही ओर भर गया मन
ले मन शब्द वितकाल मति क्षण
जगत ताप प्रखर पल हर ज्वलंत
विश्रांत रस हीन दग्ध घायल तन ।
दे रही आमंत्रण मुस्कान भरी लहरे
ले रही संताप उडोलित तरंग बिखरे
आओ मिले गलहार मन राग जान ले
उष्मा संग यह भाव गति तन मन घेरे ।
उच्छृंखल तन उन्माद रोमांसित होना चाहे
विगत व्याघि भरा मन विस्मृत होना चाहे
उठा पटक सागर तल अनंत रस चाव घना
उत्ताल तरंगों की गाथा सम्मुख सुनना चाहे।
अवनी क्षण भंगुर तपन ठंडक बीच जीवन
करनी मन की नही प्रकृति से कर्म स्वचेतन
कोलाहल बीच अनंत स्वप्न हैं नित घायल
अपार अभिप्शा से रीता मेरा जख्मी यौवन ।
ले न दे दूँ यौवन का दरिया हिलोर लेता
दे न अंबर सी ऊँचाई मैं तरंग बन कहता
नाविक बन तो नाव मैं अनाथ जन्मों से
निश्छल प्रेम राग घना हृदय संगीत देता ।।
छगन लाल गर्ग ।




   (3)
करना होता मनन सत्य अभिव्यक्ति से पहले
अब पहले सा स्पष्ट वक्ता कैसे जोखिम झेले
चुकानी होती किमत धृष्टता भरी नादानी की
साबित होते बिन प्रमाण के खतरनाक जुमले।
केवल एक सत्य जानो ओर अपनाओ
अंध भक्त बने रहो नित सत्ता गुण गाओ
हर खटकती बात बने स्वादिष्ट स्वीकार
रहस्य यही समस्त समझ मस्ती पाओ ।
मत करो व्यर्थ चिंता नोकरी धंधे की
सब्र करो समझ अभी नही जीवन की
देश हीत त्याग करो परिवार का मोह
प्रशंसा करो राज झोली भरो आशा की।
लेखनी कथनी मिडिया लेखक कवि छाया
जिन्दगी जीते रहे सच साक्षी समय आया
करना पडे त्याग सत्य सत्ताहीत हैं देश हीत
नियम गति स्वच्छन्द आचार सीमा मे आया ।।
छगन लाल गर्ग ।










   (4)
अज्ञेय अंगूरी आल्हाद नवल मदहोशी भरा
अन्वेषण अंतरतम चाह तन मृदुल जोश भरा
वयसंधि काल आगे अदृश्य राह संकोच घना
अवयव रोमांसित स्व सिमटन तन पल ठहरा ।
आशक्त स्वयं संतुलित देह नवनीत विकसित सुन्दर
आत्ममुग्ध सी नैन मुंद करूं स्व आत्ममंथन निरंतर
परिवर्तन मोह फसी करती देह दीदार श्रृंगार नित्य
नर नेह स्वप्न पाल बढती अज्ञात राह चंचल संसार।
सतरंगी स्वप्निल सहचर प्रगाढ प्रेम पुंज पुरूष चाह
नवरंग अलंकरण करे श्रृंगार बदन शोभित रहे उछाह
पवन गति विचरण करूं प्रियतम तन मे बिखर सुगंध
नवरस संचरण तन विरल बन बहे समतल सुख चाह ।
नयन कोष मे इठलाते शैशव तज यौवन सपने
शयन काल मे रोमांसित करें प्रिय मिलन सपने
गुम गुम जाती मृगी बन तृष्णा भरे रंगीले सागर
भूल भूलैया विपिन राहे खोजूँ प्रिय मिले अपने ।
सौरभ सौंदर्य रस घुलने लगी नादान जवानी
लावण्य तन केसर रंगने लगा अपनी मनमानी
आभामंडल प्रिय कल्पित नेह से रह रह सताये
लज्जा सुन्दरी तन मन हुई मोम सी आगवानी ।।




(5)




