Friday, June 17, 2016

अधूरापन

अधूरापन हर बात का
शुरूआत तो हैं पर
अंजाम अनिर्णित छोडता हूँ हर बार
हर कविता विचारों के गुम्फन मे
घिरती बन जाती गुत्थी
बिन सुलझी अर्थ हीन बेकाम
तर्क ओर विश्लेषण से अछूती मिटते अस्तित्व सी
मेरी कविता नहीं देगी पंडिताई
या कि वैज्ञानिक विचारधारा
यह केवल एक बेबूझ ध्यान का नशा
जागरूक हुआ
बेभान हुआ बहता जाता अज्ञात की ओर
एक अंत हीन यात्रा की ओर
जो कभी समझदारी मे पूरी नहीं होती।
छगन लाल गर्ग