नही होता
आत्म संतोष जटिलता बीच
नया आकार देने में
व्यक्तित्व अपनी सामर्थ्य का
तोलता रहता हिसाब
तुलनात्मक क्षमता
ओर से पाता बेहतर
ओर भीतर की ऊर्जा का घनत्व
भरता हूँकार पात्रता की
नही जानता युग का सत्य
बेखबर रहती बनावट से नही कर पाया
अपनत्व का संसर्ग
ओर यही सभ्य पात्रता
अभाव बनी जीवन मे
आत्म संतोष
नही हुआ जटिल इतना कि
न पहचान सकू स्व को
ओरों की तरह
सरल हैं यह जीवन
बहुत नमनीय द्रव्य की तरह
मौत सा जड जटिल
अहंकार शिला से मत ढको तन मन
कि तुम दिखते रहो
विशालकाय पर्वत
ओर असलियत मानव की
तौडती रहे दम
कि सजीव भी हो जाओ
निर्जीव बनकर
सूनेपन को छोडो तो
चेतन जीना भी हो ।
छगनलाल गर्ग ।
आत्म संतोष जटिलता बीच
नया आकार देने में
व्यक्तित्व अपनी सामर्थ्य का
तोलता रहता हिसाब
तुलनात्मक क्षमता
ओर से पाता बेहतर
ओर भीतर की ऊर्जा का घनत्व
भरता हूँकार पात्रता की
नही जानता युग का सत्य
बेखबर रहती बनावट से नही कर पाया
अपनत्व का संसर्ग
ओर यही सभ्य पात्रता
अभाव बनी जीवन मे
आत्म संतोष
नही हुआ जटिल इतना कि
न पहचान सकू स्व को
ओरों की तरह
सरल हैं यह जीवन
बहुत नमनीय द्रव्य की तरह
मौत सा जड जटिल
अहंकार शिला से मत ढको तन मन
कि तुम दिखते रहो
विशालकाय पर्वत
ओर असलियत मानव की
तौडती रहे दम
कि सजीव भी हो जाओ
निर्जीव बनकर
सूनेपन को छोडो तो
चेतन जीना भी हो ।
छगनलाल गर्ग ।