तुम कहते बढ़िया हैं
थोड़ा कहो तो
शायद कहीं भ्रम टूटे
कहते क्यों नहीं
बढ़िया वाली कुछ बातें
देखो बढ़िया घटिया शब्द
काफी चलते हैं
लगता ऐसा रूटिन घसीटते हैं
भाई मेरे
सच कहो
पिता का दमा
माँ का लकवा
पुत्र की नौकरी
ओर तुम्हारा चाय का धन्धा
बताओ सब कैसे हैं
उदास लम्हे आये
मित्र नेत्र गिले दिखे
मत कहो
कह दिया
सुना भी समझा भी
नये युग मे
शब्द अपने अर्थ खोते हैं ।
थोड़ा कहो तो
शायद कहीं भ्रम टूटे
कहते क्यों नहीं
बढ़िया वाली कुछ बातें
देखो बढ़िया घटिया शब्द
काफी चलते हैं
लगता ऐसा रूटिन घसीटते हैं
भाई मेरे
सच कहो
पिता का दमा
माँ का लकवा
पुत्र की नौकरी
ओर तुम्हारा चाय का धन्धा
बताओ सब कैसे हैं
उदास लम्हे आये
मित्र नेत्र गिले दिखे
मत कहो
कह दिया
सुना भी समझा भी
नये युग मे
शब्द अपने अर्थ खोते हैं ।