Monday, June 13, 2016

तुम कहते बढ़िया हैं

 तुम कहते बढ़िया हैं 
थोड़ा कहो तो
शायद कहीं भ्रम टूटे 

कहते क्यों नहीं 
बढ़िया वाली कुछ बातें 
देखो बढ़िया घटिया शब्द 
काफी चलते हैं 
लगता ऐसा रूटिन घसीटते हैं 
भाई मेरे 
सच कहो
पिता का दमा 
माँ का लकवा
पुत्र की नौकरी 
ओर तुम्हारा चाय का धन्धा
बताओ सब कैसे हैं 
उदास लम्हे आये 
मित्र नेत्र गिले दिखे
मत कहो
कह दिया 
सुना भी समझा भी
नये युग मे
शब्द अपने अर्थ खोते हैं ।