Friday, June 17, 2016

बुढापा

अभी नही हुई देरी
बुढापा घेरने दो
अच्छा हैं अहो भाग्य भी
भीतर बहुत रिक्त हूँ
इसे मत समझो देरी
उठ रहा कुछ अज्ञेय स्वर
शायद ले रहा आकार वह गीत
तरसते जीवन गाने को
सदियो से जन्मों से
नही पाता होठो तक
यह चाहता बहना रागिनी बन
कहां संजोई जीवन भर
कि निकले कंठ से राग बन
होने दो रूपान्तरण
बहने दो आँखों से रूदन की रागिनी बन
स्वीकार लेंगे मेरे परम
प्रसाद समझ मेरी
अब समझ का समय यह
अबोध रहना सिखाना होगा माया से
बहुमूल्य हैं उतरार्द्ध का समय
यह आखिरी सौपान परम साक्षात्कार
होने का अहसास अब ना कर
अधीर प्राणों का धैर्य रश्मिमय
महा अंबर विराट का स्नेह आमंत्रण
केवल मेरे लिए
नही हुई देरी सजावट कर तो लूँ
परम से महा मिलन निमित्त
छगन लाल गर्ग