Tuesday, June 14, 2016

युग साक्षी

युग साक्षी बना
यांत्रिक है मानव
शरीर के अति निकटस्थ
अवस्था बन चुका हर व्यक्ति
बहुत रूचिकर लगता
शरीर निमित्त जीना
यही मकसद लक्ष्य बना
हमारी प्रगतिशील जिन्दगी का
अब नही दर्द उमडता
ओरों की दारूण दशा से
सभ्य माँ भी अब नही लेती
जौखिम पुत्र के लिए
अब नही बहता
वात्सल्य रस का निर्झर
यह सब हो गया
दकियानूसी बकवास
जीवनशैली हो चुकी तार्किक
लेन देन का संतुलन ही प्रगति
रिश्ते नाते
आचार विचार ओर भाव भंगिमा
सभी सहुलियत के लिए
जीवन बनता जा रहा
शारीरिकफैशन का अंग
ओर यही कारण
आध्यात्मिक कर्मकांड भी अब
केवल विस्तार करते जाते
आधुनिक पृष्ठभूमि मतलबी कट्टरता
गुरूमठ शरीर ओषधि केन्द्र
आध्यात्मिक राजनीति दांव बाजार
कहां रह गया जीवन का स्पंदन
नही मिलता बाहर कही
विकल होकर आज के क्षण
खोजता हूँ मेरे भीतर
थकी चेतना के बावजूद भी
मेरी जीवन आस्था का राग
समझने को डूबता हूँ
संपूर्णता के साथ बिना बचाये
खुद की अस्मिता
आह धन्य भागी हूँ मैं
आने लगा थोडा थोडा
अनजाना नशा
जब दूर होने लगता शरीर से
आह भूल उठता मापदंड
परंपरागत शिष्टाचार
कैसा हैं यह दीवानापन
शायद अदृश्य खोज रश्मि
उतरती अनंत गहरे
यह है श्रृद्धा का पागलपन
जीवन की संपदा
नही अटकाव अब इन्द्रियों का
अनंत अस्तित्व बन गया मैं
महासागर सा विराट गहन
पाने लगा चित सागर सी मौज
उतुंग लहरों का उफान
ओर भीतरी असीम गहराईयाँ
सूत्र पा चुका
असीम की राह का
ओर असीम सीढी बनी
मेरी श्रृद्धा
राग रस का अलौकिक निर्झर
पावन भावमय सागर
जीवन का आधार बनती जीवंत
मेरी श्रृद्धा
मानवीय संवेदना से युक्त
यह तरंग देती संदेश
जीवन नही मात्र शरीर अपितु
महासागर परमसत्ता का अंश
जहां मिटने की हौड लेती तरंगे
विलय होकर बनती स्वयं महासागर
छगन लाल गर्ग