यह नही जानता
होली पर कैसे लिखूँ कविता
शब्द ढूँढता पकडता
बिखर बिखर जाते बेअर्थ
फागुन का फाग
हमारे गांव बजता सांग पर
रचते शब्द करते बयान
रंगीला रंगीली की रंगोली का
यह ठेठ क्रीडा भूलती सीमाओं का अंकन
ओर कर जाते दिल वाले
अपने दिल बसी आरजूओं की
शुरुआत
नही कहो इसे केवल पर्व
अंजाम जिन्दगी जीने के
मिलते रस स्त्रोत
हर दिल राग द्वेष भूलकर
एकरस बहता स्नेह निर्झर
मीठास की संगत लिए
गहरे रंगो मे रंगा प्राण राग
अपनी नेह बूँद से भिगो देता
स्वप्निल जज्बातों का आँचल
ओर शायद मन ही मन
छूटती आनंद की रसभरी पिचकारी
बनने लग जाते वही पल
मेरी कविता के अस्फुट शब्द
नही बन पाती
भाव भरे क्षण पूरी कविता ।
छगन लाल गर्ग ।
होली पर कैसे लिखूँ कविता
शब्द ढूँढता पकडता
बिखर बिखर जाते बेअर्थ
फागुन का फाग
हमारे गांव बजता सांग पर
रचते शब्द करते बयान
रंगीला रंगीली की रंगोली का
यह ठेठ क्रीडा भूलती सीमाओं का अंकन
ओर कर जाते दिल वाले
अपने दिल बसी आरजूओं की
शुरुआत
नही कहो इसे केवल पर्व
अंजाम जिन्दगी जीने के
मिलते रस स्त्रोत
हर दिल राग द्वेष भूलकर
एकरस बहता स्नेह निर्झर
मीठास की संगत लिए
गहरे रंगो मे रंगा प्राण राग
अपनी नेह बूँद से भिगो देता
स्वप्निल जज्बातों का आँचल
ओर शायद मन ही मन
छूटती आनंद की रसभरी पिचकारी
बनने लग जाते वही पल
मेरी कविता के अस्फुट शब्द
नही बन पाती
भाव भरे क्षण पूरी कविता ।
छगन लाल गर्ग ।