Monday, May 30, 2016

मत कहना
अनुभूति सत्य
अच्छा नही रहेगा
श्रेष्ठता तुम्हारी
बन सकती आफत जीने की
निर्लिप्तता बहुत बडा दोष
इस युग का
अस्तित्व हीन तुम
बिना पक्ष संगठन
पहचान नही हो सकेगी
अगर बिन पूछे भूल कर
देते सुझाव
घसीटते रहोगे पंगु बन
माना कि तुम विद्या सागर
पर मत कहना
आजकल हर व्यक्ति
कच्ची उम्र मे पा जाता
परिपक्वता सामयिक
नही देखा तुमने
उच्च शिक्षा शास्त्री
वक्ता प्रवक्ता स्कूल कालेज के
प्रगाढ प्रतिभा के धनी
कैसे चाटते शरण
हमारे परिपक्व तपे तपाये नेता
तपस्वी से अधिक तपने के बाद
पायी हुनर
क्या मतलब तुम्हारा
डिग्री से आती समझ
असल में वेरागी सता के
साक्षर पर जिन्दगी के पारखी
राज नेता भई वाह
स्वतः नमन हुआ जाता तन
उनकी वाकपटुता के बल
भीड का
जोखिम भरा नेतृत्व
देश उनका भीड उनकी
विपरीत वजूद धारी का
चलता निरंतर
दांवपेंच
कैसे कर जाते कुंठित अपाहिज
बडा घमासान संसार मतलब का
चुप रहो तुम मत कहो
जीवन का मर्म
नही चाहिए किसी को भी
वक्ता नेता या विचारक को
कोई मानवीय विचारधारा
सब धुन के पक्के
देश के युग निर्माण मे लगे
देखो तुम सठिया गये
उम्र तुम्हारी नही रही
सृजन की
मार्गदर्शन चाहा किसने
हम जानते सब
रश्मिरथी हम नवीन चेतना वीर
रोको मत कहो मत
ठोकर खाकर गिर ना जाओ
बीच बोले तो
सुनो अच्छा नही रहेगा ।
छगन लाल गर्ग ।




Sunday, May 29, 2016

विराग राग


भर चुका अब भर चुका प्रेम प्याला रसमय होकर ।
हे अनंत सघन सुख को लगे न संचय की ठोकर ।।
उजाला हर पल रहता नहीं हैं अंधेरा हल्का सुराग पाता हैं ।
चुपके आते झौका बनकर गहन दारूण दुख देता हैं ।।
प्रकृति तेरा रूप बदलना सुख दुख का परिणाम हैं ।
पृथ्वी का विस्तार समझना मंथर मन का भटकाव हैं ।।
छूट सकता नहीं दुख जाल से हिल चूके हौसले मेरे दीवार से।
चित चूभा वार हुआ तलवार से पुख्ता नीव हिली शौर हुआ दिल से।।
कहा अनकहा रह गया हैं बड़ा अब लघु रह गया हैं ।
जल रहे दीये रोशनी नहीं हैं अंधेरा घना आँखे नहीं हैं ।।
चला बहुत अब थक गया हूँ तन जर्जर हौसला हारा हूँ ।
मार मिली घातक तडप गया हूँ बूँद लघु विलुप्त हुआ हूँ ।।
बोल सको तो अब मेरे जीवन बोलो
खोल सको तो अपनी पलके खोलो
डौलती धरा अब तुम भी कुछ डोलो
जीवन मे थोड़ा सा नेह अब घोलो ।
आशा निराशा की आँख मिचौली
धूप छांव खेले आँगन मेरे होली
रात दिवस की यह नित्य रैली
यह खेल विधि का अदभूत शैली ।
आज जीवन हैं कल कैसे कहूँ
कल आता भी हैं आज कैसे कहूँ
रात सी रात हैं उजाला कैसे कहूँ
आग सी आग हैं ठंडी कैसे कहूँ ।
क्षण हैं अभी तो मैं भी हूँ कण हैं अभी विस्तार  हूँ ।
पल हैं अभी चेतना भी हूँ जल हैं जलाशय भी हूँ ।।
पकडना पल चाहता हूँ सिमटना कल चाहता हूँ ।
लिपटना नेह चाहता हूँ बिखरना नहीं चाहता हूँ ।।
नव नीड नेह फिर बने भव भाव कोमल फिर बने।
जग खशनुमा हो फिर चले राग बंशी रस दायक बने।।
हो जाय जीवन कमनीय फिर खो जाय खार खेद छल फिर ।
सो जाये भोग नींद भरी फिर हो जाये अलौकिक मैल फिर ।।
ऋणदाता तेरा सदा रहेगा जख्म मेरा अब नहीं भरेगा।
माया मोह जाल नहीं बढ़ेगा हे ईश्वर तेरा आसरा रहेगा।।
हैं क्या ऐसा जिसमें तू नहीं दे क्या वेसा बनाया तूने नहीं ।
ले क्या वेसा बसेरा तेरा नहीं हे मालिक मेरे तू हैं कहां नहीं ।।
काश शब्द कुछ बोल पाते राज कुछ आज हल होते।
हास से भाव खुल जाते जाल जीवन छोड़ जाते ।।
बोले बिन क्या अंदाज लगाये रैन अंधेरी कौन दीप जलाये ।
नित पल रहे नैन कैसे भाये छोड़ चल दिये जीवन के छाये।।
किस लोक बसे मेरे प्राण क्या मुझे देना था त्राण ।
ढूँढा देव विफल हूँ करूण तुम मेरे चित कहां अरूण।।
जहां कहीं जन्म लो फिर नेह मेरे प्राण इस जन्म के जैसे।
रहे तेरे सत निर्मल झरने जैसे परहित तत्पर रहो पहले जैसे ।।
करूण घन घट मे छा गया हैं स्मृति तडाग प्रकाश आ गया हैं ।
विवश नयनों का बारिश हो गया हैं चित सरोवर पूरा भर गया हैं ।।
प्रवाह वेग अति प्रखर हो गया हैं प्राण पंखेरू उडान चाहते हैं ।
रूठे प्राण प्राण एकरसता चाहते महा मिलन प्राण पाना चाहते हैं ।।
रूक सकूँ यह हो सकता नहीं मोह बंध हो वेसी रज्जू नहीं ।
जुड़े तार तोडे जग काबिल नहीं नदी सागर मिले जीव सार यही ।।
ले चल मुझे हे बहते पानी धीरे धीरे कोमल राह राही ।
प्रेम सनी जहाँ छांव हो घनी विपदा जग न जले चिता ही।।
हर्ष उल्लास प्राण को घेरे निश्छल नेह निर्झर बहता रहे।
मन का भौरा कुसुम कुसुम पर नित नवरस पराग मद सोहे।।
भूल भूलैया जग माफी चाहता हूँ
भटकन से छूट जाना चाहता हूँ ।
पीर प्रेम छल से हताश हो गया हूँ
थक गया अब गहरी नींद चाहता हूँ ।।
चाह सारी शून्य हो गयी है ।
राह अब कोई शेष रही नहीं हैं ।
प्रेम विरल बन बह गया हैं ।
मरूस्थल सा तन रह गया हैं ।।










विराग @


लाभ हानि का जोड जीवन जरा मरण का सार जीवन ।।
करू कैसे कमनीय करनी चलूं कैसे पतली गली घनी ।
रहूं कैसे राखनहार से तनी जीऊं कैसे कसक हैं घनी।।
भार झेल बीदक गया हूँ मार मारक थक गया हूँ ।
भंवर भारी फस गया हूँ पांव पसारे गीर गया हूँ ।।
धडकने धीमी हो गयी हैं करूणा कातर हो गयी हैं ।
गिरा कठोर हो गयी हैं सारा जहां बौझिल हो गया हैं ।।
प्रेम विरल बन बह गया हैं ।
मरूस्थल  देह रह गया हैं ।
सुरभित कुसुम झड गया हैं ।
ठूठ जड देह रह गया हैं ।।
दुनियादारी दौर चल रहा हैं
जरा का जोर झकझोर रहा हैं
काम कामना कपट काट रहा हैं
पाप पकडता पुण्य भाग रहा हैं ।
रात रोधक रोशनी नहीं हैं
काल कर्कश कठोर रहा हैं
अजनबी अजय रूप रहा हैं
भाव भूले भटके जी रहे हैं ।
तार टूटे तटके संगीत सूना रहा हैं
राग रंजन रागिनी सूनी हो गयी हैं
लाल लौचन लालिमा नीर खो गया हैं
तन तनाव मय तार वीणा टूटे पड़े हैं ।
फफक फफक फलक हीन सार
भटक भटक दारूण ठेस अपार
बहक बहक होश बहुत कसकदार
टपक टपक नीर न हैं रोकनहार ।
छिटक रही तपन वहीं लिपट रही पीर वहीं ।
निपट भ्रम रोंप रही सिमटी रसगागर यही ।।
सपने सपने चाह बढी लडते लडते कुंठा कुढी।
आर पार मन की मुढी रही रही केवल बूढ़ी ।।
तन कसावट जर्जर जर्जर मन चंचलता मंझर मंझर।
नैन बिलखते निर्झर निर्झर बदहाली हैं हर डगर डगर।।
पंछी उड उड उड़ान अकेले पंथी संग न रहेंगे पहले ।
डाल डाल पर कंटक कटिले छाँव ठौर नहीं रही पगले ।
ललक बसा छल जल ही पाया
महक मोह फस जाल ही पाया
रस रोचक घुल खार ही पाया
मन माफिक खा जहर ही पाया।
सुंदर सुंदर लावण्य मद भरा कुन्दन कुन्दन तन रस भरा।
मादक चितवन नेह घनेरा वहीं आज बना काल का घेरा।।
माया तेरी मटक मनमोहक काया तेरी चटक चितहारक ।
नैनो का तिरछापन आकर्षक छलावा बड़ा होता घातक।।
डूब गया हाँ डूब गया मैं तृष्णा घिनोने तालाब में ।
कीचड़ भरा तन लेके मैं धोने दौडा हूँ अब सागर मे ।।
घने बियावन भाग रहा हूँ राह सागर पाता नहीं हूँ ।
राही पारखी छोड़ चुका हूँ पगला गया भूला भटका हूँ ।।
कह दो हे मेरे जीवन कह दो
डोलूं भटकूं  कितना कह दो
मददगार कोई हो तो कह दो
अपना पराया भेद खोल दो ।
कठोर कंकाल काल जायक कर्कश कलरव कूंठा दायक ।
कल्पित कोमल कौल मारक कमनीय करनी जीवनदायक ।।
धरम धारण धारा धारक धीक धौखा अधरम कारक ।
धडकने धडके धौये पापक धारणा धारे धन धारक ।।
टूटन टाली टले न टाले लूटन लौटे नहीं लेटे ठाले ।
झूठन झूठी निठ्ठल खाले सुजन अवसर कभी न टाले।।
भाग्य भरोसा भव मे भाया भला भला भुगते भव पाया ।
पर उपकार उपचार कराया परह छांव सुखदायक पाया ।।
जब लिया विवेक का सहारा तब केवल मतलब का मारा।
पशु सम विसरा फरेब धारा कोमल कपोल जीवन हारा ।।
ऊहापोह घन सम हो गया हैं भंवर राह गुम हो गया हैं ।
अंधकार गहनतम हो गया हैं उम्मीद जीवन खो गया हैं ।।
प्रेम विरल बन बह गया हैं ।
मरूतल तन रह गया हैं ।
सुरभित कुसुम झड गया हैं ।
ठूठ जड देह रह गया हैं ।।
कल तक जो मेरा अपना था मीठा मधुरतम जीवन धन था।
आज नहीं हाय सपने मे भी विकराल हैं मेरी घातक कथा।।
मेरी तेरी अजब कहानी सदियों से चली जुबानी।
हाथ रहे खाली के खाली संग नहीं हैं केवल बानी।।
यह आज समझ तो पाया हूँ वृद्ध तन कमजोर पाता हूँ ।
अवयव की ऐसी क्षीण दशा आई तो मन से हारा हूँ ।।
आती जाती श्वासों का किसने पाया लेखा जोखा ।
लिया किया कर्मों का विधि बांधती पूरा लेखा।।
पानी सा तरल हो जीवन लाली सा तन रहे खिला।
माली सा सार संभाल हो जग धन रहे फला फूला ।।
घर बार रहे सुख साज रहे अपनों का नित प्रेम रहे ।
जलजात सुरभि घेरे रहे नवजात कुसुम खिलते रहे।।
जग मे छाये आनंद घना पुण्य करे मानव बन घना ।
सबल संबल बने अनाथ जीवन रहे खुशहाल घना ।।
मन मर्म मर्मज्ञ ढूँढ रहा चित मोहित क्यों हो रहा।
अपनत्व का राग घूल रहा जीवन का अंग बन रहा।।
फिर सारा जीवन लग जाता हर पल कर्म उस हित करता।
नीजता का भान खो जाता सुखद हो वह सपने देखता।।
इसे अब नाम क्या दे मोह या कि नेह कह दे।
कर्म या कि धर्म कह दे भूल या कि समझ कह दे ।।
कहें तो कहना तोल कर कहना मोह कहना फर्ज कहना।
आशा सहारा साथ कहना जुड़ा जीव अब साथ रहना।।
जीने लगे हैं उसके लिए हम कर्म बढ़े हौसलो मे दम ।
नींद करना हो चुका कम बने सपना साकार हरदम ।।
ओर सरकता जाता जीवन आशाओं के पंख उडे मन।
भाव वहीं घनीभूत हमारे संसार सुखो का कीर्तिवन ।।
नाचो नाचो अब जीवन मेरे झूमों ऊछलों खुशी लूटो ।
हंसता गाता संसार तुम्हारा बहे सुख नद जी भर लूटों।।
झुमता इठलाता जीवन मेरा रस रसीला आम हो जैसे ।
भरापूरा परिवार हैं मेरा कामधेनु का वरदान हो जैसे ।।
काम केवल काम का लक्ष्य पूर्ण हो मेरे अपनों के लक्ष्य ।
जागरण मात्र जीवन लक्ष्य निराकरण मिले सपने हो सत्य ।।
बाधाऐ अब रोके कैसे मजबूत हौसले सबल हुए ।
यह फर्ज पूर्ण हो कैसे तन मन पूरे अर्पित हुए ।।
कलियां खिली फिर फूल बनी बगियां गुल से गुलजार बनी।
रस नयन सघन समा सनी नेह निर्झर मे मन देह सनी






Saturday, May 28, 2016

विराग 4


क्या कहूँ कहा जाता नहीं
अनजान हूँ जान पाता नहीं
भटकता हूँ नित्य मंजिल नहीं
आशा गई कोई सहारा नहीं ।
फफक उठे हैं राग मेरे ललक रहे गीत अनकहे।
अवरुद्ध होकर प्राण मेरे ऑसू बने नित बह रहे।।
आँसुओं का एक कतरा अरमान भरी एक दुनिया ।
अनवरत चलते रण जग मे डूब मरती सारी दूनिया।।
राज जीवन राज ही हैं हार केवल सार ही हैं ।
अक्ल झूठी बात ही हैं मोह भ्रम संसार ही हैं।।
जिसने जाना वहीं पागल हैं नहीं जाना वहीं पागल हैं ।
कब कहे किसे कहें सयाना सयानापन ही पागलपन हैं ।।
फिर भी हम झुक सकते नहीं हैं ।
अस्तित्व जगत को बताते रहे हैं ।
धनहीन जन को झुकना पडा हैं ।
विवश जन शरणागत होते रहे हैं ।।
ऐठ जड जीवन कम नहीं हैं
पकडी हमने हमराह हुई हैं
वक्त की विकराल हरकत हैं
आज दगाबाज दुखद बनी हैं ।
नहीं जानती अपना पराया रही शान से जिसने अपनाया ।
वहीं मानमनवल निरंतर पाया वहीं चाहती चाहे घर पराया।।
कब रहा कौन रहा सहारा बन स्नेह कर
सूनेपन के आँगन मे विकसे कैसे रजनीकर
रस बरस बरस रीता रवन भवन शून्य भर
मद मादक मोहक मन मनीष मठ मात्र भर।
सार जीवन कहना मन भूल गया हैं
उपयोग अब झुलस मूरझा गया हैं
नाकाम यह तन मन भेद दे गया हैं
भंगूर देह का सौरभ सीखा गया हैं ।
प्रेम विरल बन बह गया हैं ।
मरूतल जीवन रह गया हैं ।
सुरभित कुसुम झड गया हैं ।
ठूठ सा जड देह रह गया हैं ।।
चाल पग फिर नहीं चलता फाग फाल्गुन कैसे अलापता।
राग प्रेमिल सुखा तपन देता भाव बाधित कैसे बहता।।
हर दिल सुना ठहराव पाता हर शाम गम जुदा ठौर लेता।
रात घना असीम दर्द मिलता कुंठित जीवन कैसे पार पाता।।
इस झील मे विस्तार कैसा इस रात को प्रकाश कैसा।
इस सुखे तल रस कैसा इस विराग मे यह राग कैसा।।
सागर अगर कहीं रहता हैं गागर रस कहीं तो होता।
नागर अगर कहीं झलकता हैं सारंग राग कहीं तो गाता।।
नयन देखना भूल चुके हैं सुंदरता का सूखद सपना।
हृदय पीडा मे डूब चुका हैं सुख बने कैसे अपना।।
विकल हर पल हे जीवन सकल भार संभालूं कैसे।
आहत हर श्वास घायल मन जीवन आगे सरकाऊं कैसे।।
वासना का जकड जाल असीम
जकड घेरा घेरे जीवन कुसुम
दिशा धुंधली हो चुका अब तम
रोशनी कतरा नहीं कैसे ले दम ।
छल फरेब का दौर आया सरल कठिन सब साथ लाया।
कब समझे हैं संचय आया मन विफल हुआ विवेक छाया।।
परमाणु रचित तन रह गया हैं
सजावट तौल मय हो गयी हैं
मुस्कान सभ्य अब मिल गई हैं
रेशम आभूषण देह बन गयी हैं ।
कामना पंखमय उड रही हैं धारणा धूमिल हो रही हैं ।
आवरणमय चाह सत्य बनी हैं जीवंत जीवन हो रहा हैं ।।
बाहर बाहर चमक दमक हैं भीतर भीतर खालीपन हैं ।
दीप जलाता उखडापन हैं रोशनी पर भरोसा कम हैं ।।
आँखें देखती सघन उजाला
भीतर सघन अंधकार मैला
अनंत ऊँची संसार की बेला
हुलश भरा अहंकार का रेला।
तू नहीं मैं हूँ शौर सकल हैं बोल बोल मे राग विलग हैं ।
दमन दमन का भेद विजय हैं जो दमन हैं जय का धन हैं ।।
ऊँचे ऊँचे बोल समेटकर शारदे वरदान सहेजकर ।
करणीय ताल की थपकी देकर लूट मचाये सहलाकर ।।
जादूगर का ऊँचा करतब लेकर मनमोहक राग की वीणा देकर ।
उलझन उलझे जन रंग पाकर फंसे गुंफन मे रहे मन मसोस कर ।।
ढोता चला जो मिला हैं बोझा खोता रहा जो मिला वो मेरा।
जग से सहेजा धन व दौलत ऐठ अकड का हुआ बसेरा।।
पाप कर्म की गठरी भारी जन्म जन्मों से बांधी सारी।
बोझा घना पर कर्म जारी जुटा हूँ जी भर हो जाय भारी।।
कुछ तो लायक बनकर जाऊं काम छोडूँ तब कुछ दाम गिनाऊँ।
ओलाद सबक ले सके सिखाऊं धन दौलत का मूल्य समझाऊँ।।
पुस्तकों मे सार कहां हैं धन का मर्म राह कहां हैं ।
कोरे सीधे रास्ते जहां हैं आम आदमी ही मरा पडा हैं ।।
उलटफेर नहीं समझा जन मन पटकन कला परखा जो पाया।
सरल सार जीवन की गिरावट असीम हो जब धन की छाया।।
अब विवेक उन्नति कर चुका हैं
सबको समझ बहुत दे चुका हैं
अभागे सत्यवान पिछड गये हैं
प्रगति पथ से ऐसे हटाने पड़े हैं ।
कहानी डूब गयी हैं पूरी नयी कहानी जीवंत नहीं हैं ।
हो चुका जीवन चकनाचूर कहानी  धरातल नहीं हैं ।।
रटे रटाये सूने बोल चमकहीन हुआ हैं खौल।
कहा अनकहा हैं मोल जीवन बना है मखोल।।
सूना सूना तू कुछ बोल रूखा रूखा कुछ घौल।
वेदना हैं वहीं तो डाल पीड़ा का रस भी अनमोल ।।
विरह जलन असीम की लहर
मिलन पल क्षणिक भ्रम नजर
कण सा बना परिहास संसार
चिर वेदना ही जीवन का सार।
खोल धन कपाट सारे मोल मन विचार सारे।
टोह का हमसफर डारे खो चुका हमदर्द सारे।।
आज हैं जन्मों की झोली भरी भरी नहीं हैं खाली।
गंध आई जली हैं होली राख हुई पुँजी बदहाली ।।
संचित का यह दर्द कैसा बर्बादी का मजार जैसा।
चेतना का दंड कैसा निर्दोष जन के मरण जैसा।।
हार अब तू हार जा मन हठ छोड तू भाग जा मन।
कल काल कर्कश छाई फैन विष वयाल घेरे मे तन।।
पीना पडेगा जहर सारा जीना पडेगा काल सारा।
खाना पडेगा उछटन घोरा तू विवश हैं पीडा का मारा।।
विवशता का खोल जीवन समर्थता का ढोल जीवन ।
कायरता का पोल जीवन सुंदरता का खोट जीवन ।।
नकली असली का भ्रम जीवन सुख दुख का जंजाल जीवन ।





