लम्हे
फिर नीर दे गये
प्राण एक बार
फिर पिघलकर
जल धार बने
मैं बीहड का राही
फिर एक बार तुम्हारी
चंचल चितवन का शिकार हुआ
उतरी हो तुम
धीरे धीरे नयनो को
राह बनाकर
हृदय की विरानियो मे
रूको
दर्द का दरिया घना भीतर
ओर तुम नाजुक सी
कली ओर मैं
विशाल हृदय दरिया
तैरना आयेगा कैसे
विरानी का अथाह दर्दिला दरिया
कैसे आने दू
किनारे ही रहो मेरे
देखती हो
कितने बाहर से देखे देखे
भीतर की अथाह गहराई नापते हैं
उन्ही से पूछो
अनुमान करो
भीतर प्रवेश खतरे से बचो
रहने दो
सहने दो
दर्द पले ही जीवन
अकेला हैं
संगी साथी किनारे के हैं
ठोकर लगे
पहले मैं धीरे से समझाता हूँ
मेरा दर्द मेरा रहने दो
मेरी कसक
वेदना राग बही
बहने दो
नीर धार ओर सघन
होने दो
केवल लावण्य भाव
आने दो
यही अस्तित्व मैं चाहता हूँ
इसी सहारे जीता हूँ
मुझे जीने दो
जीने तो दो।
-छगनलाल गर्ग।
फिर नीर दे गये
प्राण एक बार
फिर पिघलकर
जल धार बने
मैं बीहड का राही
फिर एक बार तुम्हारी
चंचल चितवन का शिकार हुआ
उतरी हो तुम
धीरे धीरे नयनो को
राह बनाकर
हृदय की विरानियो मे
रूको
दर्द का दरिया घना भीतर
ओर तुम नाजुक सी
कली ओर मैं
विशाल हृदय दरिया
तैरना आयेगा कैसे
विरानी का अथाह दर्दिला दरिया
कैसे आने दू
किनारे ही रहो मेरे
देखती हो
कितने बाहर से देखे देखे
भीतर की अथाह गहराई नापते हैं
उन्ही से पूछो
अनुमान करो
भीतर प्रवेश खतरे से बचो
रहने दो
सहने दो
दर्द पले ही जीवन
अकेला हैं
संगी साथी किनारे के हैं
ठोकर लगे
पहले मैं धीरे से समझाता हूँ
मेरा दर्द मेरा रहने दो
मेरी कसक
वेदना राग बही
बहने दो
नीर धार ओर सघन
होने दो
केवल लावण्य भाव
आने दो
यही अस्तित्व मैं चाहता हूँ
इसी सहारे जीता हूँ
मुझे जीने दो
जीने तो दो।
-छगनलाल गर्ग।