लादते रहता हर कोई
बोझ विचारों का
पुत्रों पर हर अवसर पर
लगने लगा बना रहे माहोल
धूमिल अस्मिता हो
पुत्रों की
ओर बन जाये दबाव
कि नही कर सके हिमाकत
सिर उठाकर विद्रोह की
बना रहे प्रभुत्व
पूर्व सा नही तो टाँग अडाने लायक
कुछ अस्तित्व रहे
दो विपरीत छोर अब हैं नासमझी पर
समझो एक दूसरे को
कही नही गहरा अंतराल
एक ही अंश के आकार मूर्त
असली फर्क बाहर का नही
भीतर भेद जानने की कंजूसी भरा
जानो थोडा
हो जाता यह आपसी जानना बहुत बडा
फिर इस धरा पर
पुत्र को पश्चिमी पुत्र समझने की
गलती छोडो ।
छगन लाल गर्ग ।
बोझ विचारों का
पुत्रों पर हर अवसर पर
लगने लगा बना रहे माहोल
धूमिल अस्मिता हो
पुत्रों की
ओर बन जाये दबाव
कि नही कर सके हिमाकत
सिर उठाकर विद्रोह की
बना रहे प्रभुत्व
पूर्व सा नही तो टाँग अडाने लायक
कुछ अस्तित्व रहे
दो विपरीत छोर अब हैं नासमझी पर
समझो एक दूसरे को
कही नही गहरा अंतराल
एक ही अंश के आकार मूर्त
असली फर्क बाहर का नही
भीतर भेद जानने की कंजूसी भरा
जानो थोडा
हो जाता यह आपसी जानना बहुत बडा
फिर इस धरा पर
पुत्र को पश्चिमी पुत्र समझने की
गलती छोडो ।
छगन लाल गर्ग ।
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