Friday, June 17, 2016

मानवीय जीवन ।

मेरा कहा नही भाता
अनेक कारण नही केवल एक
बस यही कि मैं असफल रहा
तुम्हारी तुलना मे नही टिक सकता
आज नन्ही सी उम्र के तजुर्बे से हुआ परास्त
नही बना सका पक्की छत तक
आज तक
तुम्हारे कमाई की बरकत का फल
आज बन गया मेरा मकान भव्य मंजिल
सब जगह चर्चे मे तुम
कोसते हर बार मुझे लोग
तभी चढता रंग तेरी प्रशंसा हो जाती सतरंगी
कि पुत्र पीढी पर छा गया
कर गया रोशन कुल अपना
ओर मैं उपेक्षित उपहास का पात्र बन सुनता
अहसास करता दुगुनी खुशी
निष्कलंक सरल जिन्दगी मेरी
ओर आज की सक्षम सभ्य जिन्दगी तेरी
अज्ञात हूँ कौन जी सका
असली मानवीय जीवन
छगन लाल गर्ग