उद्भ्रांत हुआ जीवन
शून्य सृष्टि बोध
तडप तलाश करता ज्ञान स्त्रोत
हर विचार प्रत्यक्ष होता
उलझन जाल
फसा सा अन्तर्जाल पाता विकट संताप
मानसिक तटस्थ सत्य
अब नही देता संबल
विचारधारा का अतीत
रहना चाहता आबाद
समय चक्र की करवट देती नया बोध
जो नही करता स्पर्श अतीत
ओर अबोध किन्तु दृढ मनोवृत्ति
पाना चाहती अज्ञात की छाया
भटकाव का भ्रम
नही लगता अनजान
यही से गुजरती कोई राह
रोशनियों की तरफ
विराट सत्य मिले ना मिले
सामयिक सृष्टि सृजन सार
शायद इसी स्त्रोत
ओर उसे पाने का प्रबल दावेदार
मैं सृष्टि का लघुतम चेतन अंश मानव
सतत संलग्न तुच्छता बाद भी
नही हारता हिम्मत
ईश्वरीय रश्मि की उदात्त चेतना का
सूक्ष्म विद्रोह अज्ञान के प्रति ।
छगन लाल गर्ग ।
शून्य सृष्टि बोध
तडप तलाश करता ज्ञान स्त्रोत
हर विचार प्रत्यक्ष होता
उलझन जाल
फसा सा अन्तर्जाल पाता विकट संताप
मानसिक तटस्थ सत्य
अब नही देता संबल
विचारधारा का अतीत
रहना चाहता आबाद
समय चक्र की करवट देती नया बोध
जो नही करता स्पर्श अतीत
ओर अबोध किन्तु दृढ मनोवृत्ति
पाना चाहती अज्ञात की छाया
भटकाव का भ्रम
नही लगता अनजान
यही से गुजरती कोई राह
रोशनियों की तरफ
विराट सत्य मिले ना मिले
सामयिक सृष्टि सृजन सार
शायद इसी स्त्रोत
ओर उसे पाने का प्रबल दावेदार
मैं सृष्टि का लघुतम चेतन अंश मानव
सतत संलग्न तुच्छता बाद भी
नही हारता हिम्मत
ईश्वरीय रश्मि की उदात्त चेतना का
सूक्ष्म विद्रोह अज्ञान के प्रति ।
छगन लाल गर्ग ।