चंचल चित चंद्र मुख झलक छिटके घना
बंकिम नयन नटखट निर्वहन नाहक बना
नेह निशां निर्मल नहाये नादान रोके मुझे
विश्वास विमल वैभव विरासत मेरा बना ।
उलझे अलक भ्रमर से नव कुसुम रसपान हित
बिखराव दिव्य रूप घना दृष्टि अस्थिर भ्रमित
कमनीय कोमल मृदु गात निर्मित रश्मि सौंदर्य
आह यह क्षण दृश्य बना हुआ सौभाग्य अर्जित ।
रूपमय नयन कंटीले चुभते करे अंतरतम छलनी
अव्यक्त रस अहसास भरते हिय रमणीय करनी
सुक नासिका नटखट नार नस नस तृष्णा जगती
नजर नेह भिगोई नद कल कल सी संगीत बहनी।
देह गदराई बंधन वसन यौवन रह नही पाता
नेह नशीला नैनों के बंधन से छलक बह जाता
कंठ कमनीय मृणाल कमल मुख सौंदर्य सहेजा
रेशम रेशा रश्मि रागिनी रंगीन रूप मे खोता।
उर उन्नत उष्मा अखंडित उरोज उच्छृंखल
नूर नारीत्व नमनीय निर्मल न्यौछावर बल
निर्मम निष्ठुर जीवन मे हर विपदा विनिमय
असीम सुख गागर भरा चित नारी हैं निर्मल।।
छगन लाल गर्ग ।



(6)
हो रही विश्रृंखल गति विरह भरी
खो रही अवचेतन मे प्राण नेह भरी
खो गई सुधबुध विगत रस गागर मे
तन विलग हुआ अब मन मे दर्द भरी ।
क्रीडा सघन रस पान अधर घनी
व्रीडा प्रिय नेह डूब सागर सी बनी
लहरो का रज्जू आलंबन सुख भरा
तंद्रा शिथिल रजनी मे व्यतीत घनी ।
प्रिय गोद सम विषम का खेल बनी
हिय मोद रस अधरों का पान बनी
तीव्र गति मन तन एक हो रहे झेल
अमंद रसधार अधरों मे स्मित बनी ।
अलक मलयज गंध घुल बिखर गये
भनक तन गंध मिल रस निखार गये
बंद पलक स्व तृप्त सुख भान असर
विहाग राग नशा भर पलक सो गये।
नही संग अब संग विस्तार स्वप्न तना
वही रस सब मग्न संसार विस्तृत घना
मन डूब रहा अचेतन कोष आनंद भरा
रही लाज संयोग चेतन मे विश्वास घना ।।
छगन लाल गर्ग ।



     (7)
नही होंगे हम गर चल दिये तुम
बची यादें तब गर कल जिये हम
नही चित रहा वश लेकर चले हो
तभी पायें रब जब संग चले हम ।
क्यों रहें अदृश्य मन की गहराई
ज्यौ बहे अदृश्य उम्र की पुरवाई
आज अनंत काल अंतराल ढहा
क्यौ चले हो फासलों की तन्हाई ।
प्रकृति बहे निर्झर बनी देखो तो जरा
हरी भरी लता लहर देती नेह नजारा
नभ प्रिय मिल लालिमा लज्जित हुआ
संयोग क्षण ना छीनो प्रिय रूको जरा ।
उलाहना अब जानकर ना दूँगा कभी
ना आ सको मौत घडी अंतिम हो तभी
आ ही गये किस्मत से अब जाने दूँ कैसे
अकेला भटका हूँ कारवाँ मिले हो अभी।
रूसवाई की सजा भी कहीं अंजाम मौत तो नही
बेवफाई नही वफा की यह अंतिम श्वास तो नही
मनुहार मानो ना मेरे भोले से दिल के खरीददार
परछाई ना बन जाये तन्हाई तुम रूको तो सही ।।
छगन लाल गर्ग ।






   (8)

प्रिय सुख संसार भूल चली
हिय दुख अविरल शौर भली
करूण रूदन अब बहे धरा
तिय तन नही शिला बन छली ।
विषम सम मिल मुझमे आन बसे
निर्मम नेह रस लंपट हो नित डसे
अवयव सुंदर सुकोमल तन पाकर
निष्ठुर निर्मम देह प्रिय शिकंजे कसे ।
अकेलेपन की चित दशा झेल न पाऊँ
भरोसेमंद साथी से निर्मम स्वार्थ पाऊँ
जीवन जज्बा जलन नित अपनत्व मे
विरानियों का बीहड जंगल जीवन पाऊँ ।
दरअसल दाग दमन लायक दिल होता
जुल्म सितम का सिलसिला चला होता
ना नाजुक भाव टूट पाते बेवफाई भाती
हमसफर ना सही आग का दरिया भाता।।
छगन लाल गर्ग ।




