Wednesday, June 15, 2016

साथी

मेरे प्रबुद्ध साथी
मेरे वर्चस्व
छोडना चाहोगे कुछ
बिना समझा
शायद नही तोहिन होगी
विद्ववता की
नही दे सकोगे जवाब
अपने आप को
मद का झुकना टूटन देगा
तुम्हारे ज्ञान को
विराट अस्तित्व को चाहते
जानना
हर अणु परमाणु ऊर्जा देता
संजीवनी मिलती जाती
तुम्हे ओर अहसास होता
अस्तित्व विराट
जाना पहचाना
क्या सच यह मेरा दावा
ज्ञान का अज्ञान नही रहा
झाँका ओर पाया
सागर की गहराई का सच
अनंत का उन्नत राज
पर सच यह
नही समाता मानव मस्तिष्क
हजारों जुगनू की जगमगाहट
घेरती बुद्धि
ओर पकड नही पाता चेतन का सच
कमजोर संकरी मुठ्ठी
नही समाता सागर
रीता ही रह जाता मेरा विवेक
महा विराट
नत मस्तक हूँ अनजान हुआ
सत्य कहता सार जीवन
महा अज्ञान से घीरा मै तेरा
शुद्र अंश हूँ विराट
छगन लाल गर्ग