Tuesday, June 14, 2016

उद्वेग हूँ मै

बहुत भराव तुममें
शायद ज्ञान होगा
शिक्षित सुसंस्कृत सभ्य भी
एक साथ बहुत गुण
तुम्हारा चलना तुम्हारा बोलना
ओर तुम्हारा अकड जाना
कहता मुझे बिना कहे तुम्हारे
बहुत कुछ
यह अहंकार तुम्हारे ज्ञान का
शब्द कहते
प्रकट होता तुम्हारी हर अभिव्यक्ति
बिना व्यक्ति जाने
तुम लेने लगते निर्णय
शब्दावली निखार करते सूक्ष्म
अदृश्य भाव बोध भरते
पिरोने लगते मुझमे
अनगिनत आदर्शों के फूल
बनाना चाहते गलहार अपने लिए
अपना बना पर गुण पराये पिरोये
अनमेल हुआ जाता
आकार अस्तित्व मनुष्य
सुनो वापस घूमें थोडे अपनी तरफ
जान लो अपने को थोडा
शायद खाली हो सको
भराव अपने
थोथे ज्ञान अहंकार से
नही बच सकेगा बाकी फिर
सब जानना होता अपने से ही
बुरा मत मानना मेरा कहा
उद्वेग हूँ मै स्वयं मूढ बना
छगन लाल गर्ग