संभले कैसे मर्मज्ञ साथी नहीं हैं
जग सभी माया लोभी पथ वहीं हैं
सरल मनीष निर्मल जीवन नहीं हैं
घना खार राग तृष्णा मात्र यही हैं ।
दागदार दिल दहक रहा हैं
जलजला अभी चल रहा हैं
गला नहीं रहा शिलाखंड हैं
अकड ऐंठ जल ठूठ पड़ा हैं ।
झूठ अहं छूटे तो नमना आये
नमन खिले तो झुकना आये
झुकते ही सरलता धन पाये
सरल मन सत के दर्शन पाये।
शातिर करणी छोड़ लोभ अब
खातिर प्रेम रहनी सीख अब
छीतर जाये दुख तेरे आते रब
भीतर देख वहीं सतबल अब।
ढूँढ रहा भटका पूरी ताकत
लूटा पूरी उम्र बूरो की सौबत
पार न पाया मोह बंध सौगात
बिना समझ भूला जीवन लागत।
चेत फिर से जागा तू अगर
ले भीतर सम भाव गागर
दे रस चेतना गहन सागर
ले सके जन जीवन नागर।
प्राण अकेले ही रहेंगे दुख दर्द तेरे ही रहेंगे
उम्र भर संकट रहेंगे नीर नेह बहते रहेंगे ।
क्यों करें शिकवा किसी से
वे भी पीडित बूझे इसी से
सुन तो लेंगे पर अनमने से
दर्द बढ़े निकले न दिल से ।
कायर दर्द तो पीना ही पड़ेगा
कडवा घूँट गटकना ही पड़ेगा
मनवा मारे जी कर जब पायेगा
सार रष जीवन तभी तू पायेगा।
चल चले अब कुदरती करनी
तेरे मेरे अब हाथ नहीं करनी
हाय हमारे सुख सभी हरनी
भार छोड कुछ भी नही करनी।
करता करता काम जीवन हारा
भरता रहा कामना रीता सारा
आज समझा अपनों का मारा
मिटता जीवन तन का हूँ हारा।
रूका ठहरा विवश हो चुका हूँ
पूरा झूका अकड भूला चुका हूँ
पैनापन अहंकार खो चुका हूँ
गीला मन राग भूल चुका हूँ ।
देखा जग देख सकता था जितना
लेखा लेता मन पा सका हूँ कितना
अंक फिसलते पकडता हूँ जितना
योग जोड देखा सीपर फल बना।
फिर क्या पाने दोड लगाई दम फूला छाती भर आई
थोथा चना बन दम लगाई घनी इच्छा कुछ कर न पाई।
सुख ढूँढा धन पद पाया रूखा सुखा खा माया जोड़ी
बाल बच्चों को पाठ सिखाया मन हैं भारी राह नहीं थोडी।
झूठ लुटाया पाया धोखा लट बनाया आखिर मोखा
पा ना सका काबिल चौखा चूक गया हैं असली मौखा।
दिग्भ्रांत भटकन भार बनी हैं
कोई तेरा नहीं हैं सार मिला हैं
सब अपनी गरज सहारा हुए हैं
बेसहारा हैं जीवन समझ यही हैं ।
यहाँ कौन तेरा हैं मुसाफिर
जिसे खोजता नहीं हाजिर
लिए आस फिरता निरंतर
कहीं छांव तेरी नहीं मुसाफिर।
संसार छाया देता नहीं हैं
भंडार सुख भरता नहीं हैं
अंबार सपने टटकते रहे हैं
संसार रिश्ते सटकते रहे हैं ।
रस्ते चलते चलने नहीं देगा
हंसते देखा हंसने नहीं देगा
दौडे कभी कीचड़ डाल देगा
रोता हूँ मेरे हाल छोड़ देगा ।
करूं क्या उलझन गहरी हैं
घिरा भंवर मे रोशनी नहीं हैं
आज कोई मेरा सहारा नहीं हैं
जीना क्यों अब मतलब नहीं हैं ।
हार पाई अपनों से परायों से नही
जीना हुआ दुर्भर अपने सभी सही
बहुत कोशिश रह जाती अपने ही
अधममरी जिन्दगी देते सारांश ही।
पगले संभाल नहीं पाया
फटा तेरा मन टूटी माया
देख जग हंसता रे छाया
जाऊं कैसे शिथिल काया ।
दीप तेरा ही हूँ जलते रहता हूँ
नीरव रहने दे लौ मिलाता हूँ ।
हवा मे भटकाव हैं लौ को हिला देती हैं
थिरकना एक बंध हैं लौ से फासला लेती हैं।
राग सारे खो रहे हैं फासले शून्य हुए हैं
मिटना असीम बना हैं ससीम अर्थ खोता हैं।
नहीं इतना काल हैं तेरा जितना तू जंजाल फसा हैं
नहीं इतना सार हैं माया जितना तू आकंठ डूबा हैं ।
कहते कहते कितने कह गये
सुनते सुनते कितने सुन गये
लिखते लिखते कवि चले गये
समझा देखा अनदेखा कर गये।
हार कब स्वीकार होती मार खाकर शर्म रोती
उठ ऐंठ घमासान होती दबी दूम भी शान पाती।
लफडा मोल लेता नहीं थकता
सोच का कब समय मिलता
भागता भाग्य दुर्भाग्य पाता
थका ठगा अंत तू शून्य पाता।
लाज जग की अब रही नहीं हैं
मान अपमान का विवेक नहीं हैं
भले बूरे का बस भान नहीं हैं
अहंकार धन का भंडार घना हैं ।
हर हाल परसुख हडपने हाजिर हूँ
हसरते हसीन होती बहुत हैरान हूँ
कैसा भी हो नहीं मेरा उसे बनाता हूँ
झंडे नीचे जवान हसरते बसाता हूँ ।
अंजाम जो भी होगा देख लूंगा
आज शमां हैं नहा रोशनी लूंगा
ओर कूचले मरे रंग जमा लूंगा
संचित सूखों का ढेर लगा दूंगा ।
आज मानव छल बल चल रहा हैं
लाज शर्म संस्कार भूले जा रहा हैं
सीमा मानवता त्यागता जा रहा हैं
असलियत मे दानव बनता जाता हैं ।
भार से आम जन दब गया हैं
दानव संस्कृति से डर गया हैं
कसमसाता जीवन रह गया हैं
मौत चाहे वश नहीं रह गया हैं ।
क्या करे क्या न करे बताये कौन
जीये किस तरह ये सिखाये कौन
बढता अंधेरा घना रोशनी दे कौन
खुश रहने का उपाय बताये कौन ।
अरमान कभी हकीकत बनते नहीं
दिल अबोधता से उबर पाता नहीं
काम मे तोडा तन हक मिला नही
शौषण नित चला पूरा पाया नहीं ।
हे हताश रे मन अब तो कुछ बोल
निराशा मे अब कुछ आशा घोल
बच्चे पालूं कैसे कुछ धन्धा खोल
रे बेसहारा ही जीवन मरेगा बोल।