Wednesday, June 15, 2016

आकलन हौड

बहुत बार प्रबुद्ध आकलन हौड
आँधी सी गगन आच्छादित
बढचढकर करती प्रकट क्षमता
नही हो सकता ओर कोई
हमारी प्रवृति से बेमेल
प्रबुद्ध रचनात्मक
पहले हम करना चाहते विनष्ट
पल्लवित विकसित अनेकता
मानवता की आड मे
पनपती जाती
मूल सनातन सिद्धांत से
तर्क की पगडंडी पार करना चाहती
अपनी स्वच्छंदता
कैसे होने दे
हमारी कार्य शैली अब परिपक्व
कार्य कर्ताओं को हम
अमिट देते अफीम का नशा
ओर सत्य
जन्म पाता हम से
उसके प्रहरी हम
हमारा मकसद साफ स्पष्ट
मिटाने होगे
स्वमनन उपजे स्वच्छंद
विचारधारा की लहराती खेती
मिटाने होगी
सनातनी क्रान्ति बादल बरसना चाहे
शुद्र स्वार्थ ओर गंदले विचारों की झोपडी
मिटाना ही मकसद
अब नही चाह विभिन्नता की
बहुत हुआ अभिनय
विभिन्नता अग्रसरता हैं बिखराव
देश नकारता
हिन्दूस्तान की पृष्ठभूमि मे विकसित
हमसब हो सके एक ही डाल के फूल
विद्रोही हमसे सिख ले
जिन्दगी की असली प्रबुद्धता
विनष्ट होने से पूर्व समझे सत्य हमसे।
छगन लाल गर्ग ।