Friday, June 17, 2016

सत्य शिवं सुंदरम ।

सुंदर कर लेता था
व्याख्या
पढाते वक्त कक्षा में
साहित्य की असीम परतों को
उघाडता जाता ओर
कर देता संश्लेषण पुर्जा पुर्जा
भाव शब्द ओर अर्थ
आज महसूस करता हूँ
कितना गलत था मैं
बिना जीऐ का अनुभव
शब्द गढता फिर कहता
असली की तरह साक्षात किया अछुआ
हजारों व्याख्या को पढा समझा
मनन उपरांत समझ रहस्य
बेफिक्री से कर लेता व्याख्या
खूब समझा बिना जीऐ
कबीर मीरां तूलसी
साहित्यकारों की टीका समालोचना
जी जान से समझा समझाया
कक्षा में आत्म विभोर होकर
पर भीतर जमा होती रही
संपूर्ण अज्ञानता
कथ्य की सत्यता केवल उधार पायी
ओर करता रहा दावा
अपने चिन्तन के सत्य तथ्यों का
जो नही परखा
अपने जीवन की भट्टी
ओर देता रहा अपना चिन्तन
कितना छल दंभ का पुंज
बना जीवन मेरा
असलियत मे नही चिंतनीय हुआ
कभी सत्य मुझमे
जब तक नही जीता स्वयं
शास्त्रीय सत्य उकेरना
मात्र दंभ
नही सत्य शिवं सुंदरम
छगन लाल गर्ग