अभी अभी
दृष्टिवत हुआ आत्म जिज्ञासा से
भीतर का प्रकाशन
पाना चाहता कवि का मन
मनुहार करता
पाठको को
कि एक दृष्टि देखो तो
मेरी कविता
अनंत सी विस्तृत
हर अंश
जीगर का इकजाई हुआ
शब्द बना
बडी गहराई छीपाये है
मेरी कविता का प्रत्येक शब्द
सच कहूँ
इस इस्तहार को पढने के बाद
मन नही हुआ
कि झांकूं
तुम्हारी कविता की ओर
क्या करूंगा गहराई का
ओछेपन की जिन्दगी मे
तुम्हारा गहरापन
क्या सहूलियत दे सकेगा मुझे
नही नही रहने दो
गहराई
लिखो ना कुछ इस तरह
जो लगे
हमे शब्द देकर साथ लेता
जिन्दगी की
तरजीह मे जोडना चाहता
यह लिखो
तो इस्तहार बिना भी
पढना पडेगा मेरे कवि तुम्हे
बार बार ।
छगनलाल गर्ग ।
दृष्टिवत हुआ आत्म जिज्ञासा से
भीतर का प्रकाशन
पाना चाहता कवि का मन
मनुहार करता
पाठको को
कि एक दृष्टि देखो तो
मेरी कविता
अनंत सी विस्तृत
हर अंश
जीगर का इकजाई हुआ
शब्द बना
बडी गहराई छीपाये है
मेरी कविता का प्रत्येक शब्द
सच कहूँ
इस इस्तहार को पढने के बाद
मन नही हुआ
कि झांकूं
तुम्हारी कविता की ओर
क्या करूंगा गहराई का
ओछेपन की जिन्दगी मे
तुम्हारा गहरापन
क्या सहूलियत दे सकेगा मुझे
नही नही रहने दो
गहराई
लिखो ना कुछ इस तरह
जो लगे
हमे शब्द देकर साथ लेता
जिन्दगी की
तरजीह मे जोडना चाहता
यह लिखो
तो इस्तहार बिना भी
पढना पडेगा मेरे कवि तुम्हे
बार बार ।
छगनलाल गर्ग ।