Friday, May 6, 2016

बेबशी मेरी।


आह बेबश हुआ
यह कहने कि
संभलते रहना होगा
यदि चाहें मैं जीना
इसी लालच जीने की
मूढ बन जाता हूँ मैं बार बार
कि ना रहे संवेदना
युग का यथार्थ साक्षेप धरातल
केवल स्वार्थ धारणा
यह जानते भी
विपरीत इसके अब
ऐसा कहना चाहूँ पर
सुने कौन
नहीं जीता स्वार्थ
बस हो गया जीना
खूब जिया
बस अब रहने दो
भर गया पूरा जीकर
बिना आत्मा के
सिर्फ जीता रहा देहिक
छाया बनकर
जीने की इस दुर्गति में
नहीं बचा पाया आत्मा मेरी
घिरा हुआ हूँ
बिना आत्माओं की देहिक
छायाओं बीच
बिलखती घूँटती सतंप्त रही
आत्मा कुछ दिन
घने उपवास काल
जी नहीं सकी देह साथ
नहीं रही अब साथ देह
मुक्त हुआ आत्मा जब से
अच्छा जी लेता
घना वैभव मोहक तृष्णा भंवर बीच
अच्छा लगता
चक्रवात सा घूमना
भावनाओं की असलियत
घीरे पाता हूँ कामना उन्माद संग
मत कह देना कोई मुझे
अब आत्मीय
यह शब्द असभ्यता को करता साबित
ओर फिर कहीं गहरे
तडप उठता हूँ मैं
बड़ी बेचैन करती मुझे
अडचन रोकती हैं श्वास मेरी
कैसे जी पाऊँगा
अआत्मीय स्वजनो बीच
जीना चाहता मैं
जीवन का अंतिम किनारा
रहने दो मेरे
जिजिवीषा का मानवीय हक ।
छगन लाल गर्ग ।