कोई कहता कैसे हो अब
ठीक हैं तुम्हारी तबीयत
क्या करते हो आजकल
निकल जाता समय
कुछ करते हो
यह किसी ओर से नही
मुझे मिले प्रश्न हैं
दिन की शुरुआत के साथ
मेरे संगी रहे कनिष्ठ साथी गण के
ओर भी जान पहचान वाले
प्रश्न यही लहजा अलग अलग
अब नोकरी ओर रिटायरमेंट
आरंभ ओर अंत के प्रतीक
न पुरूस्कार न सजा
पर यह आज
हर प्रश्न कर्ता की वासना का मजा
तुम्हारा ढंग तुम्हारी व्याख्या
तुम्हारी समझ भरी चुनौती मेरे लिए
लगता हैं कोई शिकायत
प्रकट होना चाहती वक्त देख
तुम्हारा रस लेकर पूछना
खटखटाना चाहती अतीत
जब तुम हुए घायल
मेरे प्रभुत्व वस उस अतीत का
हरेक शब्द मेरा कुरेदने लगता तुम्हें
जैसे आज तुम्हारी हर वक्रता
छालती हैं मुझे
मैं रहना चाहता
चुप मौन बेबूझ हूँ नयी स्थिति
पर तुम झांकने लगे हो मेरे मौन मे भी
नही छोडना चाहते तुम
बिना कहे मुझे
मेरी अडचण दुसरी हैं
जब व्याप्त होने लगता परमात्मा
तब नही बचा पाता स्वयं को
ओर जब बचा था तब
शिकायत रही तुम्हारी
अब हम हैं नही
मैं की नाव खूब दौडी
अब खाली खाली
अब हमे होने दो तुम्हारी
पकड से बाहर ।
छगन लाल गर्ग ।
ठीक हैं तुम्हारी तबीयत
क्या करते हो आजकल
निकल जाता समय
कुछ करते हो
यह किसी ओर से नही
मुझे मिले प्रश्न हैं
दिन की शुरुआत के साथ
मेरे संगी रहे कनिष्ठ साथी गण के
ओर भी जान पहचान वाले
प्रश्न यही लहजा अलग अलग
अब नोकरी ओर रिटायरमेंट
आरंभ ओर अंत के प्रतीक
न पुरूस्कार न सजा
पर यह आज
हर प्रश्न कर्ता की वासना का मजा
तुम्हारा ढंग तुम्हारी व्याख्या
तुम्हारी समझ भरी चुनौती मेरे लिए
लगता हैं कोई शिकायत
प्रकट होना चाहती वक्त देख
तुम्हारा रस लेकर पूछना
खटखटाना चाहती अतीत
जब तुम हुए घायल
मेरे प्रभुत्व वस उस अतीत का
हरेक शब्द मेरा कुरेदने लगता तुम्हें
जैसे आज तुम्हारी हर वक्रता
छालती हैं मुझे
मैं रहना चाहता
चुप मौन बेबूझ हूँ नयी स्थिति
पर तुम झांकने लगे हो मेरे मौन मे भी
नही छोडना चाहते तुम
बिना कहे मुझे
मेरी अडचण दुसरी हैं
जब व्याप्त होने लगता परमात्मा
तब नही बचा पाता स्वयं को
ओर जब बचा था तब
शिकायत रही तुम्हारी
अब हम हैं नही
मैं की नाव खूब दौडी
अब खाली खाली
अब हमे होने दो तुम्हारी
पकड से बाहर ।
छगन लाल गर्ग ।