Wednesday, June 15, 2016

मन का ममत्व

अजय नही
मन का ममत्व
मान मनुहार
मन मांगता ममतामय
मिले मर्म मोहित
मन होता मस्त
मदमस्त
सरल जीवन की श्वास
चलती मात्र स्नेहवस
अविरल प्रेम रस बहता
बहाव दोनो ओर ही
नही अवरोध इर्ष्या का
तुलनात्मक अध्ययन
नही रहता
हिसाब किताब
बेहिसाब धूमिल करता जाता
अस्तित्व अपना
नही लगता जीवन योग्य
ओर
शास्वत स्नेह का उफान उठता
बनता लहर अनंत की
नही लगता
फिर कि मै वही मानव
जो अहंकार अस्तित्व मे
हो जाता
कभी हिटलर कभी मुसोलिनी
आह वह शून्य हुआ
यह जीवन का अमूल्य पल
जहां खो जाता
वर्चस्व अपना
नही रहता मैं
नही रहता होने का तनाव
यही है वह पल
जहां नही रहता मैं
हो जाता विलय
परम सत्ता के संग
निराकार आकार होते भी
कभी करो ना महसूस
नही होना तुम
छगन लाल गर्ग