Tuesday, May 10, 2016

मेरा अस्तित्व ।

अच्छा महसुस करता
दिनभर की थकान बाद
तनिक सोता
अंग तनाव हो जाता ढीला
समानांतर जमीन
होते ही
अहंकार का सिर स्पर्श करता
धरातल
दिनभर की ऐंठ से मुक्त हुआ मैं पन
धराशायी होते ही छूट जाता
मुझसे
निर्लिप्त तनाव मुक्त ओर हल्का सा
मेरा अस्तित्व
भाता मुझे
पृथ्वी की ऊर्जा से ओतप्रोत
नवजीवन लेकर
प्रातःकाल सूर्य की रश्मियों संग
उठता
ओर फिर महसूस करने लगता
मेरा अहंकार मेरा नीजपन
ओर यह बिल्कुल अलग व्यक्तित्व
रात के शयन काल अस्तित्व से
अहसास करता
धरातल की तरह नमनीय अस्तित्व
अधिक करीब स्वभाव
ओर तभी
प्रकृति प्रदत्त करती अपनी ऊर्जा
पर उठते व्यक्तित्व संग
केवल व्यक्ति ही नही
उठने लगता संग अहंकार भी
यही वजह
बहुत कम रह पाते स्वाभाविक
अधिकांश हम जीने लगते
अहंकारी बनावट
ओर होने लगते धीरे धीरे
मानव स्वभाव से बहुत दूर
कि नही पाट सकते हम
मृत्यु तक यह फासला ।
छगन लाल गर्ग ।