विराग 3


राह मेरा कंटकित हो गया हैं कर पद शिथिल हो गये हैं ।
मनोबल कमजोर हो गया हैं जीवन जडमय हो गया हैं ।।
प्रेम विरल बन बह गया हैं ।
सूखा मरूस्थल रह गया हैं ।।
जब तक तन मे प्राण बसे हैं थोड़ा सा भी बल बसा हैं ।
नैनो मे उजास बसा हैं तेरा ही दिल आकर बसा हैं ।।
पीछे की पीड़ा घनी हैं आगे की कैसे जान बताऊँ।
विरह की छांव घनेरी मिलने की कैसे आस बताऊँ।।
जिसे मैं समझा था मधुरस रस रूप मद भरा जीवन ।
वह सत्य मे था कटु विष तृष्णा से भरा मोह आँगन।।
करते करते पूरा न मिला चलते चलते घर न मिला।
मन मन खोजा पर न मिला मनभरा कहीं साथ न मिला।।
हताशा तुझे मैं खूब जीया कतरा भर तो रोशनी मिले ।
निराशा तूने मुझे घेर लिया अवशेष जीवन कुछ तो खिले।।
अंधेरा घना दिखता नहीं खुली आँख पर रोशनी नहीं ।
कदम विवश बढ़ते नहीं उलझन घनी मिटती नहीं ।।
कठोर जीवन बोझ बना धाराऐं हिमखंडा बना ।
भंवर सा अस्तित्व बना जाल बहुतेरा घेरा तना ।।
झकड गया इस जाल मे अब
समझ न आये चाल भी जब
रूकता नहीं मन भ्रांति से अब
चेतना जडवत चुप हो गई अब ।
चल अकेले चल जीवन वेदना का ले सहारा।
एक अनमोल सार सारा कभी न समझ बेसहारा।।
गति न पाये चाहे जीवन बेसुध रहने दे रे मन।
एक कतरा तेज टीम टीम चमक सकता हैं चमन।।
विरह मे ही बिराजे परम पारस नाथ मेरे ।
वेदना से वेद सारे बोझ भर दे सुख सारे।।
नीर सा सजल बन गया हूँ
जीवन की बाजी हार गया हूँ
सार जीवन तेरा जान गया हूँ
असली भेद अब समझ गया हूँ ।
वासना आग्रह चला गया हैं
सुंदरता मोह रहा नहीं हैं
प्रेम विरल बन बह गया हैं
सुखा मरूस्थल रह गया हैं ।
छल कपट नयनो से गुजरा तब भी आस्था मन छोड़ न पाया।
दिल की अस्मत विरल लुटी घायल मन कुछ कर नहीं पाया ।।
लोभ मतलब व्यापार जीवन कामना विस्तार जीवन ।
झूठ फरेब शान जीवन विश्वास का हत्यारा जीवन ।।
छलनाओ का चक्रव्यूह बन घेरे हुए हैं हमें निरंतर ।
बच सके तो निकल भागे ऐसा कोई ठौर हैं न घर ।।
जिसे हम समझते अपना हमारी विपदाओ का मूल।
करें उपचार हम कैसे मन की संवेदन दशा अनुकूल ।।
ओर खाते चौट गहरी अनत्व भाव होते जाते खंडित ।
कह न पाते आपबीती हृदय चौट खाया रहता कंपित।।
आप जाना आप भोगा ओर किसी की बात नहीं ।
कपट छल का स्वाद पाया विधि को स्वीकार यही ।।
यह जीवन का इतिहास सूनेपन का ही विस्तार ।
सकल तृष्णा का विकास जीवन उठाता वृथा भार ।।
नाविक मुझे ले चल दिया हैं ।
आहिस्ता से यह नाव चली हैं ।
निश्छल प्रेम संकेत मिला हैं ।
गागर मे सागर भर गया हैं ।।
नभ लालिम बन गया हैं प्रेम रस अब छितर गया हैं ।
मुस्कान आभा छा गयी हैं रे हमें बुलावा आ गया हैं ।।
तट रूक जाना कैसे होगा दीदार अवसर आ गया हैं ।
प्रेम विरल बन बह गया हैं सुखा मरूस्थल रह गया हैं ।।
जग विस्तृत जन विस्तृत घना हैं विस्तार इसका।
नजर जाती विस्तृत पर जब नयन रख पाना सबका ।।
एक अविरल हार मिलती तृष्णा कृपण थक जाती।
मोह का भटकाव ढूँढता एक दुनिया डूब जाती।।
आँख सपने देखती तब उतंग मोहक मंजिल मिले।
मधुर मधुर कामना जब सुंदर सुहाने वैभव मिले ।।
हुलसता किल्लोल करता मनमोहक परिवार मेरा।
स्वर्गरस सा सुख भौगता तब अलौकिक परिवार मेरा।।
कौन ऐसा जी सका हैं वेदना के राज तम मे।
माया की शीतल छाया आगोश सूख छांव मे।
पी रहा अब मैं हाँ पी रहा रसमयी मादक मदिरा को।
मधुर मधुर मन लहरे उठती करती उन्मादित मौसम को।।
आह यह क्या तू अचेतनता तेरा कितना मादक संगीत ।
स्वर लहरी तेरा राग अनुपम मुग्ध करता गगन विश्रान्त।।
सुख आओ सुख घनीभूत रहो अतिवृष्टि की लहरों सी।
धूप विहीन संसार हो मेरा कामनाओ की सुंदर श्वासों सी।।
वक्त का प्रवाह कैसा कोई हैं जो समझ पाये।
आगमन ऐसा हैं उसका अज्ञात मेहमान आये।।
प्राण भंवर मे फस गया हैं रास्ता धुंधला गया हैं ।
पार पाना रूक गया हैं फासला अब बढ गया हैं ।।
प्रेम विरल बन बह गया हैं ।
सुखा मरूस्थल रह गया हैं ।।
हैं प्राण पर जीवन कहां हैं ।
हैं राग पर स्वर रस कहां हैं ।
हैं झील भरी गहराई घनी हैं ।
चंचल उतंग अब लहरे नहीं हैं ।।
थोड़ा सा भी स्पंदन होता जो तन मे हरकत भरता।
काल पार थोड़ा सा जीवन जुडता कहीं नजर न आता ।।
आर पार का सच्चा तन मन जैसा हैं वैसा ही दिखता।
बना संवारे बोल सकूं मैं इतना सयानापन कैसे आता।।
असीम तर्क उलझने हैं कैसे कोई पार पाये।
जैसे जैसे प्रयास करते ऊलझने बढती जाये।।
धागे सा उलझा गुंफन हैं जीवन सरल बन पाये कैसे ।
तरल सा कोमल हृदय कठोर घेरे से निकले कैसे।।
पार जब भीड़ देखती हैं काल फिर लुका छीपी खेलता हैं ।
सपने सटीक रूप लेकर मोह रस रूप सुंदर डोलता हैं ।।
टाल टूक लूट पाट जीवन डाल डूब जाये जड मानस।
ठौर ठावक छल भरा जीवन पाल ललना लूटपाट ठावस।।
हार हरदम हासिल होती चाल चंचल नाकाम होती।
कदम थके झूठा बनाती चेतना बदहाली भर देती।।
छा चुका भयंकर अंधेरा पार निखिल पा नहीं सकूंगा।
जा चूका जीवन सवेरा आस सुखद पा नहीं सकूंगा।।
रहता हूँ अब रहने दे चलता हूँ अब चलने दे।
जीया जाये जीने दे ढाई आखर पाने दे




विराग 2


झंझा नित झंकझोर कर दे भ्रम भभक भय भंजना से।
जल जवान बालक बचाकर सम रह संसार विपुल से ।।
सूना हैं संसार मेरा सिर्फ रहा हैं नाम तेरा ।
याद बस शेष घेरा जीवन भरा माल मेरा।।
मैं सिमट रहा हूँ अपने मे परिहास जीवन पाता हूँ ।
दे दूँ अपना सर्वस्व शून्य रहूं ऐसा अनुभव पाता हूँ ।।
मैं जब भी समझने का करता प्रयास खुद को भूल जाता हूँ ।
बोध बढ़े तन रह नहीं पाये नर नार एक ही ब्रह्म पाता हूँ ।।
इस दशा फसा रह जाता हूँ
श्वासों का स्वर रह जाता हूँ
अज्ञात मुसाफिर माफिक हूँ
हर सराय ठौकर खाता हूँ ।
भटक भटक हे जीवन मेरे भूल भूलैया के उपवन मे ।
लहर लहरों की झाग चमकती तरूण सुंदर वासना जिसमे ।।
सागर सागर डोल जीवन पानी पानी सा तरल जीवन ।
सार फिर तू पा ले पावन नीर नीरज विकसित जीवन ।।
पवन का झंकार पाकर सौरभ सुंदर गंध फिर फिर ।
नासिका भर ले जी भर भर रसमय संसार फिर फिर ।।
पल जीवन देगा फिर नहीं
राग घन बरसते फिर नहीं
ताप तन रस घना हैं नहीं
जीवन निस्सार सार नहीं ।
पाकर भी यहाँ कुछ नहीं पाया
खोकर भी यहाँ कुछ नहीं खोया
भूल भूलैया रही यह जीवन माया
जन जीवन सारा भ्रमित जग भाया।
राख घनेरी जीवन नहीं हैं आग घनेरी छांव नहीं हैं ।
तपन तेरे तार महीन हैं झैले इस काबिल नहीं हैं ।।
डगर डगर सांवरियां ढूँढे कदम कदम फासले बड़े ।
रह ना पाया घर मे जमे मेरे नाथ वहीं घर रहे खड़े ।।
करुणानिधि पुकारता गया आँसू सारे हार गये हैं ।
धुंधमय जीवन बन चुका हैं शुष्क तन अब रह गया हैं ।।
प्रेम विरल बन बह गया हैं ।
सुखा मरूस्थल रह गया हैं ।।
झील की स्नेहिल तरंगे अपार अनंत ललक लेकर ।
उतंग शिखर स्वप्नवत हो उठती प्रार्थना का दंभ लेकर।।
जा ना पायी मूल तक तो कैसे कह दूँ सार मन को ।
ढूँढता निस्सार तल तो भूल भूलैया स्वप्न मन को।।
मन खंडित हो गया हैं ।
केवल तू ही रह गया हैं ।।
आयी आंधी अंबार अंधड छा गया स्थित अंधेरा ।
आँख मे असीम कंकड हो ना पायेगा फिर सवेरा।।
आँसूओं का सघन ढेरा छलना के मोह भंवर मे।
ले चला जीवन सुख मेरा चेतना के तीव्र स्वर मे।।
यह कैसा विवाद चल रहा
मानव मन का द्वंद्व चल रहा
बाहर प्रकट झलक नहीं रहा
भीतर तन मन मे ही डूब रहा।
झूठी चाह साबित होगी आसरा अब एक का हैं ।
हठात सबसे मुक्ति होगी भरोसा परमेश्वर का हैं ।।
प्रेम की उस झील का हैं असीम नेह भंडार का हैं ।
सुरभित कुसुम झड गया हैं ठूठ जड देह रह गया हैं ।।
कब तक अब ओर रहेगा हे चेतन तुम कुछ तो बोलो ।
किसे सुनाऊ व्यथा यह गहरी नीरस जीवन ईश ले लो ।।
गल हिम क्या बनेगा पानी मिल सकेगा झील कमल से।
बहता इठलाता रसमय बानी महा मिलन होगा सत से।।
रात हो रही घनी अंधेरी काल कालिमा ने आ घेरा।
लग रहा अब जीवन तो पा नहीं सकता फिर सवेरा।।
ऐसे कैसे बच जीऊं मैं सजल कैसे बन पाऊं मैं ।
नाकाफी राह जीवन की कदम जिस पर रख पाऊं मैं ।।
जीवन हैं विरान निखिल आकर नीर पीर दे गया हैं ।
निष्ठुर ओर स्वप्नवत मोहमय वर्जना दर्द दे गया हैं ।।
सुरभित कुसुम झड गया हैं ।
ठूठ जड़ देह अब रह गया हैं ।।
मानस का सनिकट रेला अपने अपने रट रहा पर ।
निकट होने के समय पर लगता अनंत विराम पर ।।
मेल मन का हो तो कैसे चाहतों का बिखराव
ऐसे।
दूर पट पर बादलों का घना छितरा बिखराव जैसे ।।
हाल मेरा आज औझल तन्हाईयों का जाल बौझिल।
कर सके यह दंभ गाफिल हो सके ऐसा मैं न काबिल।।
क्या हूँ क्या कहूँ अनजान जगसागर मे शून्य सा मान ।
पवन का हल्का सा अहसास पतली टहनी कंपित जान।।
कौन सुनता दर्द मेरा अकेलेपन मे प्राण व्यथित ।
व्यतीत जीवन सारहीन सारा कह न पाया हूँ स्तंभित ।।
वियोग ही हैं शाश्वत सत्य मिलन केवल भ्रामक संचय।
ले चला प्राणों को नित्य दे रहा प्रलोभन यह छलता जगालय ।।
साक्षात्कार नहीं नाम ले हम क्षणिक हैं प्राणों मे दम ।
विरह जीवन घेर तो ले सकाम जीवन ले सके फिर विश्राम ।।
नेह सागर राह बता गया हैं ।
सरिता का वेग दिखा गया हैं ।।
उलझन उलझन खेल अब छोड़ो
मटक मोह का जाल अब तो तोडो
एक नजर स्नेह मिले दर्शन जोड़ो
भारी माया से मुँह तो अब मोडो।
करूणासागर पास खड़े हैं दीदार के गीत बना दूँ।
अपनेपन का थाल सजा हैं शरण कमल मे झूकते रख दूँ ।।
प्राणों पण देकर समझा गया हैं ।
अनंत सुरभि पवन संग दे गया हैं ।।
प्रेम विरल बन बह गया हैं ।
सुरभित कुसुम झड गया हैं ।।
ठूठ जड बन देह रह गया हैं ।
सुखा मरूस्थल तन रहा हैं ।।
जब कभी इजहार होता चेतना मे भार असीम बढ़ता।
मन विगत मे भाग जाता होश विरल हो दरक जाता।।
सुखद सुखद हर पलों को धीरे से सहला भर देती।
ओर यादें मुझे आकर पल पल मे आँखें भर देती ।।
स्मृति की छांव रागिनी घनी हैं राग नेह मिल गुंफन हुआ हैं ।
आत्म तत्व परिवहन हुआ हैं वहीं शेष परिभ्रमण हुआ हैं ।।
वह चिंता मैं कैसे छोडूँ भावी सुखो की जोड़ रखी।
वह आशा अब कैसे छोडूँ शादी बंधन की सोच रखी।।
गंध से सुगंध बने यह निस्सार से सार बने यह।
कली खिले फूल बने यह परमात्मा श्रृंगार बने यह।।








