आने दो ना प्रखर धूप
तपना चाहता
तीक्ष्ण उर्मि का भेदक वार
जगाता हर अणु परमाणु
ओर मैं पाता जाता अहसास होने का
आने दो प्रबल आवेगमय जलन
जलना चाहता भीतर तक
बहुत जीया छायाओं के आवरण
अचेत जड बेबुझ खोया खोया अपने को
नही बहुत हुआ अब नही चाहता
ओट सबल कि निश्चित रहूँ
अपनेपन गहरी उष्मा पाये बिना
गैरो की उष्मा का आसरा
खुद का खोना होगा
ओर नही चाहता कि अज्ञात सा अंश बन
यह चेतन अस्तित्व मिटता रहे
ओर रिक्तता का सत्य अहसास पाये बिना
स्वीकार कर लूँ
नहीं हो सकेगा मुझसे
चाहता हूँ जिन्दगी के तमाम अभिशाप आये
घेरे मुझे
ज्वालाओं के पुंज अपनी तमाम शक्ति से जलाये मुझे
स्वीकार हैं मुझे हर आफत
संघर्ष जीना चाहता मैं मिट जाने से पहले
जलना चाहता मे जीवन की हर तपिश
कि बन सकूं सही अर्थों मे जीता समझा
फूल सी जिंदगी का हकदार हुआ
सुरभित नमनीय ओर कर्मण्य मानव ।
छगन लाल गर्ग ।
तपना चाहता
तीक्ष्ण उर्मि का भेदक वार
जगाता हर अणु परमाणु
ओर मैं पाता जाता अहसास होने का
आने दो प्रबल आवेगमय जलन
जलना चाहता भीतर तक
बहुत जीया छायाओं के आवरण
अचेत जड बेबुझ खोया खोया अपने को
नही बहुत हुआ अब नही चाहता
ओट सबल कि निश्चित रहूँ
अपनेपन गहरी उष्मा पाये बिना
गैरो की उष्मा का आसरा
खुद का खोना होगा
ओर नही चाहता कि अज्ञात सा अंश बन
यह चेतन अस्तित्व मिटता रहे
ओर रिक्तता का सत्य अहसास पाये बिना
स्वीकार कर लूँ
नहीं हो सकेगा मुझसे
चाहता हूँ जिन्दगी के तमाम अभिशाप आये
घेरे मुझे
ज्वालाओं के पुंज अपनी तमाम शक्ति से जलाये मुझे
स्वीकार हैं मुझे हर आफत
संघर्ष जीना चाहता मैं मिट जाने से पहले
जलना चाहता मे जीवन की हर तपिश
कि बन सकूं सही अर्थों मे जीता समझा
फूल सी जिंदगी का हकदार हुआ
सुरभित नमनीय ओर कर्मण्य मानव ।
छगन लाल गर्ग ।