Monday, June 13, 2016

लम्हे

लम्हे 
फिर नीर दे गये
प्राण एक बार

फिर पिघलकर
जल धार बने
मैं बीहड का राही
फिर एक बार तुम्हारी
चंचल चितवन का शिकार हुआ 
उतरी हो तुम 
धीरे धीरे नयनो को
राह बनाकर
हृदय की विरानियो मे
रूको 
दर्द का दरिया घना भीतर 
ओर तुम नाजुक सी
कली ओर मैं 
विशाल हृदय दरिया 
तैरना आयेगा कैसे 
विरानी का अथाह दर्दिला दरिया 
कैसे आने दू
किनारे ही रहो मेरे 
देखती हो 
कितने बाहर से देखे देखे
भीतर की अथाह गहराई नापते हैं 
उन्ही से पूछो
अनुमान करो
भीतर प्रवेश खतरे से बचो
रहने दो
सहने दो 
दर्द पले ही जीवन 
अकेला हैं 
संगी साथी किनारे के हैं 
ठोकर लगे
पहले मैं धीरे से समझाता हूँ 
मेरा दर्द मेरा रहने दो
मेरी कसक 
वेदना राग बही 
बहने दो
नीर धार ओर सघन
होने दो
केवल लावण्य भाव
आने दो
यही अस्तित्व मैं चाहता हूँ 
इसी सहारे जीता हूँ 
मुझे जीने दो
जीने तो दो।
-छगनलाल गर्ग।