भाई हद हो गई
मुक्तक रचते रचते
बन चुके साक्षी
अकर्ता भाव से ओतप्रोत
नजर नही आता शब्द भी भाव भी
चाहते क्या हो साक्षी बने
अब हो तो सही
जीन्दे बोलते लिखते करते धरते
घनी आबादी के चहेते
कुछ कहो उनका भी
देखते टुकुर टुकुर तुम्हारी ओर
छोडो भी मुक्ति का नशा
करो ना थोडी बात
बंधको की
जो श्वास भरने निमित्त
चापलूसी करने को मजबूर हो रहे
हमारी तुम्हारी
समय रहते दृष्टि डाल सको तो ठीक
अन्यथा समय बेहद क्रूर करवट ना ले ले
ओर हमारी लेखनी का कोई
हमदर्द ना मिले
छगनलाल गर्ग ।
मुक्तक रचते रचते
बन चुके साक्षी
अकर्ता भाव से ओतप्रोत
नजर नही आता शब्द भी भाव भी
चाहते क्या हो साक्षी बने
अब हो तो सही
जीन्दे बोलते लिखते करते धरते
घनी आबादी के चहेते
कुछ कहो उनका भी
देखते टुकुर टुकुर तुम्हारी ओर
छोडो भी मुक्ति का नशा
करो ना थोडी बात
बंधको की
जो श्वास भरने निमित्त
चापलूसी करने को मजबूर हो रहे
हमारी तुम्हारी
समय रहते दृष्टि डाल सको तो ठीक
अन्यथा समय बेहद क्रूर करवट ना ले ले
ओर हमारी लेखनी का कोई
हमदर्द ना मिले
छगनलाल गर्ग ।
one plus one