    (9)
तन तपीश तहेदिल बसी चैन होगा कैसे
मन मंदिर अमूर्त बन चित्रित रहती जैसे
हर परमाणु अंश देह विरल हुआ आत्मा
तडप हैं रात दिन उकेरा नही चित्र जबसे ।
निराकार झलक सौंदर्य आकार भ्रम बिंब बन
चित्रकार ललक सृजन रूपसी देह मूर्त अंकन
हर कोण देह मे दृष्टि समाहित मुझमे अद्वैत सी
विलग नही अपरिचित नही तुम वही अंतर्मन ।
तुलिका में नोक बनी तीक्ष्ण शब्द डूब गिरा बोलती
नुकीला सौंदर्य बिखरती बिंब बनके रेखा उभारती
सुगठित यौवन देह मे रति राग सरिता गति उत्ताल
नक्काशी सर्वोच्च विमोहित कर हृदय घाव भरती ।
नही तुम चित्र अब रंग तन मे जीवन भर चुका
नही तुम मित्र हो मन मुझमे एकाकार हो चुका
एक रंग एक रूप एक हृदय स्पंदित अब होता
ना तुम चित्र ना मैं सृजक दोनो बिंब दिव्यता का ।
कभी तुम चित्रकार कभी मैं चित्र दोनो खेल रहे
कभी तुली तुम कभी में बलखाती नार संग रहे
अजीब रिश्ता नर नारी बना हैं जीवन सुख भरें
उलट पुलट हम दोनो देह मिल एक संसार गहे।।
छगन लाल गर्ग ।





Friday, June 17, 2016

बुढापा

अभी नही हुई देरी
बुढापा घेरने दो
अच्छा हैं अहो भाग्य भी
भीतर बहुत रिक्त हूँ
इसे मत समझो देरी
उठ रहा कुछ अज्ञेय स्वर
शायद ले रहा आकार वह गीत
तरसते जीवन गाने को
सदियो से जन्मों से
नही पाता होठो तक
यह चाहता बहना रागिनी बन
कहां संजोई जीवन भर
कि निकले कंठ से राग बन
होने दो रूपान्तरण
बहने दो आँखों से रूदन की रागिनी बन
स्वीकार लेंगे मेरे परम
प्रसाद समझ मेरी
अब समझ का समय यह
अबोध रहना सिखाना होगा माया से
बहुमूल्य हैं उतरार्द्ध का समय
यह आखिरी सौपान परम साक्षात्कार
होने का अहसास अब ना कर
अधीर प्राणों का धैर्य रश्मिमय
महा अंबर विराट का स्नेह आमंत्रण
केवल मेरे लिए
नही हुई देरी सजावट कर तो लूँ
परम से महा मिलन निमित्त
छगन लाल गर्ग

जीएं तपिश

कब तक जीएं तपिश
ओरों के लिए
केवल इसी कारण
शरीर संबंध मूर्त नही अब
बन गये सूक्ष्म
गहरी संवेदना से जुडकर
जलने लगा हूँ अमूर्त
बाह्य आवरण नही ढक पाता
दारूण दृश्य भीतर का
देने लगा दुर्गंध जलने की
श्वास संग पहुंचने लगी
हर जीवंत के तन
मेरी अनकही दशा
अब नही उपाय रहे रहस्य
अस्मिता संघर्ष घना जटिल
जलना होगा निशब्द
स्वाभिमान होने का देता दंश
ओर यही होना साबित करता
जीवन का ध्येय
परमार्थिक भाव धारा स्त्रोत उदगम
स्वयं विकार निवृत्ति से
तपिश पाकर जलन से फूटता
शीतल स्नेह पारावार
जो करता पावन स्व ओर पर का भेद
जीवन हो जाता जीवंत
स्थूल का विद्रोह ही
जीवन अस्मिता का सार तत्व
यही कारण
यही करण ओर यही धरम
वेदना की टीस को कहने दो
निरंतर अबाध
कब तक जीएं तपिश
छगन लाल गर्ग