Thursday, May 5, 2016

आत्मसात

बहुत कहते हो
अनंत ऊँचाई लिए कथन
मुश्किल रहता
मेरे लिए शब्द ओर जुडे अर्थ को
आत्मसात करना
नही कर पाता केवल शब्द
चक्कर काटने लगते मस्तिष्क
नही देते कोई अर्थ
कि समझ पाऊँ
तुम्हारी ऊँचाई
अकथनीय उलझन पालने लगा
तुम्हारी ओर से
उतरो थोडा नीचे
आवाज बन सके धरातलीय
शायद शब्द तुम्हारे
दे सके अर्थ मनुष्य बन
अप्रचलित सत्य देते शब्द
यहां नही बिकेंगे
भावनाओ का सत्य
तुम्हारा आकाशीय
नही देता अर्थ जीवन
सामान्य बन कहो ना जीवंत
साफ सुथरा
मेरा तुम्हारा भाव रस घनत्व लिए
बहने लगे एक बार फिर
सुखा जीवन नद ।
छगन लाल गर्ग ।