आज घनत्व घिरा
प्रेम भी
लोभ और मोह के
नहीं रही
उसमें आनंद की उर्मी
नहीं तडपती
प्राणों की ऊर्जा
तडपन देता मात्र
अहंकार का घाव
भीतरी स्फुरण
आत्मा का
नहीं होता
रूग्ण हो चुका नेह
चित चाहता
एकाधिकार विशिष्टता का
प्रेम दान झलक
भूला सा
चाहता प्रतिदान
प्रतिमा बन चुका
युग का शास्वत नेह
केवल शब्दों के
मीठे ताने बाने बुनता
अगरबती के घुंऐ सा
सुगंध देता
करता जाता आशक्त
ओर शास्वत प्रेमिल प्रतिमा
शब्दों के धुऐ से
होती जाती
नित कालिमा युक्त
अनंत का
स्पर्श नहीं पाता
सभ्य परिमार्जित
आज का प्रेम।
छगन लाल गर्ग।
प्रेम भी
लोभ और मोह के
नहीं रही
उसमें आनंद की उर्मी
नहीं तडपती
प्राणों की ऊर्जा
तडपन देता मात्र
अहंकार का घाव
भीतरी स्फुरण
आत्मा का
नहीं होता
रूग्ण हो चुका नेह
चित चाहता
एकाधिकार विशिष्टता का
प्रेम दान झलक
भूला सा
चाहता प्रतिदान
प्रतिमा बन चुका
युग का शास्वत नेह
केवल शब्दों के
मीठे ताने बाने बुनता
अगरबती के घुंऐ सा
सुगंध देता
करता जाता आशक्त
ओर शास्वत प्रेमिल प्रतिमा
शब्दों के धुऐ से
होती जाती
नित कालिमा युक्त
अनंत का
स्पर्श नहीं पाता
सभ्य परिमार्जित
आज का प्रेम।
छगन लाल गर्ग।