हो आया कुंभ
क्षिप्रा के तट
निर्मल नीर बहाव में धोने
अपनी देह
कि मेल युगों का जो
नहीं हुआ साफ
पंतजली निर्मित
प्राकृतिक साबून से
यह अहंकार का मद केवल
स्नान क्षणों में बचा लेता
अस्तित्व अपना
ओर प्रबल हो उठता दुराचार के निमित्त
तीर्थ नमनीयता की अंतिम पराकाष्ठा
महाकाल के शरणो मे
देह का लंबवत झुकाव निढाल हो जाता
अहंकार विशालता खंडित होकर
कण कण बन विलीन होती
शरण रज बनकर
आह यह अहंकार विहीन देह
विशुद्ध परिमल
सर्वथा खाली खाली
यह अहसास
अति रोमांचक जीवन पलों का
अब नहीं चाहता सब मिला
मेरे खालीपन की शुद्धता रहे स्थिर
यही वरदान पाया
आज लौटा हूँ बकाया जीने
क्या जीने दोगे मुझे ।
छगन लाल गर्ग ।
क्षिप्रा के तट
निर्मल नीर बहाव में धोने
अपनी देह
कि मेल युगों का जो
नहीं हुआ साफ
पंतजली निर्मित
प्राकृतिक साबून से
यह अहंकार का मद केवल
स्नान क्षणों में बचा लेता
अस्तित्व अपना
ओर प्रबल हो उठता दुराचार के निमित्त
तीर्थ नमनीयता की अंतिम पराकाष्ठा
महाकाल के शरणो मे
देह का लंबवत झुकाव निढाल हो जाता
अहंकार विशालता खंडित होकर
कण कण बन विलीन होती
शरण रज बनकर
आह यह अहंकार विहीन देह
विशुद्ध परिमल
सर्वथा खाली खाली
यह अहसास
अति रोमांचक जीवन पलों का
अब नहीं चाहता सब मिला
मेरे खालीपन की शुद्धता रहे स्थिर
यही वरदान पाया
आज लौटा हूँ बकाया जीने
क्या जीने दोगे मुझे ।
छगन लाल गर्ग ।