विराग


विराग राग
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कब तक पुकारूं अब गला रूंघ गया हैं
किसे सुनाऊं कथा श्रौता बिखर गये हैं।
मधुर मधुर मेरे जलते दीपक
         तुफान घनेरा जल ना सके तुम
बिखरा सारा प्रकाश समूह कही
           ढूँढ ना पाये बिखर गये हम।
विकराल काल का कैसा तांडव
भय भाल भूतल भीषण ठहराव
विराग राग विषम विपक्ष कलरव
कोमल गात प्रहार कठोर फैलाव।
पुकार कोई सुन सके आसरा कोई बन स्वीकारे।
विरान हैं संसार सारा सुने कौन किसे पुकारे।।
नमन जीवन काल समर्पित
नमन सार संसार समर्पित
नमन देहमन प्राण समर्पित
नमित भाव संसार समर्पित ।
तेरे बगेर यह जान न पाया
महक मन तेरी बस गयी हैं
तू नहीं मेरे पर झलक तेरी
प्राण पण मे समा गयी हैं ।
अति मोहित जग जाल मेरा।
लिपट गया अब राग घेरा।।
परमेश्वर अब शरणागत हूँ ।
शरण रज रूपांतरण चाहूँ ।।
अधम पापी अधम कर्मी राग द्वेष का पुतला मैं
सकल जीवन के करतब घृणित झूठा फरेबी मैं
काल समय का कर आभास थोड़ा सा चेता हूँ मैं
परमेश्वर शरणार्थी तेरा शरण जगह चाहता हूँ मैं ।
कमल कोमल पांखूरी तन नव पल्लवित मधुकर मन।
सारे जहां रूपमय संचित आकाश असीम छोर यौवन ।।
डगर डगर यादों के झौके नित दिन तेरी याद दिलाते ।
कुछ कह जाते जाने वाले बना सहारा जग मे जी लेते।।
जीवन खंडित हो गया हैं
कोमल सपना टूट गया हैं
शिथिल शरीर हो गया हैं
अचेतन जीवन हो गया हैं ।
राह का भ्रमित राही भटकाव ही का सार लेकर ।
मान बेठा जीवन ही को सुख का आगार जी भर ।।
आज मन बेताब हैं क्यों चैतन्यता जड़ जात हैं क्यों ।
प्राण तडप बढ रही निरंतर मौत का आगोश हो ज्यौ।।
काली घनी घटा घनघोर
घायल तन मन कमजोर
शीतल कंपित देह जर्जर
विकल चित कंपन थरथर।
बड़ी भयंकर रात काली सुझता नहीं कोई किनारा ।
रहूं कैसे हर जगह पर तांडव भय का हैं नजारा ।।
छोड चुका सब आस नहीं  हैं
कहीं पर कोई रसधार नही हैं
विपदा घनी तारनहार नहीं हैं
जग थोथा कोई सार नहीं हैं ।
आखिर हे राम तेरा सहारा सभी खोये संसार हैं गहरा।
गोते लगा लगा कर हारा पार न पाऊं तू ही सहारा ।।
मैं अज्ञानी दंभ का मारा मिले तेरी राह का किनारा ।
नाम ही जानूं प्रभु तुम्हारा नाम नाव का केवल सहारा ।।
कितने जन्मों से भटक रहा हूँ
गिनती नहीं प्रभु जान सका हूँ
नीज अहंकार छ्दम् छलता हूँ
सरल जीवन जी नहीं सका हूँ
भेद अपना जग से छिपाकर
बहुरूप बना घूमा पर हितकर
कर्म मेरे ओछे चाल तामस कर
प्रभु भार बन चुका पुरा धरा पर।
नाथ अब शरण तुम्हारी जैसा भी हूँ करो रखवारी
शरण रज बना कर दया करी अब चितवन नाथ तुम्हारी।
पीर नीर झकझोर गया हैं जग विहार उजड गया हैं
नहीं पहचान पवन सा गला हैं उमडा अभी बरस गया हैं ।
चल आगे अब अबोध जीवन वेदना चल तू बन जा सहारा
पार तेरे निशा का गहन तम विकसित हुआ झरता सवेरा।
आज आस बस हम हुई हैं
मानस का तम साथ हुआ हैं
अभिसार कामना नाश हुई हैं
मन सरल सारथी बना हुआ हैं ।
पांव धरा पर जमते नहीं हैं उठना किस विध हो सकेगा
काम जरा सा सहारा नहीं हैं हिम तरलवत कैसे होगा ।
दीप मंदिर जग झंझावत से जगमग सा पर डौल रहा
तेज हवा की कठोरता से अरमान बुझ गये संचय रहा।
बुझे जीवन दीप सा पर काल तेरे वश ही रहा
भाव अलि सिंगार बन तेरा आज समर्पित ही रहा।
मिटकर धूल बन गया हूँ कण कण से मिल गया हूँ
नामोनिशान मिटा गया हूँ सार  धरातल बन गया हूँ ।
बोल अन बोल हो गया हैं मोल जीवन खो गया हैं
गोल घेरा घिर गया हैं रे जीवन अब तू मिट गया हैं ।
चेतन सारा खो गया हैं भाव कोमल खो गया हैं
आग ताप आ गया हैं झुलस जीवन बुझ गया हैं ।
बोल कहां सब खो गया हैं अतीत सारा छीन गया हैं
लूट संसार मेरा गया हैं खाली संसार छोड़ गया हैं ।
खालीपन कसक रह गयी हैं निशा अवसाद घिर गया हैं
झील का गहरापन रह गया हैं बहाव  सपना गुम गया हैं ।
भार भारी भूल भारी भोगता रहा
छल जल मय चंचल आँचल रहा
मन मोहित मर्दन बन मशाल रहा
पर सत सार चेतना विलग रहा।
ठीक ठंडी ठांव ठहरे पास कैसे
डिग रही डाल डगमग डोली ऐसे
घर घनेरी घाट पर घन घेरे जैसे
होता विटप विकट वार प्रहार कैसे ।
काल के कराल का करार जीवन
नेह नीरज निशा निर्मित नार ऐसे ।
लपेट लेता लालिमा को अंगार सम
मन मनोज मार तन टूटता हो जैसे ।।
वाह वहीं वात्सल्य वचन वाहक
चंचल चंदन सम चितवन धारक
बाल बचपन बहुत बढते नाहक
तेरा मेरा मेल हैं मोहक अमोलक।
देखते ही झलक तेरी धमनियां प्रवाहित मेरी
नेह गति तीव्र होकर प्राणों की संगीत लौरी।
विरह जीवन दे गया हैं मोह बंधन तोड़ गया हैं ।
काल कौर छोड़ गया हैं बुढ़ापा वेरी हो गया हैं ।।
प्रेम विरल बन बह गया हैं ।
सुखा मरूस्थल रह गया हैं ।।
काल तेरे रूप घनेरे ललनाओ के ललित फेरे।
मन मोहक जाल हैं घेरे बाल भोले मोहक हैं तेरे ।
अबोध आखिर आगोश तेरे बोध जड बहु काल तेरे ।
नजर उठाकर घेरा तेरा होता श्वास फिर अवरुद्ध मेरे ।।
काल लिप्त यह जीवन हो गया हैं
राग संसार शून्य वेराग हो गया हैं
तनिक मोह जीवन नही रह गया हैं
संसार भारमय घना बोझ हो गया हैं ।








चेतना3


दौडे भाये जीवन के खेल
खूब सहे धोखे रहा न मेल
फरेबी नेह का खेला खेल
थका तन कैसे बोले बोल।
वासना जाल मजबूत घना
कामना चाह निखिल बना
सच्चा नेह शिथिलता सना
महक न सका जीवन घना।
झलक तेरी व्यथा दे जाती
छलक नयन झरने हो जाती
पलक पल मे भीगी हो जाती
फलक विरह पीड़ा बढ जाती।
ऐ दिल करू क्या कुछ तो बता
रहूं इसी हाल नहीं खुद का पता
मैं काम का नहीं मेरी नहीं सता
उम्र बिती रात का भय रहा सता।
अंधेरा हैं आजा मुझे घेर ले रोशनी जा घना तम देख ले
सुवास जरा रूख बदल ले खुशबू जरा झलक दिखा ले ।
मैं कृति की क्रिया बुद्धि हूँ माप तोल जीने का सिखाती हूँ
गिर ना सके जीवन भर तू अनुभव का हाल सिखाती हूँ ।
दिल दीन दया मे उलझ गया हैं
मति मानक दिशा हीन हो गये हैं
ढूँढना अब सार असार हो गया हैं
मन मान केवल दीन रह गया हैं ।
मैं जभी समझना चाहता हूँ प्रयास विफल हो जाते हैं
भूला विवेक भ्रमित होकर परिहास स्वयं हो जाता हैं ।
इस क्रिया मे कुछ ओर नहीं केवल दर्द भुगतना हैं
मैं सर्वस्व परित्याग करता पर बदले मे कुछ पाया नहीं हैं ।।
अल्पज्ञ होकर पूर्ण दावा करता
भव सागर टोह लीला दिखाता
खेल अजीब अनवरत बतलाता
जाल गजब गूंथता न घबराता।
अहं नित नव आकार लेता
हार से कभी नहीं घबराता
भरा अहं का प्याला रहता
लघु सारे वृहद मैं ही होता।
खेल खेला जीया मन भाया
तोड़ रस्म पीया रस माया
लूटा बहुतो का हित न भाया
छूटा सब कुछ रही न छाया।
ताप घना अब तडप रहा हूँ
ढाक रहा नहीं उघड रहा हूँ
साथ रहा नहीं बेहाल रहा हूँ
शापित जीवन बोझ बना हूँ ।
आओ आओ पास क्यों रुके हो
हिसाब लो दयालु अब क्यों हो
ऐसे मे रूको मत मौत बने हो
हमदर्दी मत दो दयालु बड़े हो।
उदभ्रांत लौ जी रहा हूँ गगन शून्यता बन रहा हूँ
भटकन पवन बन गया हूँ पत्थरों से टकराता रहा हूँ ।
मुस्कान देता नभ कुछ कहता हैं
दामिनी मिस संकेत आ रहा हैं
क्या प्रभु रस नागर छा रहे हैं
रसधार मिलन सुख आ रहा हैं ।
चेतना विभोर नाचना चाहती हैं
स्मृति विगत बनना चाहती हैं
पलक थिर राह लगी चाहती हैं
मिलना बूँद जलाशय चाहती हैं ।
दामन मेरा खाली खाली कमा कमाई भरा हाली
रीता कैसे समझ भोली पट फट चुकी अब मेरी झोली।
लोग बता रहे भरता नहीं हैं
मौन रहा मन मानता नहीं हैं
रूकूं कैसे लालसा घनी हैं
खपा खूब झोली खाली हैं ।
वासना अनंत भार बहुत हैं
कामना गहरी जड मजबूत हैं
लालसा रिस्ता रक्तिम रहता हैं
भावना निष्कासित हो गयी हैं ।
डाल डाल पंछी चहके कैसे पवन ताप ठंडी बदले कैसे
सुलगते सूरज जले भू ऐसे आग लगे घर जलता जैसे।
फिर मानव लाचार हुआ हैं नीरव मन कुंठित हुआ हैं
दानव दल सबल हुआ हैं मानवता का नाश हुआ हैं ।
भार बढा हालात खराब हैं
जाल घने जीवन फसा हैं
निकले कैसे भंवर पड़ा हैं
मददगार मिलते कहां हैं ।
दिन रात बैचेनी हैं विश्राम नहीं हैं
जलता ज्वाला तन संताप घना हैं
गिराया गहरे कूप डूब रहा तन हैं
हारा बाजी खेल खिलाड़ी नहीं हैं ।
भूल से भेजा जग जीने की कला नहीं
मूल ही कमजोर हैं दिखते सबल सही
देखा देखी जीना चाहा जीने देंगे नही
भूल तभी सुधरेगी जायेंगे आये वहीं ।
रो ले मनवा तू जी भर रो ले
खो ले राग लाग सब खो ले
हो ले परहित काज तू हो ले
धो ले जन्मों के दाग तू धो ले।
प्यास घनी तेरी प्यासा रहेगा
लालच बढ़ी तेरी हताश रहेगा
अहं तेरा आसरा निराश रहेगा
कामना पूत तू परास्त ही रहेगा ।
गली गली भटका प्रेम गली देखी कही
ठौर ठौर ठहरा शांत ठौर देखी नहीं
मन मन जोडे पर जुडे मन देखें कहीं
धन जोड़ा तन तोड़ भरा कोष हैं कहीं ।
यहां पाया यही खोकर सूना ही रह जाना हैं
उसने बेदाग दिया गहरा दाग दिया लौटाना हैं
हिम्मत कैसे चित रहे पाप का भार बढाया
है
हे दयासागर तू छोड़ कर्म सिर झुकाया हैं ।
पापी खोलो पाप गठरी भेद
कामी बोलो हैं घावों का मैंद
लौभी लूटे हैं जीवो का छेद
डोली नैया रे तब क्यों खेद।
नाव डूबी मेरी नाव डूबी राग रोया मेरा राग रोया
नाम खूबी राम नाम खूबी ऊबार ढोया रे ऊबार ढोया।
भरा छल खेल जग भ्रामक
खरा सार राम नाम सार्थक
जरा सोच भ्रम तोड़ दाहक
तरा मोह जाल छोड़ धारक।
चाल कपट कर सुख हैं जोड़ा
काल कराल से मुख हैं मोडा
डाल बदले नित छांव हैं थोड़ा
प्यास मिटे नहीं परहित छोडा।
ताल टूटे टीस मन की डाल मुडे तने तन की
चाल रूके बूरे पथ की पाल बंधे हित पर की।
लोल तरंग रंगे सूरज की
ताजगी भर दे जीवन की
खोले गांठ कुंठित मन की
नाव उतरे पार मानव की।
छोड़ मनवा राह मोह की
फोड़ संसारी गगरी नेह की
जोड़ रश्मि सत स्नेह की
दोड मन डौर पकड रब की।
चपल चांदनी शीतल छितराई
पवन पावन मंथर गति लहराई
गगन अलौकिक आभा अति छाई
मगन हुआ रे मन शोभा चित भाई।
परम सत झलक मिले परा हर्षाई
कर्म धर्म जुड़े एकाकार हुए भाई
एक तत्व संगठित सत्य बनाई
परमशक्ति साकार जग मे आई।
नमः नमो सत सत दुम दुर्गा माई
भव भव माँ तेरी शक्ति घनी छाई
महाकाल महेश जन आशीष दाई
कृपा करो माँ जग जन सेवक ताई।

















चेतना--


संभले कैसे मर्मज्ञ साथी नहीं हैं
जग सभी माया लोभी पथ वहीं हैं
सरल मनीष निर्मल जीवन नहीं  हैं
घना खार राग तृष्णा मात्र यही हैं ।
दागदार दिल दहक रहा हैं
जलजला अभी चल रहा हैं
गला नहीं रहा शिलाखंड हैं
अकड ऐंठ जल ठूठ पड़ा हैं ।
झूठ अहं छूटे तो नमना आये
नमन खिले तो झुकना आये
झुकते ही सरलता धन पाये
सरल मन सत के दर्शन पाये।
शातिर करणी छोड़ लोभ अब
खातिर प्रेम रहनी सीख अब
छीतर जाये दुख तेरे आते रब
भीतर देख वहीं सतबल अब।
ढूँढ रहा भटका पूरी ताकत
लूटा पूरी उम्र बूरो की सौबत
पार न पाया मोह बंध सौगात
बिना समझ भूला जीवन लागत।
चेत फिर से जागा तू अगर
ले भीतर सम भाव गागर
दे रस चेतना गहन सागर
ले सके जन जीवन नागर।
प्राण अकेले ही रहेंगे दुख दर्द तेरे ही रहेंगे
उम्र भर संकट रहेंगे नीर नेह बहते रहेंगे ।
क्यों करें शिकवा किसी से
वे भी पीडित बूझे इसी से
सुन तो लेंगे पर अनमने से
दर्द बढ़े निकले न दिल से ।
कायर दर्द तो पीना ही पड़ेगा
कडवा घूँट गटकना ही पड़ेगा
मनवा मारे जी कर जब पायेगा
सार रष जीवन तभी तू पायेगा।
चल चले अब कुदरती करनी
तेरे मेरे अब हाथ नहीं करनी
हाय हमारे सुख सभी हरनी
भार छोड कुछ भी नही करनी।
करता करता काम जीवन हारा
भरता रहा कामना रीता सारा
आज समझा अपनों का मारा
मिटता जीवन तन का हूँ हारा।
रूका ठहरा विवश हो चुका हूँ
पूरा झूका अकड भूला चुका हूँ
पैनापन अहंकार खो चुका हूँ
गीला मन राग भूल चुका हूँ ।
देखा जग देख सकता था जितना
लेखा लेता मन पा सका हूँ कितना
अंक फिसलते पकडता हूँ जितना
योग जोड देखा सीपर फल बना।
फिर क्या पाने दोड लगाई दम फूला छाती भर आई
थोथा चना बन दम लगाई घनी इच्छा कुछ कर न पाई।
सुख ढूँढा धन पद पाया रूखा सुखा खा माया जोड़ी
बाल बच्चों को पाठ सिखाया मन हैं भारी राह नहीं थोडी।
झूठ लुटाया पाया धोखा लट बनाया आखिर मोखा
पा ना सका काबिल चौखा चूक गया हैं असली मौखा।
दिग्भ्रांत भटकन भार बनी हैं
कोई तेरा नहीं हैं सार मिला हैं
सब अपनी गरज सहारा हुए हैं
बेसहारा हैं जीवन समझ यही हैं ।
यहाँ कौन तेरा हैं मुसाफिर
जिसे खोजता नहीं हाजिर
लिए आस फिरता निरंतर
कहीं छांव तेरी नहीं मुसाफिर।
संसार छाया देता नहीं हैं
भंडार सुख भरता नहीं हैं
अंबार सपने टटकते रहे हैं
संसार रिश्ते सटकते रहे हैं ।
रस्ते चलते चलने नहीं देगा
हंसते देखा हंसने नहीं देगा
दौडे कभी कीचड़ डाल देगा
रोता हूँ मेरे हाल छोड़ देगा ।
करूं क्या उलझन गहरी हैं
घिरा भंवर मे रोशनी नहीं हैं
आज कोई मेरा सहारा नहीं हैं
जीना क्यों अब मतलब नहीं हैं ।
हार पाई अपनों से परायों से नही
जीना हुआ दुर्भर अपने सभी सही
बहुत कोशिश रह जाती अपने ही
अधममरी जिन्दगी देते सारांश ही।
पगले संभाल नहीं पाया
फटा तेरा मन टूटी माया
देख जग हंसता रे छाया
जाऊं कैसे शिथिल काया ।
दीप तेरा ही हूँ जलते रहता हूँ
नीरव रहने दे लौ मिलाता हूँ ।
हवा मे भटकाव हैं लौ को हिला देती हैं
थिरकना एक बंध हैं लौ से फासला लेती हैं।
राग सारे खो रहे हैं फासले शून्य हुए हैं
मिटना असीम बना हैं ससीम अर्थ खोता हैं।
नहीं इतना काल हैं तेरा जितना तू जंजाल फसा हैं
नहीं इतना सार हैं माया जितना तू आकंठ डूबा हैं ।
कहते कहते कितने कह गये
सुनते सुनते कितने सुन गये
लिखते लिखते कवि चले गये
समझा देखा अनदेखा कर गये।
हार कब स्वीकार होती मार खाकर शर्म रोती
उठ ऐंठ घमासान होती दबी दूम भी शान पाती।
लफडा मोल लेता नहीं थकता
सोच का कब समय मिलता
भागता भाग्य दुर्भाग्य पाता
थका ठगा अंत तू शून्य पाता।
लाज जग की अब रही नहीं हैं
मान अपमान का विवेक नहीं हैं
भले बूरे का बस भान नहीं हैं
अहंकार धन का भंडार घना हैं ।
हर हाल परसुख हडपने हाजिर हूँ
हसरते हसीन होती बहुत हैरान हूँ
कैसा भी हो नहीं मेरा उसे बनाता हूँ
झंडे नीचे जवान हसरते बसाता हूँ ।
अंजाम जो भी होगा देख लूंगा
आज शमां हैं नहा रोशनी लूंगा
ओर कूचले मरे रंग जमा लूंगा
संचित सूखों का ढेर लगा दूंगा ।
आज मानव छल बल चल रहा हैं
लाज शर्म संस्कार भूले जा रहा हैं
सीमा मानवता त्यागता जा रहा हैं
असलियत मे दानव बनता जाता हैं ।
भार से आम जन दब गया हैं
दानव संस्कृति से डर गया हैं
कसमसाता जीवन रह गया हैं
मौत चाहे वश नहीं रह गया हैं ।
क्या करे क्या न करे बताये कौन
जीये किस तरह ये सिखाये कौन
बढता अंधेरा घना रोशनी दे कौन
खुश रहने का उपाय बताये कौन ।
अरमान कभी हकीकत बनते नहीं
दिल अबोधता से उबर पाता नहीं
काम मे तोडा तन हक मिला नही
शौषण नित चला पूरा पाया नहीं ।
हे हताश रे मन अब तो कुछ बोल
निराशा मे अब कुछ आशा घोल
बच्चे पालूं कैसे कुछ धन्धा खोल
रे बेसहारा ही जीवन मरेगा बोल।







