नितांत अकेलापन
अब नही करता व्यथित
जुडने लगा शायद
अपने साथ
अब नही भाता
बाहर का मोह
खूब जाना
ओर जीया जीवन
संसार की हर अवस्था मे
ठीक रहा
स्वबोध का क्षण पाया
थोडा थिर हुआ
द्वेत का फर्क अब आता
मनन मे
स्थूल देह करती जाती
प्रभावित
सूक्ष्म को
बनाने लगती शिथिल स्वरूप
पर अनुभूति का सच
रश्मि बन देने लगता
संबल
चेतना को
नही हूँ देह मैं
बनती अवधारणा
सच का बिम्ब
होने लगता साक्ष्य
खुद का
कभी जुडता देह तो
तुरंत चेतन देता झटका
होता जाता दूर
अपने से
पर टूटने के बाद भी
चाहत रहती जुडने की
कही ओर
बिना सहारे अस्तित्व का
शून्य मे भटकाव
ओर शून्य में टिकना
असंभव
सूक्ष्म ऊर्जा भी
जगह चाहती
नकारात्मक
नही हैं अस्तित्व
अस्तित्व ठौर चाहता
ढूँढता हूँ विकल्प
मेरे होने का
निरंतर जागरूकता से
पाता हूँ विकल्प देह
ऊर्जा मय चेतना घिरी
अदृश्य देह
अधिक स्फूर्त चेतन ओर
रसमय अदृश्य मे
रश्मि भरती
बार बार संबल देती
जागती जगाती मुझे ।
छगन लाल गर्ग ।
अब नही करता व्यथित
जुडने लगा शायद
अपने साथ
अब नही भाता
बाहर का मोह
खूब जाना
ओर जीया जीवन
संसार की हर अवस्था मे
ठीक रहा
स्वबोध का क्षण पाया
थोडा थिर हुआ
द्वेत का फर्क अब आता
मनन मे
स्थूल देह करती जाती
प्रभावित
सूक्ष्म को
बनाने लगती शिथिल स्वरूप
पर अनुभूति का सच
रश्मि बन देने लगता
संबल
चेतना को
नही हूँ देह मैं
बनती अवधारणा
सच का बिम्ब
होने लगता साक्ष्य
खुद का
कभी जुडता देह तो
तुरंत चेतन देता झटका
होता जाता दूर
अपने से
पर टूटने के बाद भी
चाहत रहती जुडने की
कही ओर
बिना सहारे अस्तित्व का
शून्य मे भटकाव
ओर शून्य में टिकना
असंभव
सूक्ष्म ऊर्जा भी
जगह चाहती
नकारात्मक
नही हैं अस्तित्व
अस्तित्व ठौर चाहता
ढूँढता हूँ विकल्प
मेरे होने का
निरंतर जागरूकता से
पाता हूँ विकल्प देह
ऊर्जा मय चेतना घिरी
अदृश्य देह
अधिक स्फूर्त चेतन ओर
रसमय अदृश्य मे
रश्मि भरती
बार बार संबल देती
जागती जगाती मुझे ।
छगन लाल गर्ग ।