मान नहीं अपमान ही दे दो
अहसास कुछ तो हो
कि कहीं हूँ
रूप सौन्दर्य रूतबा मुबारक
कुरूप दलित खंडहर बिंब तो हूँ
शायद बचें संभावना
कभी ईश्वरीय रश्मि उतरें भीतर तुम्हारे
ओर समझ सको
चित्रकार शिल्पी ओर प्राण प्रणेता को
जिसने दिया आकार मुझे भी तुम्हारी तरह
संभवतया समझ बढ़े ओर मानो
मेरा भी मानव होना
तब तक मुझे मान नहीं
अपमान ही दे दो ।
छगन लाल गर्ग ।
अहसास कुछ तो हो
कि कहीं हूँ
रूप सौन्दर्य रूतबा मुबारक
कुरूप दलित खंडहर बिंब तो हूँ
शायद बचें संभावना
कभी ईश्वरीय रश्मि उतरें भीतर तुम्हारे
ओर समझ सको
चित्रकार शिल्पी ओर प्राण प्रणेता को
जिसने दिया आकार मुझे भी तुम्हारी तरह
संभवतया समझ बढ़े ओर मानो
मेरा भी मानव होना
तब तक मुझे मान नहीं
अपमान ही दे दो ।
छगन लाल गर्ग ।