चेतना


चेतना के बोल
**********
हलचल कल कल बहे निरंतर
भगदड भ्रमित भरे रे अंतर
चेतन पल वस जगमग भीतर
आँख खोल छौर झलके अंतर।
हे मन इतना विकल हुआ क्यों
रे हर्ष इतना विगत हुआ क्यों
हे चेतन थका क्या लाचार क्यों
हृदय रे यह मन की बात हैं क्यों ।
रिमझिम बरखा बरसे हैं कहां
झिलमिल जलता दीप हैं कहां
जगमग प्रकाश फैला हैं कहां
छनाछन नेह स्वर लय हैं कहां ।
दीपक जला दिया प्यार का
आराध्य के सत दीदार का
चेतना जागरण श्रृंगार का
शरण रज बन सकूं चाह का ।
स्वीकार हैं हर हाल मिले तेरा
अंगीकार हैं हर दर्द गर हो तेरा
नसीबदार हैं हम छाया हैं तेरा
लगी जीगर हैं गर दर्द छूपे मेरा।
आकर डाल दी दिल मे नींव गहरी
पूरे चित छा गई हैं तुम्हारी परछाई ।
अब जीना मुश्किल हैं स्मृति के सहारे
खेर रहे कैसे घटा विरह की घहराई ।।
वेदना का जाल जीवन वेदना का जाल
चेतना वर हार जीवन चेतना वर हार ।
खेलता छल खेल जीवन खेलता छल खेल
झेलता विरह रार जीवन झेलता विरह रार।।
डौलता हर धाम जीवन डौलता हर धाम
खोलता दुख गांठ जीवन खोलता दुख गांठ।
बोलता पीर बोल जीवन बोलता पीर बोल
बोहता टीस ठूंठ जीवन बोहता टीस ठूंठ।।
ढल गई रे सांझ जीवन ढल गई रे सांझ
काली कलूटी रात हे जीवन काली कलूटी रात।
नीर आँख अंधी रे जीवन नीर आँख अँधी
सांवरियां पग हैं गात जीवन सांवरिया पग हैं गात ।।
घड़ी अनमोल आई रे जीवन घड़ी अनमोल आई
जाग सके अवसर रे जीवन जाग सके अवसर।
लागणी तन छोड़ रे जीवन लागणी तन छोड़
भवसागर ऊडो रे तार जीवन भवसागर ऊडो रे तार।
मुग्ध मगन हुए राम रस मीठा
मन लगन लगी जग लागे झूठा
माया ठगनी डाले मोहक मूठा
तन मरा माया से हो गया ठूंठा ।
ठगनी माया नैन लडावे
तिरछी टेढ़ी चाल दिखावे
रूप अदा से तन मटकावे
भर प्रेम रसिला नाच दिखावे।
घेरा घना फांस संसार का भारी
तेरा मेरा भाग हिसाब हैं जारी
उलझा उलझन फंदा हैं भारी
अंत आया पर प्यास न फोरी।
झूठा ढोंगी बन उम्र गई सारी
मन लोभी तन तृष्णा की भारी ।
घूमे भटके हाथ हैं खाली
टूटे जडे मन रहा हैं चाली
झूठ फरेब की माया डाली
ठगनी ठगी जिन्दगी भोली।
डाल डाल रस ले तू उड़ा रे पंछी
ठंडी सुखद छांव बसेरा डाला ।
पंख रहे तू कैसे चैन सुख पाये
उड़ा भटका संतोष रस टाला ।।
भाँति भाँति रमा रास लीला
मन भरा नहीं तन खिला नहीं ।
आधा पूरा हो खेला जग सारा
संसार पूरा सुख देनार नहीं ।।
सुख मोह मारे पर सुख छीना
धन लूटा जी भर मद का मारा
खाली खाली हैं फिर भी तू क्यों मनवा
डाल डाल पर डोले क्यों तेरा जीवडा।
हाल बेहाल तेरे उलझन में क्यों आ गया
बोल मत झिझक अंत मोह सोच जीवडा ।।
गगन खुला हैं स्वच्छन्द पवन हैं
मगन हुआ जग रस रहा अनंत हैं
लगन लगी अब आत्म विभोर हैं
रस्म मर्यादा छूटी भ्रम मगन हैं ।
परिणाम न जाने राज न जाने
आखिर अपना आप न जाने
कर्म कांड फसा धर्म न जाने
सत सार परहित कुछ न माने ।
तर्क विवाद हथियार बनाया
मोह माया का साज सजाया
रूखे तन को श्रृंगार पहनाया
नकली दिल का राग सुनाया ।
झूठा सभी कर्मो का घेरा
लूटा चैन संतोष का डेरा
सच्चेपन का नाटक तेरा
अंत भटकन पायेगा फेरा।




प्रेरणा


प्रेरणा फूल गूँथने लगी हैं
आत्मा झकझोरने लगी हैं
काला छाया छिटक रहा हैं
रौशनी कक्ष चित फैलती हैं ।
सृजन पल सूक्ष्म पकड़ लेता हूँ
ताने बाने शब्दों के बुन लेता हूँ
गागर मे सागर निचौड लेता हूँ
अनकही फिर उजागर करता हूँ ।
बिखरे भावों आओ मे तुम्हें पनाह दूँ
असंगठित रहते कद्र नयी दिलवा दूँ
प्रेरक बन कर बिखरे जनो को बल दूँ
लम्हें आये न आये गीत नये गा ही दूँ।
जल्दी जल्दी काम पटेगा
बाजार भी तो जाना पड़ेगा
घर का सामान लाना पडेगा
बच्चा तेरा भूखा रोता होगा ।


भीतर


भाई संभलकर बोलो निवेदन से क्यों खोलो
बेहोश हो क्या जो डोलो इस तरह हमें मत तोलो।
आने का कहा तो हैं चिंता ना करे अपने हैं
बिमारी मे मदद देते हैं आज कर्ज भी सेवा हैं ।
मत कहो बिकाऊ क्या केवल हम हैं
बडे भोले हो अरे अच्छे भले बिकते हैं
भाई हम तो फिर भी नीति से बिके हैं
बड़े से लाट तो रात दिन यही करते हैं ।
दाव लगा आप गाली क्यों देते हैं
हारना हम भी कब क्यों चाहते हैं
सुबह से भूखे दम रहता कहां हैं
अब क्या करू हम तन धन हारे हैं ।
चिंता से हर पल घिरता रहा हूँ
कभी जोर लगा उसे तोडता हूँ
कभी विद्धवानों के तर्क रखता हूँ
कभी उपजे विवेक को देता हूँ ।
कुछ समय के लिए चिंता मिटती अहसास हैं
विचारों के समूह जाल जब उसे घेरने लगते हैं
टिकते उसके सामने पल तक चिंता जीतती हैं
दुगूने वेग से विशाल आकार ले हृदय घेरती हैं ।
करता जाता हूँ चिंता जितनी
विशाल विस्तार पाती उतनी
हृदय गगन आँधी गर्जन ठनी
भयभीत हैं प्राण विपदा घनी।
कौन कब कैसे संत्राण देता
हर किसी का संताप कहता
प्राण सिसकते विराग रहता
भावना विनष्ट रक्त राग बहता।
खोल दे जीवन भेद अपने
बोल रागिनी तू राग अपने
डोल किस्मत जोड सपने
आज कुछ हो सके अपने।
जितना पाया उतना ही गवाया
कितना ही सारा व्यर्थ गंवाया
बितता उतना जितना कमाया
फिर भी सिर पर कर्ज चढाया।
अब क्या हैं कहे बिना कहे ही रहे
उदासी नित रहे यही जीना कहे।
भरे हुए लोग भी कहीं होते होंगे
तृप्ति के अहसासी भी कहीं होंगे
रेत से शुष्कता गिलापन सिखेगे
धराशायी कैसे उठे सीख लेंगे ।
तुम क्यों कहते कि मैं आजाद हूँ
मैं ऐसा कहने से ही झिझकता हूँ
डरते बिता जीवन सच कहता हूँ
जिम्मेदारी सभी की रखता हूँ ।
ढेर सा सब्र जीवन मे गति कैसे लाता हैं
गैर का दर्द हृदय हमदर्दी क्यों लाता हैं
फेर दिनों का हमारी पहचान बदलता हैं
मैल दिलों का समय रूख बदलता हैं ।
अनुभव अगर सीख देते तो संभल जाते
करूणा क्रिया करती तो दुख क्यों आते
खंडित विचार कभी प्रभावित नहीं होते
सागर टूटे बिखरे पर नदियाँ कहां लाते।
कई बार मेहनत परिणाम सुखद नहीं लाती
हम मेहनत से ही पीछे रहे हैं थोडे जजबाती
सच्चाई के रास्ते आगे बढने के हैं हिमायती
देख चुके मंद बुद्धि साथी बने हैं सियासती।
मधुर मधुर तारो का नर्तन मन भाया
काली चितरी कालिमा का घनछाया
चिर झंकृत सितारें संगीत मनछाया
मंडल मंडप लावण्य नाच नचाया।
नीरव नीरज कुसुम टीम टिमाये तारे
भीतर मंथन सुख गागर रसमय सारे
मादक थिरकन बदन सुंदर काम मारे
राग की गागर बहे चित सुंदर परनारे।
ठंडक देती पवन के चित झौके
भड़क उठी रे मन ज्वाला रोके
कडक हैं चित चंचल नैन झरोके
लागी अग्न भीतर की कैसे रोके।
सिंगार अलौकिक रूप सलौना
तन भरा कसावट चित करे खोना
मद मार रहा हैं जीवन हुआ बौना
सब छोड संग तेरी चाहूँ मैं खोना।
तुम गर आते अच्छा लगता
पास का होने से जी भरता
तुम्हें ऐसा क्या नहीं लगता
सच कहता हूँ अब तडपता।
आराम क्या इसे कहते हैं
लेटे लेटे भी खालीपन हैं
सुखद बिस्तर बेचैनी हैं
मस्तिष्क विकार भरा हैं ।
बिम्ब साकार क्यों होते जाते हैं
तन्हाई माहोल बिखरता कब हैं
अमूर्त मिथ्या खुद सच्चाई हैं
पर सत्य इसे नित काटता हैं ।
वहीं बात जिससे हम भयभीत हैं
तुम जानते हो वहीं क्यों होती हैं
बसते उम्र भर रहे होती रहती हैं
उपाय किये परिणीती होती ही हैं ।
समझाइश आपने भरपूर की कर सकते
बाकी क्या रहा जो मुझे करने को कहते
दिल का मामला बेढंगा लोग हमें समझाते
वहीं समझ मेरी हैं फिर क्या उसे कहते ।
मैं छोड़ देता हूँ क्षमा कहता हूँ
पल ही पला हूँ फिर बिखरा हूँ ।
गहरी हो संवेदना चाहिए
टीस पीर निदान चाहिए
पकडे वेसे जाल चाहिए
डूबा रहूँ प्रेम झील चाहिए ।
मकसद मंथन मस्तिष्क मेरा
झकडन कंचन भंडार घनेरा
चितवन नयन उन्माद वसेरा
धडकन भीतर रसभरे घनेरा।
दिल उदास पराया होता हैं
मिले दिल पराया अपना हैं
बड़ी बेसुझ जिन्दगानी हैं
अपना पराया प्रेम मिले हैं ।
सुंदर कुरूप शब्द क्या सार्थक होते हैं
हैं तो अपना मापदंड स्थापित किये हैं
नहीं फिर किसे शब्द दे जहां सच्चाई हैं
सच्चाई पेमाने आशक्त मन गढता ही हैं ।
हारे हुए मुसाफिर थक कर बैठे रहना पडेगा
यात्रा तेरी अधबीच रखे ही मन मारना पडेगा
सहारे किसे मिले मायूस होकर देखता रहेगा
हंसते गाते कारवाँ जिन्दगी का निकला करेगा।
जाइये हमे छोड कहां जाएंगे
मन लेकर जाते हैं चैन पाएंगे
रास्ते चढान के साथ लाएंगे
हारे दिल मे फिर हमें पाएंगे।
तुम कमजोर क्यों रहते हो
क्या तुम चिंतित किसी से हो
सच परायों के पीर द्रवीत हो
अपनो की कद्र कब रखते हो ।
जल्दी करो अब शाम भी आ गई हैं
अब थके हारे पंछी घौंछला चाहते हैं
आप राह रूके फिर साथी कहते हैं
रात के अंधेरों से पीछा छुडाते हैं ।
थकान एक हकीकत हैं
स्वीकार करना विवेक हैं
उड़ान कर्म जीवन का हैं
विश्राम थकान गेह सार हैं ।
अब चलूँ फिर मिलूँ
तब बोलूँ भेद खोलूँ ।
रात आने दो डर जाने दो
दिन सपने दो बल भीतर दो।








Tuesday, May 24, 2016

चेतना के बोल


चेतना के बोल
**********
हलचल कल कल बहे निरंतर
भगदड भ्रमित भरे रे अंतर
चेतन पल वस जगमग भीतर
आँख खोल छौर झलके अंतर।
हे मन इतना विकल हुआ क्यों
रे हर्ष इतना विगत हुआ क्यों
हे चेतन थका क्या लाचार क्यों
हृदय रे यह मन की बात हैं क्यों ।
रिमझिम बरखा बरसे हैं कहां
झिलमिल जलता दीप हैं कहां
जगमग प्रकाश फैला हैं कहां
छनाछन नेह स्वर लय हैं कहां ।
दीपक जला दिया प्यार का
आराध्य के सत दीदार का
चेतना जागरण श्रृंगार का
शरण रज बन सकूं चाह का ।
स्वीकार हैं हर हाल मिले तेरा
अंगीकार हैं हर दर्द गर हो तेरा
नसीबदार हैं हम छाया हैं तेरा
लगी जीगर हैं गर दर्द छूपे मेरा।
आकर डाल दी दिल मे नींव गहरी
पूरे चित छा गई हैं तुम्हारी परछाई ।
अब जीना मुश्किल हैं स्मृति के सहारे
खेर रहे कैसे घटा विरह की घहराई ।।
वेदना का जाल जीवन वेदना का जाल
चेतना वर हार जीवन चेतना वर हार ।
खेलता छल खेल जीवन खेलता छल खेल
झेलता विरह रार जीवन झेलता विरह रार।।
डौलता हर धाम जीवन डौलता हर धाम
खोलता दुख गांठ जीवन खोलता दुख गांठ।
बोलता पीर बोल जीवन बोलता पीर बोल
बोहता टीस ठूंठ जीवन बोहता टीस ठूंठ।।
ढल गई रे सांझ जीवन ढल गई रे सांझ
काली कलूटी रात हे जीवन काली कलूटी रात।
नीर आँख अंधी रे जीवन नीर आँख अँधी
सांवरियां पग हैं गात जीवन सांवरिया पग हैं गात ।।
घड़ी अनमोल आई रे जीवन घड़ी अनमोल आई
जाग सके अवसर रे जीवन जाग सके अवसर।
लागणी तन छोड़ रे जीवन लागणी तन छोड़
भवसागर ऊडो रे तार जीवन भवसागर ऊडो रे तार।
मुग्ध मगन हुए राम रस मीठा
मन लगन लगी जग लागे झूठा
माया ठगनी डाले मोहक मूठा
तन मरा माया से हो गया ठूंठा ।

आते##


प्रेरणा फूल गूँथने लगी हैं
आत्मा झकझोरने लगी हैं
काला छाया छिटक रहा हैं
रौशनी कक्ष चित फैलती हैं ।
सृजन पल सूक्ष्म पकड़ लेता हूँ
ताने बाने शब्दों के बुन लेता हूँ
गागर मे सागर निचौड लेता हूँ
अनकही फिर उजागर करता हूँ ।
बिखरे भावों आओ मे तुम्हें पनाह दूँ
असंगठित रहते कद्र नयी दिलवा दूँ
प्रेरक बन कर बिखरे जनो को बल दूँ
लम्हें आये न आये गीत नये गा ही दूँ।
जल्दी जल्दी काम पटेगा
बाजार भी तो जाना पड़ेगा
घर का सामान लाना पडेगा
बच्चा तेरा भूखा रोता होगा ।


