Wednesday, June 15, 2016

भीतरी विडंबना

रौगंटे निमित्त
भीतरी विडंबना की वीणा
मत छेडो
यह ठीक कि बैजा नही तुम्हारे स्वर
अक्सर आया जीवन अनुभूति मे
जाना परखा सच
माँ का बुढापा
अंतर्वेदना बढाता बहाता घना
भावों को
विध्वंसक बाढ माफिक
पर इससे भी अधिक समझ पाया
जीवन जज्बात इसी युग
जहां माँ स्वयं मार खाती
बेटों की
बहु के आगे उनके मां बाप के कहे
साथ ही बांधी जाती बडों से
बेटे के हाथों
कुतिया की तरह फैकी जाती
रोटियाँ सुखी बासी
ओर बहु बेटे सम्मुख
चिल्लाती बद्दुआऐं देती
क्यो भेजना चाहते
रौरव नरक
बहु बेटों की माया छल के
रेंगते कीडे
क्या दे पायेंगे छाया सुख
दयासागर परमार्थी सहृदयों के
देख रेख गुजरने दो मेरे कवि
उनका अवशेष
मत दो आह्वान स्वार्थी औलाद को
यह गणित कवि नही
कर्ता का
असली निर्णायक आँखे रखता हैं
छगन लाल गर्ग