मायूस हूँ
खुद की पहचान
से
शायद नही खुल पाया भीतरी तहें
घनीभूत भयावह घृणित नद बहते
काढा सा जमा दलदल बना वासनाओं का
उपरी खौल बना कर सफेद उजला
छलावे की माया का बन गया वाहक
यही कारण अंतराल पर खडा पुकारूँ
खुद को खो चुका ठगा गया खुद से
ओर फासलों के संकेत हो चुके असीम
केवल अब रह गया शरीर बनकर
नही पाता शुकून फिर मिलेंगे खुद से
दूरीयाँ अब मिटे अस्तित्व तो मिटे
चलो मिटने की राह अंधकार घना
चाहत रश्मि अब सहारा बनकर पहचान मुझे
वही हूँ जो कभी अंश रहा तेरा
आज पहचान का झूठा ही सही सहारा दे दे
ना सही मेरी रहे पहचान कोई
बस तुझमें बसने की थोडी सी ढांढस दे दे ।।
छगन लाल गर्ग ।
शायद नही खुल पाया भीतरी तहें
घनीभूत भयावह घृणित नद बहते
काढा सा जमा दलदल बना वासनाओं का
उपरी खौल बना कर सफेद उजला
छलावे की माया का बन गया वाहक
यही कारण अंतराल पर खडा पुकारूँ
खुद को खो चुका ठगा गया खुद से
ओर फासलों के संकेत हो चुके असीम
केवल अब रह गया शरीर बनकर
नही पाता शुकून फिर मिलेंगे खुद से
दूरीयाँ अब मिटे अस्तित्व तो मिटे
चलो मिटने की राह अंधकार घना
चाहत रश्मि अब सहारा बनकर पहचान मुझे
वही हूँ जो कभी अंश रहा तेरा
आज पहचान का झूठा ही सही सहारा दे दे
ना सही मेरी रहे पहचान कोई
बस तुझमें बसने की थोडी सी ढांढस दे दे ।।
छगन लाल गर्ग ।