आते @@@


भाई संभलकर बोलो निवेदन से क्यों खोलो
बेहोश हो क्या जो डोलो इस तरह हमें मत तोलो।
आने का कहा तो हैं चिंता ना करे अपने हैं
बिमारी मे मदद देते हैं आज कर्ज भी सेवा हैं ।
मत कहो बिकाऊ क्या केवल हम हैं
बडे भोले हो अरे अच्छे भले बिकते हैं
भाई हम तो फिर भी नीति से बिके हैं
बड़े से लाट तो रात दिन यही करते हैं ।
दाव लगा आप गाली क्यों देते हैं
हारना हम भी कब क्यों चाहते हैं
सुबह से भूखे दम रहता कहां हैं
अब क्या करू हम तन धन हारे हैं ।
चिंता से हर पल घिरता रहा हूँ
कभी जोर लगा उसे तोडता हूँ
कभी विद्धवानों के तर्क रखता हूँ
कभी उपजे विवेक को देता हूँ ।
कुछ समय के लिए चिंता मिटती अहसास हैं
विचारों के समूह जाल जब उसे घेरने लगते हैं
टिकते उसके सामने पल तक चिंता जीतती हैं
दुगूने वेग से विशाल आकार ले हृदय घेरती हैं ।
करता जाता हूँ चिंता जितनी
विशाल विस्तार पाती उतनी
हृदय गगन आँधी गर्जन ठनी
भयभीत हैं प्राण विपदा घनी।
कौन कब कैसे संत्राण देता
हर किसी का संताप कहता
प्राण सिसकते विराग रहता
भावना विनष्ट रक्त राग बहता।
खोल दे जीवन भेद अपने
बोल रागिनी तू राग अपने
डोल किस्मत जोड सपने
आज कुछ हो सके अपने।
जितना पाया उतना ही गवाया
कितना ही सारा व्यर्थ गंवाया
बितता उतना जितना कमाया
फिर भी सिर पर कर्ज चढाया।
अब क्या हैं कहे बिना कहे ही रहे
उदासी नित रहे यही जीना कहे।
भरे हुए लोग भी कहीं होते होंगे
तृप्ति के अहसासी भी कहीं होंगे
रेत से शुष्कता गिलापन सिखेगे
धराशायी कैसे उठे सीख लेंगे ।
तुम क्यों कहते कि मैं आजाद हूँ
मैं ऐसा कहने से ही झिझकता हूँ
डरते बिता जीवन सच कहता हूँ
जिम्मेदारी सभी की रखता हूँ ।
ढेर सा सब्र जीवन मे गति कैसे लाता हैं
गैर का दर्द हृदय हमदर्दी क्यों लाता हैं
फेर दिनों का हमारी पहचान बदलता हैं
मैल दिलों का समय रूख बदलता हैं ।
अनुभव अगर सीख देते तो संभल जाते
करूणा क्रिया करती तो दुख क्यों आते
खंडित विचार कभी प्रभावित नहीं होते
सागर टूटे बिखरे पर नदियाँ कहां लाते।
कई बार मेहनत परिणाम सुखद नहीं लाती
हम मेहनत से ही पीछे रहे हैं थोडे जजबाती
सच्चाई के रास्ते आगे बढने के हैं हिमायती
देख चुके मंद बुद्धि साथी बने हैं सियासती।
मधुर मधुर तारो का नर्तन मन भाया
काली चितरी कालिमा का घनछाया
चिर झंकृत सितारें संगीत मनछाया
मंडल मंडप लावण्य नाच नचाया।
नीरव नीरज कुसुम टीम टिमाये तारे
भीतर मंथन सुख गागर रसमय सारे
मादक थिरकन बदन सुंदर काम मारे
राग की गागर बहे चित सुंदर परनारे।
ठंडक देती पवन के चित झौके
भड़क उठी रे मन ज्वाला रोके
कडक हैं चित चंचल नैन झरोके
लागी अग्न भीतर की कैसे रोके।
सिंगार अलौकिक रूप सलौना
तन भरा कसावट चित करे खोना
मद मार रहा हैं जीवन हुआ बौना
सब छोड संग तेरी चाहूँ मैं खोना।
तुम गर आते अच्छा लगता
पास का होने से जी भरता
तुम्हें ऐसा क्या नहीं लगता
सच कहता हूँ अब तडपता।
आराम क्या इसे कहते हैं
लेटे लेटे भी खालीपन हैं
सुखद बिस्तर बेचैनी हैं
मस्तिष्क विकार भरा हैं ।
बिम्ब साकार क्यों होते जाते हैं
तन्हाई माहोल बिखरता कब हैं
अमूर्त मिथ्या खुद सच्चाई हैं
पर सत्य इसे नित काटता हैं ।
वहीं बात जिससे हम भयभीत हैं
तुम जानते हो वहीं क्यों होती हैं
बसते उम्र भर रहे होती रहती हैं
उपाय किये परिणीती होती ही हैं ।
समझाइश आपने भरपूर की कर सकते
बाकी क्या रहा जो मुझे करने को कहते
दिल का मामला बेढंगा लोग हमें समझाते
वहीं समझ मेरी हैं फिर क्या उसे कहते ।
मैं छोड़ देता हूँ क्षमा कहता हूँ
पल ही पला हूँ फिर बिखरा हूँ ।
गहरी हो संवेदना चाहिए
टीस पीर निदान चाहिए
पकडे वेसे जाल चाहिए
डूबा रहूँ प्रेम झील चाहिए ।
मकसद मंथन मस्तिष्क मेरा
झकडन कंचन भंडार घनेरा
चितवन नयन उन्माद वसेरा
धडकन भीतर रसभरे घनेरा।
दिल उदास पराया होता हैं
मिले दिल पराया अपना हैं
बड़ी बेसुझ जिन्दगानी हैं
अपना पराया प्रेम मिले हैं ।
सुंदर कुरूप शब्द क्या सार्थक होते हैं
हैं तो अपना मापदंड स्थापित किये हैं
नहीं फिर किसे शब्द दे जहां सच्चाई हैं
सच्चाई पेमाने आशक्त मन गढता ही हैं ।
हारे हुए मुसाफिर थक कर बैठे रहना पडेगा
यात्रा तेरी अधबीच रखे ही मन मारना पडेगा
सहारे किसे मिले मायूस होकर देखता रहेगा
हंसते गाते कारवाँ जिन्दगी का निकला करेगा।
जाइये हमे छोड कहां जाएंगे
मन लेकर जाते हैं चैन पाएंगे
रास्ते चढान के साथ लाएंगे
हारे दिल मे फिर हमें पाएंगे।
तुम कमजोर क्यों रहते हो
क्या तुम चिंतित किसी से हो
सच परायों के पीर द्रवीत हो
अपनो की कद्र कब रखते हो ।
जल्दी करो अब शाम भी आ गई हैं
अब थके हारे पंछी घौंछला चाहते हैं
आप राह रूके फिर साथी कहते हैं
रात के अंधेरों से पीछा छुडाते हैं ।
थकान एक हकीकत हैं
स्वीकार करना विवेक हैं
उड़ान कर्म जीवन का हैं
विश्राम थकान गेह सार हैं ।
अब चलूँ फिर मिलूँ
तब बोलूँ भेद खोलूँ ।
रात आने दो डर जाने दो
दिन सपने दो बल भीतर दो।








Sunday, May 22, 2016

हिलता---


विश्वास शब्द अर्थ खो चुका हैं
धन बल सामर्थ्य रूतबा बढ़ा हैं
विद्वान व्यर्थ तर्क जाल हुआ हैं
मानवता चित्कार अनर्थ दबी हैं ।
कोन उबारे किसको चिंता हुई हैं
भूखे नंगे बदन कातर चित खड़े हैं
फौज बड़ी दुर्जन हथकंडे लिए हैं
राग हित सबका कोलाहल रचा हैं ।
परिणाम मत पूछो पता नहीं हैं
इतना कहना शायद जरूरी हैं
विनाश विकास अब कगार हैं
चेतना अब सभी की जरूरी हैं ।
अब कह चुका बहुत पर राग नहीं हैं
थार धरा का उडता काला धुआँ हैं
झिलमिल प्रेम रस वर्षा धार नहीं हैं
सुगंधित पवन पावन स्पर्श नहीं हैं ।
करो करो थोड़ा त्याग स्वार्थ का
भरो भरो रीते हृदय राग प्रेम का
लडो लडो मन हटे राग संग्रह का
डरो बुराई से ध्यान लो ईश्वर का।
चमकती सी हर चीज धुंधली तो होगी
दमकती जिन्दगानी कालिमामय होगी
लरजती थिरकती दुनिया ठहरती होगी
गरजती बरसती घटा कभी मिटती होगी।
कान हैं सच्ची कथनी सुनने के काम लो
हृदय दुखी दशा चित जुड सके ठान लो
सहारा बेसहारों का तन सार्थक जान लो
भाईचारा सबब रहे जीना खुद संवार लो।
दमन हो सके तो दुर्विचारों का हो
मगन हो सको तो परोपकार मा हो
लगन लगी हैं तो अच्छे राह की हो
डगर पावन सर्व हितकारी तेरी हो।
झूठ मूठ के बनने संवरने से क्या पाओगे
लूट पाट के ठाट से भीतर दर्द कैसे बचोगे
कूट मार हडपा धन सिर ऊँचा रख सकोगे
रात दिन मेहनत कमाया संतोष रखे जिओगे।
मत कहना थक गया हूँ
हारा हुआ फिर उठता हूँ
खेल जैसा अब जीता हूँ
कहना मत घमंडी हुआ हूँ ।
जाते जाते फिर ठिठककर देखने लगता हूँ
घर मे पीछे काम की वस्तु तो नहीं भूला हूँ
यंत्रवत जीवन का चलता फिरता नमूना हूँ
घर आँफिस बीच का खरीदा हुआ पुतला हूँ।


हिलता यथार्थ ।


हिलता यथार्थ ।
हमें कुछ कहने दो
दर्द थोड़ा सहने दो
गम हो तो हमको दो
 विरानी हो तो दो।
माँगना तो अभी सीखा हूँ
जुबान से लडखडाता हूँ
हाथ याचक से बनाता हूँ
स्वर नरमी कोशिश मे हूँ ।
क्या आप रहम सहयोग करेंगे
हिम्मत दम मुझमे थोड़ा भरेंगे
लाचारी का गाना तो ना गायेंगे
मेहरबान दयालु ऐसा नहीं करेंगे ।
बड़ी आशा हैं दिल कहता हैं
काम निश्चित हैं चेहरा बताता हैं ।
अब क्या हो गया हैं आप तो बड़े चुप हैं
देखते मना ना कहे पहली बार घातक हैं ।।
बहुत हूँ भटका आपको तब पाया
कहां मिलते हैं सुनने वाले हमछाया
थोड़ा दर्द भरा अतीत मेरा हूँ लाया
आप सुनेंगे लगेगा मेरा बोझ ढोया।
अब ऐसी जल्दी मत करो
बैठो पास नहीं हूँ चोर कि डरो
नहीं विश्वास खुद पर करो
कष्ट थोड़ा सुनने का भी करो।
तो क्या मैं समझु मुझे सुनोगे
हाल बयान करूंगा नहीं उबोगे
भला हो आपका कृपा करोगे
एहसान से आज आप मुझे तारेंगे।
दुख लगेगा थोड़ा पर मैं तले दबा हूँ
पहचाना आपने अगर तो दुआँ देता हूँ
परायो का क्या अपनों का मारा हूँ
रात दिन नौचा गया ताकत खोया हूँ ।
भाई मेरे कुछ सलाह दो
खाई चौट तुम उबार दो
टीस लगी हैं मरहम दो
अब ना लगे कोई उपाय दो।
खो दिया अब रहा क्या
ममत्व महत्व बचा क्या
कठोर छीना होगा क्या
भूले उपाय दोगे क्या ।
ऊपर ऊपर सांत्वना मत देना
भीतर तक हिले पिघले करना
देखो ठोस नमनीय हो कहना
सुनुंगा मैं कुछ लायक बनाना।
मैं भी कितना पागल हूँ अभी तक अपनी गाता हूँ
शायद बेचैनी ही जीता हूँ माफ करे कहें मैं सुनता हूँ ।
शाम दुख की ढलेगी सुनते हो
विपदा किसे नहीं आती कहो
हर कोई जीता गोदी दुख हो
संभालो खुद को पीर घनी हो।
बीच मे बोलता हूँ पर माफ करना
क्या रटा रटाया कहा सुनते रहना
क्या यही शब्द रह गये उम्र सुनना
अंत करोगे ऐसे शब्दों का।बताना।
जीवन अब वेसा कहां पहले जो था
सब बदल चुका जो पुराना मेरा था
नये विचार मूल्य धोते अतीत गाथा
मित्र मैं नया शब्द अर्थ चाहता था ।
लगता हैं मेरी परंपरा से जीते हो
नयापन अभी कपडों तक लाये हो
अब प्रचलित शब्द से काम कैसे हो
किस उद्देश्य फिर नये बने रहते हो।
जैसे भी हो आदमी तुम सहृदय हो
अपनत्व भूले जग मे केवल बिरले हो
दंश विष पाया नहीं भाग्यवान हो
अब लो दुआँ मेरी खुश हाल बने रहो।
बहुत ज्यादा हो जायेगा सबकुछ बिखर जायेगा
घेरा कमजोर कैसे टिकेगा भंवर मायावी फसा रहेगा ।
कोई उपाय जानता हैं बंधन तौडना आता हैं
तौडने का क्या जोर हैं जोडने मे जोर आता है।
क्या अब रिश्ते अपनापन देते हैं
ओर प्रश्न नये आयाम ढूँढ लेते हैं
मूर्ख हम सभ्य समाज से आते हैं
परंपरा संस्कृति महत्व रखते हैं ।
महत्व किसका कितना आप क्या जानते हैं
कौन प्यारा घृणित हैं भेद भीतर समझते हैं
रात दिन हमें किसकी क्यों याद सताती हैं
मूल विश्लेषण मस्तिष्क रात दिन करता हैं ।
एक महिन किन्तु अशोभनीय तत्व भीतर अडिग हैं
मलिनता अति घनी उसकी सुंदर कवच से ढकी हैं
कवच की मोटी चमडी भीतर की मलिनता ढके हैं
हृदय बेबस टूटा बिखरा दर्द से धीमी कराह लेता हैं ।
कौन ऐसा जो सुन सके कराह हृदय की
कोमल दर्द दे रहा दारूण स्वर की
कलुषित मन ठहाके भरता हंसी की
हमे भौतिक तृष्णा भा रही जगत की ।
अब क्या कहूँ भीतर खाली खाली हैं
लगता खालीपन ही रक्त मिल गया हैं
प्रवाह रक्त वेग घटता बढता रहता हैं
रस रक्त मे संक्रमण से खतरा बढा हैं ।
खतरे एक दो संख्या के हो तो गिनाऊँ
कहां कब कैसे कौन सा खतरा बताऊँ
क्षण हैं हम हैं कल की बात कैसे बताऊँ
आश्वासन आधार कब था जो मैं बताऊँ।
फिर भी आशा का दायरा बढता रहा हैं
आज की परवाह किसे कल को जीना हैं
रहेंगे सदियों राशिफल रोजाना देखा हैं
हडपते लुटते कला से जीवन बिताना हैं ।
द्वीप सागर के मध्य स्थित खड़े हुए हैं
विकराल लहरों का दंश झेल दृढ़ बने हैं
ढेरों चक्रवात झंकझोरते मिटाने तुले हैं
दृढ़ता बीच कहीं करूण पुकार सुनी हैं ।
क्या पुकार ध्वनि प्रहार लहरों के दबी हैं
तरल दृष्टि हमारी उन तक कभी पहुँची हैं
खुदगर्जी मे जीते रहे मानव फिर भी तो हैं
दानव मानव भेद कैसा भाईचारा अमिट हैं ।
आज भी द्वीप बना हुआ अपने दम से हैं
आप सौचे तो कितने खुद के बल बढे हैं
लायकियत खूब बखानी हम करते रहे हैं
जरा नियत टटोले उसमें कीडे अदद पडे हैं ।
आप हमसे नही कहें सब से कहें
सार जग समझे फिर कुछ कहें
बोझ दकियानुसी लिए आप बहे
हम सभ्य हैं असभ्यता क्यों सहे।
पुरानपंथी बना कर सत्यानाश करोगे
शास्त्र ज्ञान देकर भविष्य बर्बाद करोगे
तिकडम का जमाना हमें बुद्धू ही रखोगे
बातें तुम्हारी नीरे मूर्ख होंगे वहीं सुनेगे ।
यहां जितना चालबाज उतना ही विकसित
दगाबाज मर्मज्ञ घना समृद्ध होकर प्रकाशित
सभ्य चोर लुटेरे वहीं तो कुशलता के सृजित
संस्कृति  कुचले वो दुनिया करे परिवर्तित।
ऐ मेरे प्यारे चमन छलक उमडा बांध स्नेह का
विविधता की बाढ संजोये गीत गाता एकता का
बीच इतनी तनातनी भी भर देती अंबार स्नेह का
अच्छे बुरे  भेद नहीं बुनता सपना विकास का





आते ///


दौडना आता पर पैरों मे शक्ति चाहिए
हकीकत जानते पर फिसलना चाहिए
डगर मुश्किल पर आगे बढना चाहिए
हैं रात पर रोशन दीया जलना चाहिए ।
अकेले क्यों चलो साथी को ढूँढ लो
कई साथ चाहें अकेलेपन से त्राण लो
जीवन मात्र तुम्हारा नहीं उनका भी लो
मिले रस दोनों को आनंद पूरा जी लो ।
तुम जानते हो तुम्हारे कार्य का परिणाम
अहसास होता पूर्व मे अच्छे बुरे अंजाम
साहस पुरुषार्थ भीतर करें गति विलोम
झेलते दुख भार संघर्ष बने विवशता मर्म।
सोते रहना कहते हैं सुख का इजहार हैं
मन कहे तन सुख का आभास ले रहा हैं
वहीं तन क्रिया शिथिल हुआ निक्कमा हैं
नित नयी बीमारी से खुद घिर जाता हैं ।
सुनोगे कुछ कहता हूँ
दिल दुख तले पाता हूँ
रोशनी कतरे ढूँढता हूँ
सहारे खोज ही जीता हूँ ।
उम्र अभी बाकी हैं
उम्मीदें तो काफी हैं
तलाश रास्ते की हैं
मिले तभी शांति हैं ।
बहुत कम घड़ी देखता हूँ
जरूरत रही तो सुनता हूँ
क्रिया प्रतिक्रिया देखता हूँ
जवाबदेही नहीं पाता हूँ ।
मान सम्मान का सिलसिला पुराना हैं
सिलसिला चलाने का भी फिलसफा हैं
कुछ काम बनते कुछ नकाराओं का हैं
कुछ भी फायदा सत छोड सबका हैं ।
कम से कम हरेक को सम्मान देते रहो
अपने पराये सभी आपसे संतुष्ट हो
सम्मान देते तो क्या जाता छोटे बने हो
छोटेपन मे बडेपन अंकुर जानते हो।
विरानता ही विराम का हेतु हैं
निष्क्रियता ही जडता सार हैं
हलचल गति की पहचान हैं
विवेक जीवन का सारा मर्म हैं ।
फल मिले ना मिले काम तो करो
राह मिले ना मिले चला तो करो
सहारा मिले ना मिले स्नेह तो करो
भरोसा हो न हो मानवता कर्म करो ।
आते

