नही करना अभ्यास
जीवन जीने का
चलने दो मर्जी उसकी
खूब देखा
कि चले अपनी मर्जी जीवन
नही हुआ
हर बार धोखा मे रहा
वही हो जाता जो नही चाहा कभी
बडा अजीब सूत्र जीवन का
स्वाभाविक रहता
नही करना होता अर्जित ज्ञान
कि चले परिमार्जन पश्चात
ओर अगर होता भी ऐसा तो
मात्र आत्म प्रवंचना
सत्य से विमुख केवल शिष्टाचार
जिसमे नही जीवंत प्राण स्पंदन
नही ईश्वरीय चेतन समाया भीतर
उसे होने दो सक्रिय
यह स्वाभाविक प्रवृत्तिगत
नही कोई मिश्रण कृत्रिम
ओर यह आचरण बहुत नजदीक
शास्वत सत्य परम तत्व से
रहने दो मुझे स्वाभाविक ।
छगन लाल गर्ग ।
जीवन जीने का
चलने दो मर्जी उसकी
खूब देखा
कि चले अपनी मर्जी जीवन
नही हुआ
हर बार धोखा मे रहा
वही हो जाता जो नही चाहा कभी
बडा अजीब सूत्र जीवन का
स्वाभाविक रहता
नही करना होता अर्जित ज्ञान
कि चले परिमार्जन पश्चात
ओर अगर होता भी ऐसा तो
मात्र आत्म प्रवंचना
सत्य से विमुख केवल शिष्टाचार
जिसमे नही जीवंत प्राण स्पंदन
नही ईश्वरीय चेतन समाया भीतर
उसे होने दो सक्रिय
यह स्वाभाविक प्रवृत्तिगत
नही कोई मिश्रण कृत्रिम
ओर यह आचरण बहुत नजदीक
शास्वत सत्य परम तत्व से
रहने दो मुझे स्वाभाविक ।
छगन लाल गर्ग ।