Thursday, May 19, 2016

आते,,,


सुना तुमने कल फोन आया था
बुलावा घर से बीमारी संदेश था
तुम्हारी कमर पेर का दर्द ठीक था
जाओ नहीं तो लुटेगा फिर चैन था।
बारह बजे रात क्या अभी नींद आई नहीं
रात भर जागते बीमारी क्या आयेगी नहीं
क्यों सोचते इतना पढ़ें  मनन समझे नहीं
संसार रीत यही फिर जमाना अपना नहीं ।
आप क्यों बस हठ करके बैठे हो
दुनिया क्या कहेगी कुछ सोचते हो
गाली ही तो खाई हैं फिर भी तने हो
मार खाते बेटों से दिल समझाते हो।
खूब कमाते हैं किसी से क्यों हौड करते हो
मियाँ बीबी दोनों पढ़ें लिखे क्या समझते हो
हैं पुराना गाते किसे भाता कुछ जानते हो
बेटों के ठाट बाट से डरते इसी से जलते हो।
घर तो घर हैं पर इस अकड का क्या करें
आँफिस सब समझे हमें घर का क्या करें
रूतबा कैसे त्याग दे दुनिया कुछ भी करें
संघर्ष हमने किया दबे बड़े हमें नमन करें ।
रिटायर होते ही खुद नकारा समझ कैसे बोले काम का
काम करना आया नहीं जो कहते खूब बौझ हैं काम का
अब काम बिना कहते नित आराम मिला हैं पर नाम का
घर बाहर हैं खूब काम बढ़ा वक्त कहां मिले आराम का।
नींद आती होगी पर थोड़ा सहयोग करो
बच्चों के कल की परीक्षा का ख्याल करो
निर्मम कोमल बच्चों पर भार बहुत रहम करो
सिखाया सिखाने मे तुम क्यों इतना दंभ करो।
जब जब आते हो दर्द नया दे जाते हो
अब तो जिम्मेदार हो कुछ तो बोझ हो
कब तक ताकते रहोगे कुछ तेरा तो हो
नादानी का रोना छोड़ काम धंधा तो हो।
झंझावत झेल मजबूती का आभास क्यों ना हो
अनायास कुछ अहसास अस्तित्व क्यों ना हो
गिरते उठते कला जीना सिखे आगे क्यों ना हो
ओरो को हंसना सिखा कर दिल खुश क्यों ना हो ।
गर हमें इतना दर्द नहीं मिलता
तो तुम्हें अकेले रहना कब आता
पाते कैसे संघर्ष से अपना नाता
तुम्हारे आसरे का जीना ना भाता।
चाल की चौट जख्म गहरा देती हैं
उधार की हंसी कडवहाट देती हैं
भीतर मरे को मौत अपनत्व देती हैं
रिश्ते छल के अस्तित्व मिटा देते हैं ।
जुबान आते कभी सत्य अनकहे रखे हैं
भावना प्रबल होकर असत्य बोलती हैं
वे पल झूठे ही सही पर एक अर्थ देते हैं
असत्य मार्मिक भाव सत्य से बेहतर हैं ।
जीवन होता क्या पाप पुण्य का संग्रह मात्र हैं
खोज करते सत्य आस पास क्या रहता हैं
मन कर्म आकलन करते पक्ष अपना पाता हैं
भाव गूंथा सत्य नूतन तर्क से विजय पाता हैं ।
कभी कभार न चाहते भी कहता हूँ
शायद बड्डपन का बोझ ढोता हूँ
फिर मैं पछताता अपने से पूछता हूँ
तभी सलीके से जीने का सोचता हूँ ।
इधर तुम हो उधर परंपराएँ हैं
किधर रूख करे जग देखता हैं
हिचके आँख मूँदें तेरी बढते हैं
चुपके से मर्यादा तोडते रहते हैं ।
पलते सपने कठोर धरातल से रूबरू हैं
चुभते कंकर राह कठिनता का अहसास हैं
घनी राहों का जाल भंवर बना रूकावट हैं
संगी साथी अब जीवन लूटेरे भयानक हैं ।
सवेरे से ताकिद गांव जाने की हैं
डीजल के रूपये बैंक से लेने हैं
ए टी एम पुत्र को भेजना जरूरी हैं
बैंक बैंलेंच कम होने से परेशानी हैं ।
आँसू तुम कितने बेवफा अनायास क्यों आते हो
मधुर रसमय जीवन मे अब तूफान नया लाते हो
वेदना इतनी विरल होकर मार्ग फिर से आती हो
अनजाने दर्द भीगी शुष्क चिततल बीछ जाती हो।
किनारा कहां सागर विस्तार घना भ्रमित होता हूँ
वेदना तेरा राज हैं ऐसा भंवर जाल फंस जाता हूँ
कामना करूं सुख सागर की दुख घने घिरता हूँ
पाकर सुख नित खोता रहूँ क्या तृप्ति नहीं पाता हूँ ।
कितनी चाह से पाला सुख कृश काया में पायेंगे
उतनी ज्वाला देकर क्या अंत काल संतप्त करेंगे
दृश्य इन आँखों ने देखा तो विश्वास संतान करेंगे
प्रभु यही चित दिया तूने ममता का फिर क्या करेंगे ।
मद मार मदिरा मादक मन मोहित तेरा साम्राज्य हैं
एक दफे शोक मोज में मदहोश जान पान किया हैं
हृदय हारा मदहोशी तेरी तू ही मेरी जिन्दगी हुई हैं
बाकी सारा फीका कडवा अनमोल रसधार तू ही हैं ।
जब आनंद मादक मिले फिर संग साथ मिले
विवेकीजन मंद सभी मदिरा पिये नित खिले
फिर आदत खरी जिये कैसे बिन मदिरा मिले
कमाई गयी उधार लिया चोरी से प्याला मिले ।
घरवाली के गहने बिके घर से पूरा सामान बिके
जो था सो कुछ बिक गया रहे अब कैसे फीके
माँ का संग्रह पैसा फूंका रहे भरोसे भाई जी के
भाई दे दे तंग हुए तब गाली देते जी जी भर के।
गाली खाते कब तक सहते हम दौडे कहीं ओर रहने
बड़ी कमाई का हिस्सा डाला तब मेरे मकान थे बने
बेघर हुए बैंक कर्जा लेकर नोकरी थी वहीं घर बने
अब पी सके वे भाई साथ उनके रहे घूमते राक्षस बने।
रोज ही गाली देते माँ को नित आँसू माँ के बहते हैं
साथ लाता रहती पर गाँव घर याद कर उदासी हैं
हार कर आखिर गाँव भेजू पर मन मे चिंता खाती हैं
चक्कर लगाता गाँव हो आता दिल रहता भारी हैं ।
कल गया था मिलने माँ से फफक फफक कर रोई हैं
हृदय लगाकर रोया मैं भी कैसी मन विपदा छाई हैं
क्या हो सकता क्या करूं मैं भाई कसाई सम हुए हैं
संसार दिखाया जिस माँ ने अब मिटाने को तत्पर हैं ।
माता तेरा वंदन करूं किस तन
तन भी तेरा दिया पाया जीवन