आते ***


समझदार सब कहे पढ़े तुम बेशर्म हो
खबरदार नीचों ऊँचों के आडे आते हो
बाप दादों की परंपरा धूल मे मिलाते हो
खुद नारकी जीव हमें नरक गिराते हो।
नास्ता कहां ठंडी रोटी कुत्तों की रात बची दे दूँ
सुबह आता कुत्ता आज आया नहीं तुमको दे दूँ
मजूरी मांग ही लेना आटे बिना बच्चों को क्या दूँ
गुजारा होता नहीं मैं पडोस मे मजूरी का कह दूँ।
झील की गहराई धैर्य जीवन का गढती हैं
वहीं गहराई असीम जीवन संतोष देती हैं
ऊछाल आने पर आलोडित प्राण चेतना हैं
चेतना की सक्रियता डूबोता प्राण राग हैं ।
थाह कैसे मिले असीम तरंग हिलोडित हो रही
रूके थोड़ा तो एक नजर भर की पहचान वहीं
तनमय होना मनमय होने की तैयारी ही सही
एकरस हुए बिना असीमता की थाह मिले नहीं ।
करवट वक्त कब जब नहीं लेता
बरकत भाग्य मे कब नहीं देता
हरकत जीवन कब नही करता
कर्म मानव जब पग नहीं रखता।
गल नहीं सकता पत्थर
हिम खंड ताप बने नीर
निर्जीव लक्षण हैं पत्थर
हिम खंड रखे तरल धार।
समापन जीवन रहते क्यों कहते हो
क्या कहने से समापन क्रम करते हो
लगे ऐसा पर यह वश नहीं दंभ मे हो
शक्ति इतनी रखते भी झूठ फैलाते हो।
हारा हुआ कभी दंभ नहीं करता
मरता कभी शिकवा नहीं करता
झूठा कभी सच्चाई नहीं कहता
लूटा वो कभी इक्कटा नहीं करता।
कभी इधर कभी उधर ठोकरे सभी की खाया
किसी का प्यार तो किसी की घृणा पूरी पाया
कहीं दुत्कारा तो कहीं पुस्कारा मिला वो भाया
कौन अपना कौन पराया सभी ने बेमन अपनाया।
गुलाब गंध पवन संग मिलकर प्रसार पाती हैं
सुगंध पवन मे बंटती तभी असलियत पाती हैं
हम बेमतलब संग्रहण काबलियत खुद को करते हैं
कारण यही कुछ रखते पर गुण बांट पाते नहीं हैं ।




Friday, May 20, 2016

आते """""""।


चाहो तो मुझे साथ अपना दे दो
चाहो तो मुझे खुद से जुदाई दे दो
चाहे न चाहे दुनिया बीच फैंक दो
चाहो तो जीवन आधार कुछ दे दो।
सहे कितना दर्द ओर कुछ हद तो हो
भरे दुख कितने चित पात्र खाली तो हो
करें कितना कर्म कुछ परिणाम तो हो
जीये अब कितना कोई अपना तो हो ।
खाली खाली घर हैं मेरा
भारी भारी दिल हैं मेरा
बारी बारी पीड़ा हैं घेरा
काली काली रैन का डेरा।
जब तक समझ आती आप चल दिये
मन असमझ मे डाल अब कैसे जीये
हम अकारण मेहनत करते थक गये
गुत्थी जीवन की किससे सुलझाये।
मन नादान कहता फिर मिलेंगे
जुड़े कैसे दूरी असीम मिटेंगे
फिर हुआ कब बिछुडे जियेंगे
तन छूटे काल के फासले रहेंगे ।
छाया अब ठंडक देती नहीं
काया अब चेतन रहती नहीं
माया अब मन लुभाती नहीं
पाया अब स्थिर लगता नहीं ।
तार हृदय तरंगित कर सके तो जानू
वेदना चित राग फिर से ऊठे तो मानू
घाव का फैलाव रस राग दे तो जानू
लहरों का सागर हृदय घेरे तो मानू।
देकर व्यथा भार कुशल पूछते क्यों हो
पीकर घूँट कडवा मीठास चाहते क्यों हो
लेकर चैन मेरा सुख गर्व इठलाते क्यों हो
जीकर दर्द अपना मिटे तो सताते क्यों हो।
नहीं कहते हमे सहारा दो
फिर सहे कुछ करुणा दो
नहीं रखते आस सुविधा दो
फिर क्यों छिनते हमारा दो।
शायद जग मे यह होता होगा
थोड़ा तो भी छीना जाता होगा
काबिलों का हक ज्यादा होगा
निर्धनों की तकदीर रोना होगा ।

आते'''''।


कल मेरा होगा विश्वास नहीं
अस्तित्व आज अभी हैं सही
कौन आबाद रहेगा कहता नहीं
कौन नाबाद रहेगा कहता नहीं ।
सब कुछ तो हैं फिर उदास क्यों हो
आसपास यातना देख समझे नहीं हो
घडा तुम्हारा रीता हो जाता क्यों कहो
लेने वाले दर खडे पर देने आते क्यों हो।
विवेक मेरे क्या तू जीने देगा
ममत्व क्या तू कभी मिटेगा
कसक पीड़ा छोड जियेगा
सार संसार कभी पायेगा ।
न तो तुम सपने देखते हो ओर न मैं भी
न तो मुझे समय सोने का ओर न तुम्हे भी
न मेरे खर्च कमाई से पूरे होते न तुम्हारे भी
बिना नींद मैं कैसे सपने देखूं ओर तुम भी।
ऊँचे भवन बहुतों के बन चुके बन रहे हैं
विकास गंगा रात दिन बह चुकी बहती हैं
हमने वे बनते ये बहते हमेशा देखी देखते हैं
कैसे बने ओर बही न समझे न समझते हैं ।
अरे तू बडा अनजान गंवार लगता हैं
क्या किसी गांव मे रहकर आया हैं
पटखनी खेल वहां भी लोकप्रिय हैं
शहर आया वहीं खेल सभ्य हुआ हैं ।
भाई दशा देखी हम तुमसे द्रवित हुए हैं
कुछ कहेंगे फिर करेंगे हम मददगार हैं
कामधन्धा देंगे गुजारा भी देंगे काम हैं
केवल कुछ भी काम दे करो तो मंजूर हैं ।
काम अभी नहीं कह सकते हम कहा न
मंजुर करो कोई भी करवाऊं मैं करोगे न
पगार दूंगा खाना दूंगा काम पर रहोगे न
झूठा सच्चा जो भी बोलू काम करोगे न।
क्या आचरण का मापदंड बदला बदली करता हैं
क्या जीवन कमाया पुण्य काम किसी के आता हैं
क्या हम रहते जीवन कुछ सहृदय भाव अपनाते हैं
क्या पराश्रित रहते निक्कमापन ही हम अपनाते हैं ।
हर जगह समन ही हो यह जरूरी नहीं
दर दर ठोकरे ही मिले यह जरूरी नहीं
कर्म करे विश्वास से फल जरूरी नहीं
फर्ज मानवता निभाये भाव जरूरी नही ।
दिन भर काम से फुरसत हमे कहां
रहते रात दिन हम धंधा जमे वहां
करते काम निकला हैं जीवन यहां
लगाव काम साथ लोगों से ही रहा।
कहते कहें वहीं हम साथी हैं मददगार
रहते दुख सुख मे मिलकर हमसफर
रहता आपस मे रिश्तों मे बड़ा प्यार
जिन्दगी का ऐसा अनुपम हैं व्यापार ।
जीये प्रेम रहे प्रेम करें सभी को बेहद प्रेम
भीगे नयनों का सहारा बनें रहे यहीं काम
बड़े हमारे हमसे नित्य आशा रखे तमाम
करो सभी को जीवन मे विनीत हो प्रणाम ।
जब तक तुम झुकते नहीं मानव कहना ठीक नहीं
जब तक तुम दर्द सुनते नही सहृदयता आती नहीं
जब तक सहारा बने नहीं व्यर्थ रहा यह जीवन नहीं
जब तक पीर गरीबी जानी नहीं हृदय रखते हो नहीं ।
पूरे हो कैसे ख्वाब तेरे
खार क्रोध हथियार तेरे
प्रेम का हिसाब चित तेरे
शीतलता कैसे हो मन तेरे ।
सबकी मैं सुनता तो रहता हूँ
सुनी को फिर गुनता रहता हूँ
गुनी को नित सबको कहता हूँ
सब अहंकारी कहें मैं ढूँढता हूँ ।
बोझ नहीं माँ ममता का इम्तहान हैं
भरोसा अपने का रहे यही परख हैं
काल किसी को ढील देगा ख्याल हैं
काम ही काल का परिणाम सत्य हैं ।
जीवन मेरे कोई शिकवा तुझसे नहीं बहुत दिया
औकात कहां थी मेरी संभ्रांत जनो मे तुझे जिया
माहौल कहां था मैं दम तेरे कुछ पढ़ लिख लिया
कर्म क्षेत्र भी तूने मुझे शिक्षा कर्म करने को दिया ।
आज फिर कहीं भ्रमित होकर जीना चाहता हूँ
खामोश रहते फिर नया नजारा तेरा चाहता हूँ
बिता जीते जीते ऊबा हुआ खुद दुर्गंध दे रहा हूँ
वर्तमान आज कुछ नयापन दे उसे चाहता हूँ ।
कल तुम आये तब कितना नमनीय दिखते थे
बात बात पर कैसे मुझे संघर्ष राह दिखाते थे
सलिका जीने का कारगर बने कैसे कहते थे
आज मायूस थके से हो क्या कल तुम्ही थे।
हमारा तुम्हारा करते करते मैं पड़ाव कगार आया
आना जाना चलते चलते थकान ले शरीर आया
घर पर घर भेद खूब किया अब भेद नहीं भाया
मालिक बने फिर नचाया नौकर खुद भेद पाया।
रो ले मनवा कर राम भरोसा
खो दे झूठा जगत विश्वासा
रख रे हिये मे तू राम भरोसा
उतरे सागर पार रख आसा।
नरम नरम स्वभाव ज्यादा ही हुआ हैं
करम धरम का ठहराव क्रियाशील हैं
जागरण कहूँ क्या नया समय आया हैं
विचारों का बिखराव संग्रहित हुआ हैं ।
मेरे भी लगते पराये भी सत्य हो
तेरे भी अरमान पाले जो सत्य हो
अपने पराये का फर्क भी सत्य हो
जीवन दर्शन दिखे कभी सत्य हो ।
घेरा मानव का विस्तृत नित बढ़ता
फेरा तो मानव जीवन का नित रहता
डेरा तेरा रहे कब तक तू कैसे कहता
गेरों का रहे कोई कब अपनों मे रहता।
सपने अपने पूरे होते गर तुम वफा निभाते
मंझधार मे छोड़ा पास रह कोई सजा देते
बहुत दर्द झेल चूके कोई अनजान दर्द देते
जीये किस आसरे कुछ समझाते फिर जाते।
लेते जाते देना सर्वस्व चाहा क्यों नहीं लिया
संताप छोड़ के तुम्हारा दिल संतोष से जिया
भौर संध्या अब मिले जीये कैसे संतप्त हिया
झेले कैसे तुम हो नहीं केवल दर्द आपने दिया।
बार बार आकर मेरे प्रिय भाव क्यों दे जाते हो
भार घना पीड़ा का मेरे हृदय तले भर देते हो
उठा पाऊं बोझ मे कैसे संकेत भी छीनते हो
ऐसे कैसे जी पायेंगे हम बोझ घने दबा देते हो।
अब मत कहना छल नहीं हैं
विडंबना जीवन धन नहीं हैं
काल विकराल आया नहीं हैं
विपदा घिरा हृदय तो नहीं हैं ।





Thursday, May 19, 2016

आते;


खुद दर्द सहे रक्षा की प्रतिदिन
अवसर रे सेवा कर उम्र नित दिन ।
भाव तेरे ढूँढ रे मानव
क्यों बिगाडे तू तेरा भव
मानव जन्म हैं लाजवाब
बना रे तू नित अभिनव।
बार बार करुणा की रश्मियों से
माता तेरा अनुराग बहा हृदय से
सिचा जीवन भरा हैं पर दया से
मोल करे पुत्र किस मापदंड से।
कहां से लाऊं बदला माँ ममता का
यहां कोई तुमसा नहीं समता का
ममता तेरी जग भोगे सुख जग का
वरना रह जाता सुखा तल जमीं का।
भाग्य मेरा तेरे गुण गाता
तू संसार का पावन नाता
फिका सारा मोह नहीं भाता
झूठ फरेब का दूसरा नाता।
हे माँ एक ही आँसू तेरा
हृदय तल मे झंझा घेरा
धिक् रे पुत्र जीवन तेरा
आया क्यों व्यर्थ रे फेरा।
सुनो सच क्या कह सकूंगा
रूको आहट हैं क्यों कहूँगा
भूलो भार झेलो तो सहूंगा
भुगतो पीड़ा दी वहीं रखूंगा।
जाओगे कहां किया तो साथ आयेगा
भागोगे किससे भाग्य तो साथ रहेगा
लाओगे कहां से दिया तो नहीं छोडेगा
जुडोगे किससे स्वार्थ तो नही छोड़ेगा ।
दर्द से बिलखते अनाथ से हमदर्दी रखते हो
दूर से देख अफसोस खूब परायो से करते हो
मदद चंदे के नाम पर रकम इक्कट्टी करते हो
सच तो यह हैं परोपकारी होकर चंदा ऐंठते हो।
खिलाओगे भूखो को तुम तो खुद खाने वाले हो
परायो का उपकार करोगे तुम तो स्वार्थी हो
उपचार करते तो हो जो रोगी यदि गरीब हो
दानदाता तो हो देते तभी न जब गुण गाता हो।
भरके कटोरे से द्वार भीखारी भीख देते हो
दुआँ सुने बिना द्वार कहां छोड घर मे आते हो
दिये का वसूले बिना आत्मा संतोष नहीं पाते हो
अवसर देने का मिला ईश्वर का धन्यवाद करते हो।
जगत ससीम जन विस्तृत असीम हैं
जीवन ससीम मन विस्तृत असीम हैं
शरीर सामर्थ्य ससीम कर्म असीम हैं
भंवर जाल फंसे चित सुख राह नहीं हैं ।
जाने वाले रूके सुना नहीं
पाने वाले भरे हो सुना नहीं
रोने वाले हंसे हो सुना नहीं
हंसने वाले रोये नही सुना नहीं ।

आते,,,


सुना तुमने कल फोन आया था
बुलावा घर से बीमारी संदेश था
तुम्हारी कमर पेर का दर्द ठीक था
जाओ नहीं तो लुटेगा फिर चैन था।
बारह बजे रात क्या अभी नींद आई नहीं
रात भर जागते बीमारी क्या आयेगी नहीं
क्यों सोचते इतना पढ़ें  मनन समझे नहीं
संसार रीत यही फिर जमाना अपना नहीं ।
आप क्यों बस हठ करके बैठे हो
दुनिया क्या कहेगी कुछ सोचते हो
गाली ही तो खाई हैं फिर भी तने हो
मार खाते बेटों से दिल समझाते हो।
खूब कमाते हैं किसी से क्यों हौड करते हो
मियाँ बीबी दोनों पढ़ें लिखे क्या समझते हो
हैं पुराना गाते किसे भाता कुछ जानते हो
बेटों के ठाट बाट से डरते इसी से जलते हो।
घर तो घर हैं पर इस अकड का क्या करें
आँफिस सब समझे हमें घर का क्या करें
रूतबा कैसे त्याग दे दुनिया कुछ भी करें
संघर्ष हमने किया दबे बड़े हमें नमन करें ।
रिटायर होते ही खुद नकारा समझ कैसे बोले काम का
काम करना आया नहीं जो कहते खूब बौझ हैं काम का
अब काम बिना कहते नित आराम मिला हैं पर नाम का
घर बाहर हैं खूब काम बढ़ा वक्त कहां मिले आराम का।
नींद आती होगी पर थोड़ा सहयोग करो
बच्चों के कल की परीक्षा का ख्याल करो
निर्मम कोमल बच्चों पर भार बहुत रहम करो
सिखाया सिखाने मे तुम क्यों इतना दंभ करो।
जब जब आते हो दर्द नया दे जाते हो
अब तो जिम्मेदार हो कुछ तो बोझ हो
कब तक ताकते रहोगे कुछ तेरा तो हो
नादानी का रोना छोड़ काम धंधा तो हो।
झंझावत झेल मजबूती का आभास क्यों ना हो
अनायास कुछ अहसास अस्तित्व क्यों ना हो
गिरते उठते कला जीना सिखे आगे क्यों ना हो
ओरो को हंसना सिखा कर दिल खुश क्यों ना हो ।
गर हमें इतना दर्द नहीं मिलता
तो तुम्हें अकेले रहना कब आता
पाते कैसे संघर्ष से अपना नाता
तुम्हारे आसरे का जीना ना भाता।
चाल की चौट जख्म गहरा देती हैं
उधार की हंसी कडवहाट देती हैं
भीतर मरे को मौत अपनत्व देती हैं
रिश्ते छल के अस्तित्व मिटा देते हैं ।
जुबान आते कभी सत्य अनकहे रखे हैं
भावना प्रबल होकर असत्य बोलती हैं
वे पल झूठे ही सही पर एक अर्थ देते हैं
असत्य मार्मिक भाव सत्य से बेहतर हैं ।
जीवन होता क्या पाप पुण्य का संग्रह मात्र हैं
खोज करते सत्य आस पास क्या रहता हैं
मन कर्म आकलन करते पक्ष अपना पाता हैं
भाव गूंथा सत्य नूतन तर्क से विजय पाता हैं ।
कभी कभार न चाहते भी कहता हूँ
शायद बड्डपन का बोझ ढोता हूँ
फिर मैं पछताता अपने से पूछता हूँ
तभी सलीके से जीने का सोचता हूँ ।
इधर तुम हो उधर परंपराएँ हैं
किधर रूख करे जग देखता हैं
हिचके आँख मूँदें तेरी बढते हैं
चुपके से मर्यादा तोडते रहते हैं ।
पलते सपने कठोर धरातल से रूबरू हैं
चुभते कंकर राह कठिनता का अहसास हैं
घनी राहों का जाल भंवर बना रूकावट हैं
संगी साथी अब जीवन लूटेरे भयानक हैं ।
सवेरे से ताकिद गांव जाने की हैं
डीजल के रूपये बैंक से लेने हैं
ए टी एम पुत्र को भेजना जरूरी हैं
बैंक बैंलेंच कम होने से परेशानी हैं ।
आँसू तुम कितने बेवफा अनायास क्यों आते हो
मधुर रसमय जीवन मे अब तूफान नया लाते हो
वेदना इतनी विरल होकर मार्ग फिर से आती हो
अनजाने दर्द भीगी शुष्क चिततल बीछ जाती हो।
किनारा कहां सागर विस्तार घना भ्रमित होता हूँ
वेदना तेरा राज हैं ऐसा भंवर जाल फंस जाता हूँ
कामना करूं सुख सागर की दुख घने घिरता हूँ
पाकर सुख नित खोता रहूँ क्या तृप्ति नहीं पाता हूँ ।
कितनी चाह से पाला सुख कृश काया में पायेंगे
उतनी ज्वाला देकर क्या अंत काल संतप्त करेंगे
दृश्य इन आँखों ने देखा तो विश्वास संतान करेंगे
प्रभु यही चित दिया तूने ममता का फिर क्या करेंगे ।
मद मार मदिरा मादक मन मोहित तेरा साम्राज्य हैं
एक दफे शोक मोज में मदहोश जान पान किया हैं
हृदय हारा मदहोशी तेरी तू ही मेरी जिन्दगी हुई हैं
बाकी सारा फीका कडवा अनमोल रसधार तू ही हैं ।
जब आनंद मादक मिले फिर संग साथ मिले
विवेकीजन मंद सभी मदिरा पिये नित खिले
फिर आदत खरी जिये कैसे बिन मदिरा मिले
कमाई गयी उधार लिया चोरी से प्याला मिले ।
घरवाली के गहने बिके घर से पूरा सामान बिके
जो था सो कुछ बिक गया रहे अब कैसे फीके
माँ का संग्रह पैसा फूंका रहे भरोसे भाई जी के
भाई दे दे तंग हुए तब गाली देते जी जी भर के।
गाली खाते कब तक सहते हम दौडे कहीं ओर रहने
बड़ी कमाई का हिस्सा डाला तब मेरे मकान थे बने
बेघर हुए बैंक कर्जा लेकर नोकरी थी वहीं घर बने
अब पी सके वे भाई साथ उनके रहे घूमते राक्षस बने।
रोज ही गाली देते माँ को नित आँसू माँ के बहते हैं
साथ लाता रहती पर गाँव घर याद कर उदासी हैं
हार कर आखिर गाँव भेजू पर मन मे चिंता खाती हैं
चक्कर लगाता गाँव हो आता दिल रहता भारी हैं ।
कल गया था मिलने माँ से फफक फफक कर रोई हैं
हृदय लगाकर रोया मैं भी कैसी मन विपदा छाई हैं
क्या हो सकता क्या करूं मैं भाई कसाई सम हुए हैं
संसार दिखाया जिस माँ ने अब मिटाने को तत्पर हैं ।
माता तेरा वंदन करूं किस तन
तन भी तेरा दिया पाया जीवन



