छाया तेरा
आता हैं हृदय रमता हैं
तू नहीं तो क्या
तेरा छाया तो हैं
अब इसी का सहारा हैं
तू रहा तो था
इतना क्या कम हैं
संसर्ग तेरा बपोति मेरी
अतीत का वहीं ठोर
रस भरता वर्तमान मे
अन्यथा आज का जीना
बोझिल होता
मुडता तेरी ओर
ठंडक मिलती
आज के तप्त माहोल से
आते बनता कहां
ठहरा सा हूँ अतीत
सिर्फ सिर्फ तुझमे।
आता हैं हृदय रमता हैं
तू नहीं तो क्या
तेरा छाया तो हैं
अब इसी का सहारा हैं
तू रहा तो था
इतना क्या कम हैं
संसर्ग तेरा बपोति मेरी
अतीत का वहीं ठोर
रस भरता वर्तमान मे
अन्यथा आज का जीना
बोझिल होता
मुडता तेरी ओर
ठंडक मिलती
आज के तप्त माहोल से
आते बनता कहां
ठहरा सा हूँ अतीत
सिर्फ सिर्फ तुझमे।