अब क्या कहूँ
फाड़ इस तन के भी होते
भीतर बाहर होता यह तन
मन की तरह
तो शायद आसान हो जाता
मनुष्य की पहचान पाना
करे क्या ईश्वर तेरी कृपा का
तन तो मिला एक
पर फर्क भीतर बाहर का
यह फासला व्यक्तित्व पहचान मे
खपता मानव
जिन्दगी की अमूल्य धरोहर
विश्वास के अतिरंजन मोह फसा
बर्बाद कर देता हैं
क्या इसे जीवन का दुर्भाग्य नहीं कहूँ
चिंतन का विवेक शिथिल
मूक ओर विवश बना हैं ।
छगन लाल गर्ग।
फाड़ इस तन के भी होते
भीतर बाहर होता यह तन
मन की तरह
तो शायद आसान हो जाता
मनुष्य की पहचान पाना
करे क्या ईश्वर तेरी कृपा का
तन तो मिला एक
पर फर्क भीतर बाहर का
यह फासला व्यक्तित्व पहचान मे
खपता मानव
जिन्दगी की अमूल्य धरोहर
विश्वास के अतिरंजन मोह फसा
बर्बाद कर देता हैं
क्या इसे जीवन का दुर्भाग्य नहीं कहूँ
चिंतन का विवेक शिथिल
मूक ओर विवश बना हैं ।
छगन लाल गर्ग।