शांत ,,आते क्यों हो।


सुख उनको तभी सिसकते मिलतेहम हैं कहीं
रखडते गुजरे जीवन आनन्द उन्हें मिलता वहीं
भंवर फसाकर तमाशा देख सुख पाते वहीं ।
कल तक जिसके लिए रात दिन चिंता मे हम थे
आज तड़के हमें सीख देते हैं हम चकित क्यों थे
आज हमसे ज्यादा पुष्ट हो उठे तो हम भयभीत थे
जड़ सिंचाई से पेड़ दिखाकर तिरस्कृत उससे थे।
आते क्यों हो
--  --  --  --
आते क्यों हो ख्याल गाफिल करते हो
भरते क्यों हो जीवन रीता दे जाते हो
आवाज दे कैसे गला रूंघा कर देते हो
प्राण रहे कैसे रूदन दरिया रोक लेते हो।
अबकी मेरे अपने बस इतना करते जाना
झपकी ले सकूँ आराम से कुछ दवा बताना
अपनी परायी या बाजारू मिले लेकर आना
किमत मिली पैंशन दूँगा कंजूसी मत करना।
जब घर पास रहते क्यों लगता मेरे हो
अब हर फेरा आते तो लगता पराये हो
कभी फुरसत मिले हमें भी संभालते हो
पर वह क्या धड़कन हैं जो खुद की हो।
सुंदर सपने देखे कब अपने बने सुना तो नहीं
अपने हुए सपने किसके बने ताउम्र देखा नहीं
भूल भूलैया जीवन सच जाना पर किया नहीं
मृगतृष्णा भंवर फसा जीव बाहर निकला नहीं ।
रात अंधेरी ही सही थोड़ी करीबी तो हैं
बात अधूरी ही सही पर शुरूआत तो हैं
गात जर्जर ही सही प्राण स्पंदन तो हैं
लात छलती प्राण पर खुद पनपायी तो हैं ।
सूट बूट तुम्हारे हमें चकाचौंध करते हैं
गुजरे जमाने की अभी तक याद देते हैं
लाख कहो सुधरे पर दिल तौड देते हैं
मुस्कराहट चेहरे से तिरस्कार देखते हैं ।

शांत ;


रहने दो खुली खिड़की ताजी हवा आती हैं
दूर दिशाओं का भीगा सा अहसास लाती हैं
बंद करते हो अंदर की उमस दम घौटती हैं
मेरे रहा क्या हैं भीतर जिससे श्वासे चलती हैं ।
बार बार कहते तुम हो मन को समझाओ
दर्द आप केवल नहीं अनेको हैं गिनाओ
जब सब दर्द जीते हैं उन्हें भी समझाओ
हमदर्दी का भाईचारा जीते जी निभाओ।
तनिक से पास बेठो न अच्छा लगता हैं
हमारा क्षणिक जीवन आपसे सारवान हैं
हम रहे न रहे फिर हमारी बातें रह जाती हैं
बातें ऐसी आत्मीय हैं हमारी कुछ देती हैं ।
भार बढते ही दुबक जाते हैं हम
फिर उठने को पूरा बल देते हम
उठते वहीं जो प्रयास मे हरदम
झेल गिरे हम उठना प्रथम हैं अंतिम ।
आवाज तो लगाने दो शायद किसी तक पहुँच पाये
झील तक कमल का दायरा हैं आगे सामर्थ्य खोये
सुगंध पवन के सहारे असीम दायरा बिखराव पाये
आवाज से सहारा मिले तो रस सागर खिंच कर लाये।
सूनेपन से घबराहट होनी स्वाभाविक हैं
यह पंगूता का सत्यता से साक्षात्कार हैं
हमारा दंभ कहता महसूस नहीं होता हैं
अकेलापन इसका अहसास कराता हैं ।
रिश्ते नाते जीने का सहारा होते हैं
व्यस्त रहते जिन्दगी बीत जाती हैं
वरना बड़ा मुश्किल जीवन जीना हैं
अनुभव से कभी यह समझ आती हैं ।
नकारा हुए अब हमारा अर्थ नहीं हैं
भार लगते पर दुनियादारी निभानी हैं
बदला जमाना अनुभव भी नकारा हैं
एकटक लाचार होकर उम्र बीतानी हैं ।
हाथों हाथ लेते अगर कुछ कमा कर लाते
सहभागिता का नाटक करते सब न अघाते
मतलब रहा क्या अब सब अपना ही कमाते
प्यार व्यार का झूठा खेल लोगों मे दिखाते।
अब जो कहता हूँ कभी शायद ही सोचता
जब भावना आघात हुआ कभी नहीं कहता
खाली हृदय बाहर से स्नेह की आशा करता
अपनों के होते क्यों जीवन बाहर की ताकता।
खूब संघर्ष जीया पर अधूरा रहा
अपनों को दिया पर पराया रहा
खुशियाँ आजीवन ओरो देता रहा
आज मुँह फेरो का तमाशा हो रहा।
आज चित हलचल भरा क्यों
दाज जख्म आबाद रहे ज्यौ
आ अतीत अब तू ही हैं क्यों
आजकल तू नादारद हैं क्यों ।
शायद आज ही रहता हैं
कल का आना सपना हैं
भूले ठगे जिन्दगी जीते हैं
अतीत मन का निवास हैं ।
मन तेरा क्या किया जाये
हर ओर से थकान ही आये
तेरे अंधे अरमान क्यों भाये
लडखडाते मन भरोसा आये।
हे मन अब तू झंझट सब छोड
करू विनय जीवन नहीं तोड़
भाग्य किया अब करे तू मोड
विरह दशा से हमे आज छोड।
कल से कैसे आस रखूं मैं
आज तडपन भौग रहा मैं
विरह जाल भंवर फसा मैं
राह उजाले पाऊं कहां मैं ।
फिर आओ तुम अंधेरा घना हैं
रात काली कलूटी घनी घटा हैं
डरावने माहोल मे घूटता दम हैं
मरना निश्चित सहारा भी नहीं हैं ।
सामना तेरा करने का आधार तो हो
झूठा साहस करने की शक्ति तो हो
लिपटा हैं कीचड़ थोड़ी सफाई तो हो
पावन हो लूं भावों से पात्रता तो हो।
अब कैसे कहोगे कोई सुनेगा संभावना हैं
तब कैसे रहोगे कहीं जीव संजीवनी नहीं हैं
सब कहते रहते आज समय बदल गया हैं
हम यूं ही जीते रहे ख्याल नये आये नहीं है।
जैसा भी वक्त होगा गुजारा करना ही होगा
अब किसी ओर के बचा जीवन जीना होगा
लाचारी कितना ही घेरे प्रयास सबल होगा
आशादीप सभी बंवडंरों से बचाना ही होगा।
अंत ऐसा होगा भावों का सोचा न था
कोमल कठोर प्रहार सहे असंभव था
बिखरे सपने धराशायी हुआ नाजुक था
कुचितो के जाल घेरे बीच मै फसा था ।
क्या कहूँ जीवन हैं अभिशाप
सूत्रों का बिखरा हैं अतिताप
सुलझते नहीं यही हैं संताप
विषम दारूण रहा प्राण कांप।
उखडे उखडे प्राण विकल
बचे कैसे भाव सूत्र विमल
जग निर्मित साज हैं धूमिल
आत्मलीन न होते घूलमिल।
उस पार सवेरे सना ऊँचा आकाश तो हैं
इस पार तट का मोह बना रूकावट तो हैं
उस पार सागर की सुमधुर झलक तो हैं
इस पार वासनाओं का घना जाल तो हैं ।
महक अब उठती नहीं खिले फूलों से भी
लहर अब बहती नहीं शांत हैं सागर भी
बयार चलती तेज नहीं हैं ठंडक फिर भी
तरंगों का भाव केवल शब्द बना आज भी।
ठीक नहीं होगा कहीं मानव का सभ्य होना
बीत गया संस्कार की परंपरा से सभ्य होना
सुख कृत्रिम चाहे नया भूले मूल उत्पन्न होना
फिर फिर पायें तृष्णा जनित दुख नया पाना।
दाता कौन समझना मुश्किल
जन्म दाता पालनकर्ता विकल
भरण पोषक रहे उदास काल
मतलब मात्र भरे सब सवाल ।
रिश्ते तार तार होते हैं तो क्या हम सभ्य हैं
रिश्ते दकियानुशी हो निभाते वे असभ्य हैं
परंपरा मे जीना जीवन की असभ्यता हैं
स्वछंद रहते पशु प्रवृत्ति जीये तो सभ्य हैं ।
हाल बेहाल मानव बूरा हुआ जाता हैं
काल कवलित जीवन रौदा जाता हैं
माल पाया अधर्मी धर्म धारक बना हैं
झूठा चालाक व्यक्ति शासनाधीश हैं ।
अपना पराया व्यक्ति का भ्रम ही हैं
पराये अपनों से बेहतर काम देते हैं
बुरे वक्त के हमराही बने साथ देते हैं
अपने मात्र कहने मे उपयोगी होते हैं ।
कहते हैं रिश्ते दार बुरे वक्त साथ देते हैं
करते हैं क्या उम्रभर हमने देखा नहीं हैं
लूटते मिले हैं खुशियों को भुगता घना हैं
काम निकला कि आँखे तरेरे मिलते रहे हैं ।
दुखी होते हैं अगर हमें सुख कतरा मिले कही

शांत;

शांत,,,


घूंट एक जहर का भी पिलाने वाला नहीं ।
भूलू कैसे रे प्राण प्यारे स्मृति चित घेरे हुए हैं
विरह केवल विरह जीवन संसार सार हुआ हैं
काल के क्रूर प्रहार ने कसक जीवन पूरी दी हैं
याद ही हैं चेतना का विरहमय वैराग्य बनी हैं ।
मेरी जिन्दगी मे फूल तो खिलते निरंतर रहे हैं
कभी खुशबू से हमारा भी बाग महकता रहा हैं
बाग खाली मत कहना कहीं से सुगंध आती हैं
भरपूर न सही घनी खुशबू का आभास देती हैं ।
अगर तुम लेना चाहो हम अपना दर्द ही रखते हैं
मगर दर्द का अहसास कभी अपनो को हुआ हैं
क्यों देखते नहीं कभी आपके अपने ही हम हैं
उस दर्द की थाह मिले कैसे रूबरू होते नहीं हैं ।
अपार सुख कहते किसे हमे मालूम हैं
दुख अपार होते बखूबी हमने जाना हैं
हमें कोई कहता पहचान मिलती हैं
दिल को अनजाने मे राहत होती हैं ।
सुंदर चित सुंदर तन करिश्मा ईश्वर क्या करता हैं
कहते सुना शास्त्र निखिल प्रकृति का बखान देता हैं
सिमित दुनिया रही हमारी अनुभव घना नहीं पाये हैं
जो मिला संतुष्ट हुए असीम प्रेम से जीवन बिताते हैं ।
कैसे भूले अतीत का वह भी एक जमाना था
कभी आते लगता हकीकतसाथ ही साथ था
थोड़ा सा साथ हमारा पर हर पल साथ था
चुपके सेयादों को दौहराते जीवन बीता था।
मेरे अतीत कहीं हो तो आज सूनेपन का सहारा बन
घिरे हैं गहन उदासी मे आ विरानी से कर मुक्त मन
कहीं दिखता नहीं अपना ढूँढता रहा अब थका तन
हर किसी ने ठुकराया हैं आसरा तेरा चाहता जीवन ।
शायद यही कर्म का अंजाम हमे मिलता हैं
लायकियत मे जिन्दगी अपने सहारा देते हैं
कब रहे कायम वफा निभाई कभी किसी से हैं
मतलब ही जीये तमाम उम्र अब तो रोना ही हैं ।
थोड़ा कहना चाहता हूँ अगर तुम सुनो
खूब विनती करता हूँ काम काजी बनो
सहृदय हो कहता हूँ हमदर्द सच्चे सुनो
सत्य केवल रहता हैं सार केवल गुनो।
बहुत हिलमिल कर रहना विवेक शून्यता ही हैं
झूठ मूठ का जीवन जीना आज की आवाज हैं
दिखावे मे कमी अंदाज जीने का आता नहीं हैं
जैसे तुम हो दुनिया से छिपाना कला जीने की हैं ।
कहां से लाये खूबसूरत दुनिया के नजारे
हर पहरे लगे हैं ताकतवर जालिम हैं घनेरे
अब बदल दो इरादे मिले मे पा लो सितारे
खुद मे खूबसूरती दरिया दिल मे हैं प्यारे।
कहो मैं तुम्हारी आवाज कैसे बनूं
मैं दंभ भरता झूठा तना हूँ तनूं
हंसी मस्ती भरी आशक्त हो सुनूं
रूदन रूलायेगा कैसे मन मानूं।
आओ थोड़ा सा आराम कर ले
थके थके कदम आश्रय धरा ले
हौसले उफनते ठंडक कुछ मिले
छाया हमारी कहीं तपन न ले ले।
पंछी उड़ान अनजान दिशा हैं
पीर हैं गहरी सागर हलचल हैं
नीर अविरल नयन विरानी हैं
पंथी विवश भ्रमित भंवरमय हैं ।
बौझिल क्षण अपना भार पूरा ही दे दो
सामर्थ्य जीवन अपना पूरा ही बीता दो
हार जीत जीवन भर कैसे सहे जता दो
परिणाम पाकर जीये कैसे समझा दो।
रे मेरे दिल करू तो क्या करू बता दो
मिले कहां हैं बिछुडे क्या बात जता दो
खिले भी न थे मुरझा गये क्यों कह दो
गिले शिकवे का वक्त क्या होगा कह दो।
भावनाओं का क्या आती जाती हैं
लालसाओ का क्या नित रहती हैं
अनहोनी का आभास क्यों नहीं हैं
हादसे हमेशा बरबाद करते क्यों हैं ।
तुम गर न आते अच्छा रहता
बेमौत हमारा दिल नहीं मरता
बेदिल जीते कैसे तजुर्बा होता
गर कहीं ऐसा वाकया होता ।
अब जब सहना ही हैं तो कुछ ओर गम दे दो
कम हैं अहसास दुनिया के गम ढेरों हमें दे दो
गम तेरा शून्य पवन सा भ्रमित जीवन ही दे दो
अचेतन जीवन जीऊं कैसे कुछ मर्म समझा दो।
हे प्राण तुम कहते रहे हम कहां समझ पाये
आसरा देते कभी अपनी भी नहीं कर पाये
मेरा काम करते थकते हुए भी कह न पाये
हे मेरे धन यकायक रूठे भूल जान न पाये।
किसे सुनाऊ कथा विरह सनी
कह जाते तो विपदा रहती बनी
उम्र भर का दर्द हैं करूणा घनी
मरण जीवन मध्य अब तनातनी।
मिलोगे न ऐसा आश्वासन देते
खिलोगे न फिर खुशबू बिखेरते
रिझाना न अपनी सामर्थ्य लेते
वियोगी हूँ चित दशा ध्यान देते।
यह जन्म मानव का पाया रहा कोरा
सहकार रहा मन का पर आधा अधूरा
हाय ढह गया सपनों का सुंदर सवेरा
महका सुगंध पल भर हैं जीवन बसेरा।
कभी इधर कभी उधर हृदय भ्रमित सा क्यों हैं
कभी हर्ष कभी विषाद मायाजाल घिरा क्यों हैं
कभी हंसना कभी रोना बदला बदली ही क्यों हैं
कभी तेरा कभी मेरा यह फिसलन घनी क्यों हैं ।
रात ओर दिन का भी अपना मकसद लगता हैं
उठना फिर बेठना बेमकसद नहीं हो सकता हैं
चलना फिर रूकना क्या स्वतः ही चलता हैं
मकसद आना जाना भिन्न कैसे हो सकता हैं ।
पाप का इजहार करूं भी कैसे
धिक्कार जीते हुए मैं सुनूंगा कैसे
हिम्मत कहां मिले सुनने की ऐसे
बाकी रहा जीवन जीने का कैसे ।
हृदय अहसास भी अब पक फोडा बना हैं
घने विकारो से हैं भरा घडा जर्जर हुआ हैं
हम संभाले कैसे क्षमता अब कहां रही हैं
फूटे बिखरे धरातल पडा विरानी घनी हैं ।
हृदय हीनता ही अब क्यों संबल जीने का बनी हैं
मानव मन भाव धारा सुखी नदी सम दिख रही हैं
कलकल ध्वनि ऊपर परत पर परत छा गयी हैं
तृप्ति दायक नीर रस मादक रसातल खो गया हैं ।

