Friday, June 17, 2016

एकाकीपन के सघन सुख

तुम नही मानोगे
विवश तुम
तुम्हारी हसीन जिन्दगी का सच
ले जाता तुम्हें
एकाकीपन के सघन सुख की ओर
नही कसूर तुम्हारा
कसूरवार मैं ही रहा
तुम्हें लायक बनाने का
कि जी सको सुंदर प्रभात
जीवन का
ओर मैं मोह फंसा
नारकीय प्राणी
नही समझ पाया
स्वार्थ का सच
विगत को नही जी सका
बेहतरीन
ओर यही कारण
आज नितांत अकेला हो गया
कोन होता अपना
स्वार्थ बिना
एक अचेतन का सपना
औलाद सुख बहुत दुर्लभ
उस दशा मे ओर भी
जब औलाद वैभव जीये
जिसे खुद संघर्षरत रहकर
किया हो संग्रहित
या कि पढा लिखाकर बना दिया हो
उच्च पदस्थ
फिर यह कटु परिणाम निश्चित
तुम होते रहते उपेक्षित
ओर टूटते हृदय के साथ
तुम्हारा देखा सपना
खुली आँखो का
अंधमोह फसकर पालता रहा
विखंडित होकर जर्जर होता
तुम्हारे साथ साथ
चलो ठीक तुम अपने कब थे
जो देते संबल
हर उम्र का अपना रोना
बाल्यकाल मे खूब रहे आत्मीय
नही खटका कभी
कि रूठना होता भी है कभी
ओर भ्रम जीता रहा मै भी
कि नही दोगे दगा
तुम्हारी जवानी ओर मेरा बुढापा
बन जायेंगे विपरीत ध्रुव
ओर यही हुआ
आलीशान तुम्हारी बीबी सा
तुम्हारे ही ससुराल मे तुम्हारा घर
बडा शोभनीय लगता
प्रशंसा के पुल बांधते नही थकते
तुम्हारे प्रशंसक
वही प्रशंसक
जो मेरे अतीत के प्रबल विरोधी
आज व्यंग्य से हंसते
अच्छा हैं यह तो होना ही था
आखिर तुम्हे संस्कार तो
कही कही मिले तो होगे हमसे ही
अच्छा है इंतकाम का समय
फलबत दे तुम्हे हमारी दुआ
छगन लाल गर्ग