Wednesday, June 15, 2016

मंडलेश्वर हो

मंडलेश्वर हो तुम साहित्य कार
बना रखे अखाडे
जिनमे अनुयायी करते जाते निर्वहन
ओर एक अभेद्धय इंतज़ाम
बडी कूटनीतिक चतुराई बनाती घेरा
तुम्हारी सुरक्षा का
ओर बेखटके पनपता यश पाता
आज तुम्हारा स्वयं से अज्ञेय व्यवसाय
एक जमात राजनीति की तरह
तुम्हारे इर्द गिर्द भी चमचों की
जिनका हो चुका एकाधिकार
हर प्रसार प्रचार की व्यवस्था पर
संयुक्त स्वर विभिन्न राग रागिनी मे
गाते तुम्हारे श्लाघामय गीत
सुसंस्कृत भाषा का वस्त्र पहने बन जाती
वही समीक्षा
वाह नमन करता तुम्हें महामंडलेश्वर
अब नही पनप सकते तुम्हारे रहते
सूर तुलसी या कि मीरा
निराला महादेवी प्रसाद की होने लगी
अब भ्रूण हत्या
धन्य तुम्हे तुम्हारी युग क्षमताओं की
पैनी साहित्य मर्मज्ञता निमित्त ।
छगन लाल गर्ग ।