चाहो तो मुझे साथ अपना दे दो
चाहो तो मुझे खुद से जुदाई दे दो
चाहे न चाहे दुनिया बीच फैंक दो
चाहो तो जीवन आधार कुछ दे दो।
सहे कितना दर्द ओर कुछ हद तो हो
भरे दुख कितने चित पात्र खाली तो हो
करें कितना कर्म कुछ परिणाम तो हो
जीये अब कितना कोई अपना तो हो ।
खाली खाली घर हैं मेरा
भारी भारी दिल हैं मेरा
बारी बारी पीड़ा हैं घेरा
काली काली रैन का डेरा।
जब तक समझ आती आप चल दिये
मन असमझ मे डाल अब कैसे जीये
हम अकारण मेहनत करते थक गये
गुत्थी जीवन की किससे सुलझाये।
मन नादान कहता फिर मिलेंगे
जुड़े कैसे दूरी असीम मिटेंगे
फिर हुआ कब बिछुडे जियेंगे
तन छूटे काल के फासले रहेंगे ।
छाया अब ठंडक देती नहीं
काया अब चेतन रहती नहीं
माया अब मन लुभाती नहीं
पाया अब स्थिर लगता नहीं ।
तार हृदय तरंगित कर सके तो जानू
वेदना चित राग फिर से ऊठे तो मानू
घाव का फैलाव रस राग दे तो जानू
लहरों का सागर हृदय घेरे तो मानू।
देकर व्यथा भार कुशल पूछते क्यों हो
पीकर घूँट कडवा मीठास चाहते क्यों हो
लेकर चैन मेरा सुख गर्व इठलाते क्यों हो
जीकर दर्द अपना मिटे तो सताते क्यों हो।
नहीं कहते हमे सहारा दो
फिर सहे कुछ करुणा दो
नहीं रखते आस सुविधा दो
फिर क्यों छिनते हमारा दो।
शायद जग मे यह होता होगा
थोड़ा तो भी छीना जाता होगा
काबिलों का हक ज्यादा होगा
निर्धनों की तकदीर रोना होगा ।