Thursday, May 19, 2016

शांत,,,


घूंट एक जहर का भी पिलाने वाला नहीं ।
भूलू कैसे रे प्राण प्यारे स्मृति चित घेरे हुए हैं
विरह केवल विरह जीवन संसार सार हुआ हैं
काल के क्रूर प्रहार ने कसक जीवन पूरी दी हैं
याद ही हैं चेतना का विरहमय वैराग्य बनी हैं ।
मेरी जिन्दगी मे फूल तो खिलते निरंतर रहे हैं
कभी खुशबू से हमारा भी बाग महकता रहा हैं
बाग खाली मत कहना कहीं से सुगंध आती हैं
भरपूर न सही घनी खुशबू का आभास देती हैं ।
अगर तुम लेना चाहो हम अपना दर्द ही रखते हैं
मगर दर्द का अहसास कभी अपनो को हुआ हैं
क्यों देखते नहीं कभी आपके अपने ही हम हैं
उस दर्द की थाह मिले कैसे रूबरू होते नहीं हैं ।
अपार सुख कहते किसे हमे मालूम हैं
दुख अपार होते बखूबी हमने जाना हैं
हमें कोई कहता पहचान मिलती हैं
दिल को अनजाने मे राहत होती हैं ।
सुंदर चित सुंदर तन करिश्मा ईश्वर क्या करता हैं
कहते सुना शास्त्र निखिल प्रकृति का बखान देता हैं
सिमित दुनिया रही हमारी अनुभव घना नहीं पाये हैं
जो मिला संतुष्ट हुए असीम प्रेम से जीवन बिताते हैं ।
कैसे भूले अतीत का वह भी एक जमाना था
कभी आते लगता हकीकतसाथ ही साथ था
थोड़ा सा साथ हमारा पर हर पल साथ था
चुपके सेयादों को दौहराते जीवन बीता था।
मेरे अतीत कहीं हो तो आज सूनेपन का सहारा बन
घिरे हैं गहन उदासी मे आ विरानी से कर मुक्त मन
कहीं दिखता नहीं अपना ढूँढता रहा अब थका तन
हर किसी ने ठुकराया हैं आसरा तेरा चाहता जीवन ।
शायद यही कर्म का अंजाम हमे मिलता हैं
लायकियत मे जिन्दगी अपने सहारा देते हैं
कब रहे कायम वफा निभाई कभी किसी से हैं
मतलब ही जीये तमाम उम्र अब तो रोना ही हैं ।
थोड़ा कहना चाहता हूँ अगर तुम सुनो
खूब विनती करता हूँ काम काजी बनो
सहृदय हो कहता हूँ हमदर्द सच्चे सुनो
सत्य केवल रहता हैं सार केवल गुनो।
बहुत हिलमिल कर रहना विवेक शून्यता ही हैं
झूठ मूठ का जीवन जीना आज की आवाज हैं
दिखावे मे कमी अंदाज जीने का आता नहीं हैं
जैसे तुम हो दुनिया से छिपाना कला जीने की हैं ।
कहां से लाये खूबसूरत दुनिया के नजारे
हर पहरे लगे हैं ताकतवर जालिम हैं घनेरे
अब बदल दो इरादे मिले मे पा लो सितारे
खुद मे खूबसूरती दरिया दिल मे हैं प्यारे।
कहो मैं तुम्हारी आवाज कैसे बनूं
मैं दंभ भरता झूठा तना हूँ तनूं
हंसी मस्ती भरी आशक्त हो सुनूं
रूदन रूलायेगा कैसे मन मानूं।
आओ थोड़ा सा आराम कर ले
थके थके कदम आश्रय धरा ले
हौसले उफनते ठंडक कुछ मिले
छाया हमारी कहीं तपन न ले ले।
पंछी उड़ान अनजान दिशा हैं
पीर हैं गहरी सागर हलचल हैं
नीर अविरल नयन विरानी हैं
पंथी विवश भ्रमित भंवरमय हैं ।
बौझिल क्षण अपना भार पूरा ही दे दो
सामर्थ्य जीवन अपना पूरा ही बीता दो
हार जीत जीवन भर कैसे सहे जता दो
परिणाम पाकर जीये कैसे समझा दो।
रे मेरे दिल करू तो क्या करू बता दो
मिले कहां हैं बिछुडे क्या बात जता दो
खिले भी न थे मुरझा गये क्यों कह दो
गिले शिकवे का वक्त क्या होगा कह दो।
भावनाओं का क्या आती जाती हैं
लालसाओ का क्या नित रहती हैं
अनहोनी का आभास क्यों नहीं हैं
हादसे हमेशा बरबाद करते क्यों हैं ।
तुम गर न आते अच्छा रहता
बेमौत हमारा दिल नहीं मरता
बेदिल जीते कैसे तजुर्बा होता
गर कहीं ऐसा वाकया होता ।
अब जब सहना ही हैं तो कुछ ओर गम दे दो
कम हैं अहसास दुनिया के गम ढेरों हमें दे दो
गम तेरा शून्य पवन सा भ्रमित जीवन ही दे दो
अचेतन जीवन जीऊं कैसे कुछ मर्म समझा दो।
हे प्राण तुम कहते रहे हम कहां समझ पाये
आसरा देते कभी अपनी भी नहीं कर पाये
मेरा काम करते थकते हुए भी कह न पाये
हे मेरे धन यकायक रूठे भूल जान न पाये।
किसे सुनाऊ कथा विरह सनी
कह जाते तो विपदा रहती बनी
उम्र भर का दर्द हैं करूणा घनी
मरण जीवन मध्य अब तनातनी।
मिलोगे न ऐसा आश्वासन देते
खिलोगे न फिर खुशबू बिखेरते
रिझाना न अपनी सामर्थ्य लेते
वियोगी हूँ चित दशा ध्यान देते।
यह जन्म मानव का पाया रहा कोरा
सहकार रहा मन का पर आधा अधूरा
हाय ढह गया सपनों का सुंदर सवेरा
महका सुगंध पल भर हैं जीवन बसेरा।
कभी इधर कभी उधर हृदय भ्रमित सा क्यों हैं
कभी हर्ष कभी विषाद मायाजाल घिरा क्यों हैं
कभी हंसना कभी रोना बदला बदली ही क्यों हैं
कभी तेरा कभी मेरा यह फिसलन घनी क्यों हैं ।
रात ओर दिन का भी अपना मकसद लगता हैं
उठना फिर बेठना बेमकसद नहीं हो सकता हैं
चलना फिर रूकना क्या स्वतः ही चलता हैं
मकसद आना जाना भिन्न कैसे हो सकता हैं ।
पाप का इजहार करूं भी कैसे
धिक्कार जीते हुए मैं सुनूंगा कैसे
हिम्मत कहां मिले सुनने की ऐसे
बाकी रहा जीवन जीने का कैसे ।
हृदय अहसास भी अब पक फोडा बना हैं
घने विकारो से हैं भरा घडा जर्जर हुआ हैं
हम संभाले कैसे क्षमता अब कहां रही हैं
फूटे बिखरे धरातल पडा विरानी घनी हैं ।
हृदय हीनता ही अब क्यों संबल जीने का बनी हैं
मानव मन भाव धारा सुखी नदी सम दिख रही हैं
कलकल ध्वनि ऊपर परत पर परत छा गयी हैं
तृप्ति दायक नीर रस मादक रसातल खो गया हैं ।