बडा अजीब मजा
शब्द खेल खेलने का
नही जाता अपना कुछ
ना बुद्धि ना धन
एकाधिकार रहता हर शब्द पर
मेरा अपना
कहूँ कुछ भी अर्थ निकलते
कर जाते काम
उनका अपना शब्द
मेरा क्या इसमें
बस जोड देता उपर अपना
प्रचलित नाम
मेरा अपना बनाया
भाव अर्थ कविता के
कब निकले जो आज निकलेगा
भाई कोन पूछता
लिखते रहो बस
हां थोडा
ओकात का लेबल हो
बाकी चालत सब कुछ
आज तक नही मिला अर्थ या रस
किसी भी कविता मे
नीरसता पाया हूँ
आधुनिक कियो के
गिरते स्तर से
अब नही लगता
कविता भी कोई पढेगा
व्यक्तित्व पहचान पाये बिना ।
छगन लाल गर्ग ।
शब्द खेल खेलने का
नही जाता अपना कुछ
ना बुद्धि ना धन
एकाधिकार रहता हर शब्द पर
मेरा अपना
कहूँ कुछ भी अर्थ निकलते
कर जाते काम
उनका अपना शब्द
मेरा क्या इसमें
बस जोड देता उपर अपना
प्रचलित नाम
मेरा अपना बनाया
भाव अर्थ कविता के
कब निकले जो आज निकलेगा
भाई कोन पूछता
लिखते रहो बस
हां थोडा
ओकात का लेबल हो
बाकी चालत सब कुछ
आज तक नही मिला अर्थ या रस
किसी भी कविता मे
नीरसता पाया हूँ
आधुनिक कियो के
गिरते स्तर से
अब नही लगता
कविता भी कोई पढेगा
व्यक्तित्व पहचान पाये बिना ।
छगन लाल गर्ग ।