Tuesday, June 14, 2016

राग रमा

राग रमा नही
विवर भ्रमित भटकन भाती रही
हर गिरी गह्वर सरित प्रवाह में ढूँढता रहा
अपनत्व कि ठहराव मिले
चाहत रही कहीं रूके कदम
विश्रांति निमित्त
पहचान कर सकूँ अपनी परायी
नही मिला कही आतिथ्य
हर बार ठुकराया गया अस्तित्व
कारण समझ क्षमता आधी अधूरी
कही आंशिक सत्य
हर बार बोल उठता बेबाक हुआ
हर झलकती गंदगी का सत्य
नही झेल पाते गिरी गह्वर सरित के प्रहरी
सत्य वचन का ताप
यही कारण आज तक
शून्य विचरण करती पवन सम
नही पाया कही ठौर स्नेह
यह मानव जन्म कही राग रमा नही
छगन लाल गर्ग