शांत सागर।


शांत सागर
आज हूँ लाचार सा कर्म का रण हैं नहीं
काज ऐसा कौन सा हो सके राह वहीं
राज दिल के मसलते नित काम है कहीं
लाज आती थी आज करता कर्म वहीं ।
हमसफर मेरा हुआ कमजोर घना संबल जो था
चेतना का नित नया हिल्लोर भरता हृदय मे था
मूक नहीं पर चिढता हैं आज जो उल्लास मय था
हे समय यह क्या परिवर्तन तू ले आया जो न था ।
एक दूजे का आसरा ढूँढे वह ठौर रही नहीं
रोक सके अरमान अपने दृढ़ता की डोर नहीं
मूक से निहारते अब कामना मन मे मिटती रही
जिन्हें सिंचा रक्त बहा वे आसरा स्नेह देते नहीं ।
वक्त का मिजाज बदला राह मन अभी बदला कहां
शक्ति का अभिमान गया पर तन भाव बदला कहां
मुक्ति काम से मिली पर तन की कसरत मिटी कहां
युक्ति का अभ्यास नहीं पर जीना हैं युक्ति से यहां ।
हर कोई भागता यहां दौड़ लग रही हौड की
डरता भी भागता हैं नहीं मन मे जीत पक्की
क्या करे दौडना बनी हैं अब लाचारी उसकी
दिखे दौडता सा अस्मिता रहे दृष्टि मे जन की।
बार बार कैसे करते जाते हम गलती पर गलती
भार पूरा होने पर भी क्यों बौझे मे नजर गडती
उठाते ही नया बौझा थरथराकर हैं देह गिरती
विवशता से फिर किसी आसरे मे नजर उठती ।
चल अकेले चल राहगीर थकना मंहगा पडेगा
कल के भरोसे गर रूक गया तो कैसे जियेगा
भले तेरा प्राण जाये वैसे भी तो जिन्दा मरेगा
गिरे फिर उठे हैं सुना हैं मान आज का करेगा।
परिवार का हाल भेद भरा स्वार्थ का जाली पिटारा
हर सदस्य बुनता जाल हैं स्नेह का दिखाता नजारा
सहारा बनेगा बुढ़ापे होते सहृदय हैं चूसता रक्त पूरा
बेजान से खा ठौकरो को करते हैं उसकी मांग पूरा ।
बूरे हम सही पर कहीं कोने मे हमदर्दी भी रखते हैं
भूले हैं आज वक्त सताये स्मृति अहसास रखते हैं
डूबे हैं कीचड़ पर गंदगी का आभास भी करते हैं
झूके हैं हर जगह फिर भी अकड का अहसास रखते हैं ।
क्या बताऊँ क्या हैं जीना समझ मे भी तो आये
समझे हुए हो उनकी नासमझी कही जा न पाये
कौन कहे समझ गया सब शेष रहा मुझे न आये
तमाम उम्र जाये पर जिन्दगी तू समझ न आये।
विवेक कितना हैं विवेकी स्वयं कुछ कहें तो जाने
कहे हुए की सत्यता का सार हमसे मिला न माने
प्रभुता की जिद्द ऐसी सत्यता जीवन कैसे जाने
हार को ही जीत कहें जीत को ही क्यों हार माने।
रात को गर काली कह दूँ क्या झगड तो नहीं पडोगे
दिन को अगर रोशन कहूँ तो दुश्मनी का दांव भरोगे
रात दिन के खेल का क्या नटी दंभी खुद तुम बनोगे
दर्शक गण खेल का सार ले तब भी ऐतराज करोगे।
मिले थे तुम लगता था खुशी का अंबार लगेगा
फूले नहीं समाते थे सारा संसार खुशबू महकेगा
सागर की लहरों सा नित जीवन उन्माद भरेगा
फूलों की लावण्यता से हमारा विपिन महकेगा।
मिलना संसार मे हमारा क्या मिसाल मिलेगी
रहना साथ साथ क्या स्नेह धारा नित बहेगी
कल की सुहावनी आशा अब फल रस चखेगी
स्मृति सुखद आकारवान बनी अमृत बरसेगी।
कहां गया वह सामिप्य का सुखद अफसाना
कहां गया वह मोह भरा आशक्ति का खजाना
कहां गया वह झूठ मूठ का तेरा रोना रूलाना
कहां गया वह रूठना तेरा ओर मेरा था मनाना।
कहीं उड न जाय नींद तुम्हारी जगाने से हमें डर था
कहीं रूसवाई से दिल कसोट न हो हमें अहसास था
कहीं तुम्हारी भावना का गीत अधूरा न रहे मैं तत्पर था
कहीं पराये मंजिल बाधा न बने मिटने को मैं बेताब था।
भर भर प्याला मधुरस मादक विस्मृत मदहोश हुआ
कर कर जीवन कर्म घनेरे आनंदित सारा जग हुआ
फिर फिर रसताल डूब डूबके स्नेह धार मे लीन हुआ
रस मोती बिनते पल पल साथी तेरे मेरे का भान हुआ ।
ईश लीला का वरदान मेरे जीवन
क्या तूझे अपना मान सकता मन
मर्म तुझे ढूँढता फिर हैं अकेलापन
विरह जलजात उभरा हैं सूनापन।
नेह तार लगता टूट गये हैं
संगीत जीवन सूने पड़े हैं
राग अब विराग हो गये हैं
चित निर्मम भाव छा गये हैं।
परिवर्तन का यह दौर कैसा
बेसमझे विवेकी चित जैसा
विराग का यह भाव कैसा
रागी घीरा भ्रम जाल जैसा।
कारण कमनीय क्यों दौडता रे मन
आवरण मोह आतुर क्यों रे जीवन
नहीं पाया रे तूने मारक मन भावन
फिर क्यों दौडा लालच राह जीवन ।
जाना कौन सार लीला भ्रम संसार का
जाना वहीं जो कहता निस्सार जग का
निस्सार कहना क्या सार हैं जीवन का
भटकाव घना घनघोर बना हैं मानव का।
हे जीवन रे प्यारे प्यार से कुछ कह दो
मीठी मीठी सी बात हो कुछ तो कह दो
जीये हो खूबी से कुछ सार हो तो कह दो
रस सागर की तुच्छ हिल्लोर हो तो दे दो।
सूनेपन मे कुछ रस तो घोलो
अविरल नीरधार का मन खोलो
बिखर पडेगा नेह दरिया बोलो
गहरी घनी वेदना चित की तोलो।
पाकर भी खाली खाली हूँ
खोकर भी खाली खाली हूँ
सोकर भी सोया नहीं हूँ
जागा भी जागा कहां हूँ ।
यहाँ कुछ हैं यह आभास क्यों हैं
मोह हैं नहीं पर अटकाव क्यों हैं
लगता ऐसा कहीं कुछ बाकी हैं
चेतना का ऐसा भटकाव क्यों हैं ।
जहां जीवन भार बना हैं
कहां रही शांत हवा हैं
धूंध छायी जिन्दगी हैं
यहां कहां सार तत्व हैं ।
किसे कहें अपना नहीं भावना रही नहीं
हमें बात बहुत करनी हैं सुनने वाला नहीं
जाकर कहें किसे खुद मेरा ठिकाना नहीं







आहत,,,


नहीं यहाँ हैं धोखा भारी दुखी हृदय बचना चाहे
ख्याली चित हारा माया से कपटी रूप नही मौहे।
आपदा नयी संघर्ष नया जूझते रहना जीवन हैं
कामना आती भाव उमडते बहता घना निर्झर हैं
काम नहीं आती बहती धारा नाव उपाय तरना हैं
समझ अकेली सक्षम हैं तो आपदा रास्ते देती हैं ।
जिन्दगी उदासियों का घरौदा बन रह गयी हैं
घनी पीड़ा साम्राज्य दिल मे जमाये जा रही हैं
हर्ष कतरा कहां हैं खोज जीवन भार हो गयी हैं
अचूक काल अपना विस्तार करता जा रहा हैं ।
कौन हैं समर्थ विषम गुम्फन से छुटकारा देते
लोग हैं मुझे बेहाल देखें पास से भी दूर जाते
बोल भी संवेदना के अपनों सेभी नहीं मिलते
तौल नेह तू प्रेमियों का सुख से गले मिलते ।
वितृष्णा हो गयी हैं कहानी कहीं नहीं जाती
हृदय रस रहा नहीं अब सुंदरता नहीं भाती
कुरूपता डराती रूप भयंकर बनाती जाती
जिन्दगी ठगनी बनी असली शक्ल बता जाती।
हाय रे इस उपहार का अंजाम आँखों आ गया
मोहित रस मन का भाव क्यों रहा समझा गया
कर्म कारण अर्थ संग्रह जाल नये घिरता गया
आज मिले अफसोस होता दर्द लिपटे उम्र जीया।
मस्ती भरे मदहोश अतीत अब कहां हैं तू कैसा था
जबरदस्त नशीले यौवनकाल उन्माद तेरा कैसा था
स्नेहिल मीठे रसभरे स्वरों कहां खोये तुम्हें सुना था
इठलाई सी कमनीय चितवन मैं घायल हुआ तुम्हीं से था।
यादों के तार सूक्ष्म अमूर्त रहते कहां नहीं जान पाता
मिल पाते अगर तो हृदय कुछ विनय याचना करता
दर्द दरिया द्रवित हुआ बहे दारूण हृदय जरूर होता
मोह अंधकार मिटता शास्वत सत्य का दीदार होता।
फफक उठा उफान पाकर मेरा विरान जीवन
ललक लंबित जिन्दगी की हो उठ हैं उत्पन्न
बहकने लगी स्वर धार मे खुशियों की कंपन
धडकने बेताल फिर भी गा रही हैं गीत मोहन।
बात कहते हो मैं सुनूं कैसे राग सुन पाता नहीं
घात प्रतिघात सहते मैं हो गया सुनसान नहीं
रात काली हैं आँख का उजास काम आता नहीं
मात खायी जिन्दगी हैं प्रभात का सा जौश नहीं ।
आ गये हो तुम अचानक घनी वेदना केगेह मे
जा नहीं पाओगे तुम अब सुख डूबे संसार मे
आते ही घेर लेता घना जाल होता कालिमा मे
भाते रहे तुम वेदना को तभी बुलायापास मे।
बहुत बार निष्ठा भाव सफलता का संघर्ष लडा हूँ
अनिष्ठा की भीड़ से धक्के खाया उठ नहीं पाता हूँ
जैसे ही उठने को होता कड़ी ठौकर पाया गिरता हूँ
लगता हैं उठे वहीं हैं जिनकी ठोकर से मैं गिरा हूँ ।
अब तुम बस भी करो ओर कितना कहोगे
कहते रहोगे तुम तब भी क्या कोरे रहोगे
सुनते होते तो शायद कुछ बडो का मानोंगे
यदि हृदय बदलते आज मे कुछ बन जाओगे ।
आहत हुए दिल मे उल्लास मुश्किल हैं
घायल देह लिए संघर्ष काम मुश्किल हैं
उपचार करे ऐसा उपचारक मुश्किल हैं
अंत आहत मन का जीवन मुश्किल हैं ।
दाता देता उसे ही जो खाली होता हैं
भरा वहीं हैं जो कदम नहीं चलता हैं
न सुने न कहे इशारों से ही जीता हैं
तोल तू ही क्या तुझमे खालीपन हैं ।
हम कब कहते हैं कि तुम काबिल नहीं हो
तुम ही खुद की काबलियत के गुण गाते हो
वैसे गुण सुने नहीं कभी कैसे काबिल हो
आप से ज्यादा कोई नहीं जो काबिल हो।
रास्ते टेढे मेढे ही सही कदम बढाने होगे
धरातल बोध ही चाल को गति देते रहेंगे
जानते हो क्या होता हैं अनचाहे गर बढोगे
मंजिल तो मुश्किल हैं बेमौत ही राह मरोगे।
कठिन होता हैं जीने लायक होना
गुलशर्रे उड़ा कर पराये पर जीना
आसान होगा बेशर्मी को अपनाना
मुश्किल किसी से हालात बताना ।

आहत क्षण ।


आहत क्षण
जीवन हैं तेरा यह कैसा रूप
होता तनिक नहीं मन अनुरूप
सोचा करते आनंद स्वरूप
हो जाता अति विषम कुरूप।
क्या यही जीवन स्वीकारू तुझे निस्संदेह
या कि हैं कोई तेरा अन्य फल भी सुखदेह
संचय अभी गया नहीं पर थक चुकी देह
प्राण अभी तक रीते रहे सुना पड़ा तन गेह।
कहूँ अति मनमोहक भी
रहूँ चित रंग विस्मृत भी
बनूँ नित नव मादक भी
चाहूँ गगन सम गरिमा भी।
रहूँ विमल  सहृदय भी
चलूँ पावन निर्लिप्त भी
डरूँ पापमय पथ से भी
करूँ पुण्यमय कर्म भी ।
भावना केवल भाव ही न रहे
निष्क्रियता जीवन भार न रहे
कामना कर्ममय धरातल बहे
परहित समर्पित जीवन रहे।
प्राण तार टूटा टुकड़े हैं तडप भारी
घिर चुके प्रचंड दर्द अनुताप जारी
राह मिले कहां जीना कैसे भंवर भारी
करवट लें कैसे हैं कसा शिकंजा भारी।
हाल है हताश हुए हारा हृदय हैं हिम्मत होगी कहां से
मेरे निकट हैं शौर शराबा पर चित छा गया सन्नाटे से
पास हैं भीड़ भारी निर्ममता से रौदती अरमान दिल से
चेतना थक चुकी हैं मूंदती आँखें मोहित होती प्राण से।
चाह अब केवल सिमट कर आस्थामय हो गयी हैं
जग प्रलोभन तुच्छ होकर आँख ओझल हो गये हैं
कामना का राज शास्वत चमक से मंथरा गया हैं
सुंदर सलौने साज सारे झूठे भ्रामक हो गये हैं ।
नहीं हैं हमदर्द कोई संताप बांटे सुख मिले
गहरा अंधकार कैसे हृदय ज्यौत्सना खिले
आसरा अब देह मांगे बेसहारा हूँ मृत्यु मिले
अपने कहूँ किसे सब अपने ही बेवफा मिले ।
जाऊँ कहां कोई कहें जहाँ जीवन राग पाऊँ
लाऊँ कहां से मांग कर किरण उजाला पाऊँ
उठाऊँ कैसे बौझ सारा भार दबता ही जाऊँ
हादसा जीवन बना हैं सुरक्षा कहां से लाऊँ।
पीर उमडती प्रेम की निर्मल छांव भी होती हैं क्या
नीर डूबे देह मे भी प्राण रहता कुछ आस हैं क्या
चीर छाती देखता रहा हूँ तृप्ति का अहसास हैं क्या
गीर कीचड़ दागित देह ले ढूँढता देह बेदाग हैं क्या ।
रास्ते सारे लगते बेढंगे राहगीर राह चलेगा कैसे
डालते हैं जाल मायावी फसता मुसाफिर फिर से
ओर होकर संग मे नित जाम चखता मादकता से
जर्जर छोड़ती माया जब चीखता हैं रूदन लय से ।
हाहाकार क्रंदन रूदन संसार यही पहचान तेरी
झूठ मूठ की लावण्यता तेरी जो चित लुभाये बेरी
आँख मूंदे सपने सी तृष्णा घेरे जीवन माया नगरी
बार बार फसता जी जान से मिटी नहीं जड़ता मेरी ।
सपने बनाते अपने अगर नींद होती गहरी
करते रहते कर्म भी अगर दर्द ना होते प्रहरी
लडते बनते लायक भी रहती शक्ति ठहरी
मर्म भी कहते अगर सुन लेती दुनिया बहरी।
आज का पल कल का ताना बाना बुनता हैं कहते हैं
पल पकड़ ले गया वक्त वापस नही आता हैं कहते हैं
सच्चा बन सच्चाई की हमेशा जीत होती हैं कहते हैं
सुना किया पर वक्त से दगा मिला क्या झूठ कहते हैं ।
शायद कथन ना हो झूठ हम ही झूठे हो
शायद लायक ना हो हम कर्म ढीले हो
लगता हैं मालिक समर्थ को ही देता हो
शायद माफिक वक्त के हम ना रहे हो ।
घृणा से गुजरा जीवन शब्दों तक पहुँचा तो हैं
जग के अस्पृश्यता भाव ने रूख पलटा तो हैं
इस मजदूरी क़ौम का संघर्ष कुछ पाया तो हैं
प्रजातंत्र हांफते ही सही अंजाम लाया तो  हैं ।
अति झेला बाल काल बित गया पर बात गयी नहीं
दिखता हैं हाल सुधर गया पर बेहालपन गया नहीं
बेकार को काज मिल गया पर नज़र भेद गया नहीं
राजकाज पर आवरण हैं सही आज मनु दृष्टि रही ।
काम किया काम किया कहते कहते थक गया
पर किया काम क्या परिणाम करूं क्या बंया
हाल बुरा इस जीवन का उपलब्धि नकार गया
शून्य का सार संभाला उम्र भर संचय मे जीया।
ऐसे ही जीया जाता हैं प्रबुद्धों का कहना हैं
जीऐ अलग हैं विवेकी जगत मर्म जाना हैं
बाकी जग ऊहापोही अंधा बना ही जीता हैं
पाना खोना छोड़ कर्म ले लक्ष्य ही जीना हैं ।
हाय छोड़ा घर बार परिवार ही के वास्ते
लायें कैसे खुशियाँ काम रात दिन करते
शौक मौज सारे छोड़ दिये धन मोह रखते
बैल से जूते हैं पारिवारिक खुशी के वास्ते।
कुछ कहें कहें कैसे
कुछ भूलें भूलें कैसे
कुछ पाये मिले कैसे
कुछ हारे जीते कैसे।
राग गाया जाय पर कोई गीत तो हो
हम जाग जाय पर जरा नींद तो हो
हम मन लगाये पर कहीं नेह तो हो
दर्द झेले पर कहीं सुख आशा तो हो।
जैसे ही हम आये हैं पवन सा वेग लिये
वैसे ही हम जायेंगे पवन का संग किये
कैसे अभी अकडे हैं अहंकार भार लिये
वैसे ही हम अकडेंगे प्राण देह त्यागे हुये।
हताशा मे कोई हमसफर जो आता
हमें फिर से इतना न सताया जाता
आसरे हमारा हौसला बढ़ता जाता
अपनों का जख्म शूल सा ना चूभता।
दे देते सारा का सारा बाकी दर्द कब दोगे
ले लेते आज तो हम बेभान दिल रख लेंगे
कल का आज कहें कैसे पता क्या जी लेंगे
फिर शक यह भी मिले दर्द से ही रोते रहेंगे।
पंछी गगन विस्तृत असीम हैं उभरा कहीं मधुर स्वर
बंशी स्वर असीम मादक हैं उम्र बिता दी हैं सुनने पर
रंगी हैं मेरी ससीम देह असीम मन अधूरा रहे निरंतर
भंगिमाऐ वक्र श्याम नजरें टिकाऊं ठहरे न तुझ पर।
स्थायी भाव इस हृदय का मंजुल मधुरता चाहे
क्या संसार रखता हैं यह निश्छलता रूप मौहे