प्रवेश आधा अधूरा
जीवन तुझमे
नहीं कर पाता पूरा
केवल बाहर बाहर का बिम्ब
करने लगता आकर्षित
अपने रूप जाल
विमोहित होता स्वयं
अपने ही सौष्ठव ऊर्जामय तन से
आह कितना प्रबल
धमनियों का प्रवाह ओर स्फूटित शिराओं
तीव्र दौडता रक्त का उफान
चाहता केवल विसर्जन
विपरीत सौन्दर्य आगार मादक
देखना चाहता
मधु भीगी लहरो का टकराव
अचेतन मे चेतन का प्रवेश
नही हो पाया
ओर यदि कहूँ समस्त चेष्टा लिए
तो मात्र आधा अधूरा प्रवेश
पूर्णता नहीं फिर भी संलग्न
अपने में
पाऊँ संपूर्णता की झलक
ओर कहीं नहीं शिवाय तेरे
कारण यही
करने लगता तुझमे प्रयास प्रवेश
केवल तुझमे संपूर्णता निमित्त प्रवेश ।
छगन लाल गर्ग ।
जीवन तुझमे
नहीं कर पाता पूरा
केवल बाहर बाहर का बिम्ब
करने लगता आकर्षित
अपने रूप जाल
विमोहित होता स्वयं
अपने ही सौष्ठव ऊर्जामय तन से
आह कितना प्रबल
धमनियों का प्रवाह ओर स्फूटित शिराओं
तीव्र दौडता रक्त का उफान
चाहता केवल विसर्जन
विपरीत सौन्दर्य आगार मादक
देखना चाहता
मधु भीगी लहरो का टकराव
अचेतन मे चेतन का प्रवेश
नही हो पाया
ओर यदि कहूँ समस्त चेष्टा लिए
तो मात्र आधा अधूरा प्रवेश
पूर्णता नहीं फिर भी संलग्न
अपने में
पाऊँ संपूर्णता की झलक
ओर कहीं नहीं शिवाय तेरे
कारण यही
करने लगता तुझमे प्रयास प्रवेश
केवल तुझमे संपूर्णता निमित्त प्रवेश ।
छगन लाल गर्ग ।