Tuesday, June 14, 2016

प्रिये

तुम जाओ प्रिये
ख्याल बनकर
सिरहन मन तरंग बनकर
रस स्वाद मीठास बनकर
हृदय अनजान संगीत बनकर
रोम रोम स्पंदन होकर
अनंत भनक भ्रम बनकर
चेतनता की रश्मि बनकर
जीवन मेरा अमर बना दो
तुम जाओ प्रिये
देखो ना छायी धूप गहरी
छाया चाहती तनिक विश्रांति
किरणे जगह जगह दाग देती
स्वप्निल आस अंगार चुभती
घने ताप धरा आगे उगलती
नही उम्मीद भस्म मैं ना हूँगा
यादो के छाये तेरे घेरे
चाह कर भी जल ना सकूँगा
राख भी ना बन सकूँगा
अधजला धुँआ बनी दुषित करो मत
गुनाह स्नेह का क्षमा करो
तुम आगे जाओ प्रिये
जीवन गया रोता रूलाते
बार बार की रट लगाते
केवल प्रीत का राग पुकारे
गया जीवन का संध्या किनारा
जीवन की अंतिम घडियों में
तुमसे कुछ प्राण राग कहना चाहे
केवल सुनने निमित्त प्रियतम
तुम जाओ प्रिये
मेरी पुकार अमरत्व पा जायें
छगन लाल गर्ग