बेभान हैं घाव
सीमा पार भी रिसते रहते
बिना रिसे बढ़ता हैं घावो का दर्द
बना हैं सिलसिला जीवन का
अब ठोस अहसास जाता रहा
बन चुका हूँ स्वयं पूल
ओर ठीक बीच
नीचे बहता हैं सरिता स्त्रोत
बिना भिगोये मुझे
बन गया हूँ मैं कठोर धरातल सा
कि आवागमन होता रहे
मेरे ऊपर
दौडती रहे गाड़ियाँ
अपनी रफ्तार लिए
लगातार देती रहे
गति का परिचय
ओर पूरा करे अपना सफर
गुजरते रहे भार वाहन
सामर्थ्य से अधिक भार लादे
दौड़ते रहे सामर्थ्य का बल लिए
ओर घिसते रहे मेरा तल
माध्यम तो हुआ हूँ
छाती काम तो आती हैं
कि पा जाये अपनी मंजिल
ले रफ्तार घनी
मंजिल की करे तलाश
अच्छा हैं
कि निराशा भरे कदम भी
छूते हैं मुझे
गहरी हताशा के साथ
गुजरते जाते
जिन्दगी की नयी सुबह पाने
संभले सधे कदम चलते
आधार हूँ उनका भी
सौन्दर्य बोध की चाह मे
उन्मादी नौजवान
आते पकडते कान मेरा
गिरने की मजबूरी से बचते
हाथों से पकडते हैं मजबूती संग
निहारते हैं सरिता की गति
गति मय निर्मल नीर
प्रेरणा ओर सौन्दर्य का चित लिए
लहरा उठते हैं भाव उनके
मन की गति के साथ
बहता जाता निर्मल
सरिता का नीर
कई बार हो जाते हैं
अंकुर लेते हैं स्नेह बीज
होते जाते हैं घने
ओर बन जाते हैं
जीवन का संबल
आखिर घाव मेरे ही रिसते हैं
बेभान हूँ
धरातल हुआ हूँ
यह वेदना नहीं मेरी
तस्सली पाता हूँ
घिसने की गरिमा से
ओत प्रोत सार्थक मिटता हूँ
यह बैभानापन
भान देता जाता
जीवन की सार्थकता का।
छगन लाल गर्ग।
सीमा पार भी रिसते रहते
बिना रिसे बढ़ता हैं घावो का दर्द
बना हैं सिलसिला जीवन का
अब ठोस अहसास जाता रहा
बन चुका हूँ स्वयं पूल
ओर ठीक बीच
नीचे बहता हैं सरिता स्त्रोत
बिना भिगोये मुझे
बन गया हूँ मैं कठोर धरातल सा
कि आवागमन होता रहे
मेरे ऊपर
दौडती रहे गाड़ियाँ
अपनी रफ्तार लिए
लगातार देती रहे
गति का परिचय
ओर पूरा करे अपना सफर
गुजरते रहे भार वाहन
सामर्थ्य से अधिक भार लादे
दौड़ते रहे सामर्थ्य का बल लिए
ओर घिसते रहे मेरा तल
माध्यम तो हुआ हूँ
छाती काम तो आती हैं
कि पा जाये अपनी मंजिल
ले रफ्तार घनी
मंजिल की करे तलाश
अच्छा हैं
कि निराशा भरे कदम भी
छूते हैं मुझे
गहरी हताशा के साथ
गुजरते जाते
जिन्दगी की नयी सुबह पाने
संभले सधे कदम चलते
आधार हूँ उनका भी
सौन्दर्य बोध की चाह मे
उन्मादी नौजवान
आते पकडते कान मेरा
गिरने की मजबूरी से बचते
हाथों से पकडते हैं मजबूती संग
निहारते हैं सरिता की गति
गति मय निर्मल नीर
प्रेरणा ओर सौन्दर्य का चित लिए
लहरा उठते हैं भाव उनके
मन की गति के साथ
बहता जाता निर्मल
सरिता का नीर
कई बार हो जाते हैं
अंकुर लेते हैं स्नेह बीज
होते जाते हैं घने
ओर बन जाते हैं
जीवन का संबल
आखिर घाव मेरे ही रिसते हैं
बेभान हूँ
धरातल हुआ हूँ
यह वेदना नहीं मेरी
तस्सली पाता हूँ
घिसने की गरिमा से
ओत प्रोत सार्थक मिटता हूँ
यह बैभानापन
भान देता जाता
जीवन की सार्थकता का।
छगन लाल गर्ग।