विराग राग
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कब तक पुकारूं अब गला रूंघ गया हैं
किसे सुनाऊं कथा श्रौता बिखर गये हैं।
मधुर मधुर मेरे जलते दीपक
तुफान घनेरा जल ना सके तुम
बिखरा सारा प्रकाश समूह कही
ढूँढ ना पाये बिखर गये हम।
विकराल काल का कैसा तांडव
भय भाल भूतल भीषण ठहराव
विराग राग विषम विपक्ष कलरव
कोमल गात प्रहार कठोर फैलाव।
पुकार कोई सुन सके आसरा कोई बन स्वीकारे।
विरान हैं संसार सारा सुने कौन किसे पुकारे।।
नमन जीवन काल समर्पित
नमन सार संसार समर्पित
नमन देहमन प्राण समर्पित
नमित भाव संसार समर्पित ।
तेरे बगेर यह जान न पाया
महक मन तेरी बस गयी हैं
तू नहीं मेरे पर झलक तेरी
प्राण पण मे समा गयी हैं ।
अति मोहित जग जाल मेरा।
लिपट गया अब राग घेरा।।
परमेश्वर अब शरणागत हूँ ।
शरण रज रूपांतरण चाहूँ ।।
अधम पापी अधम कर्मी राग द्वेष का पुतला मैं
सकल जीवन के करतब घृणित झूठा फरेबी मैं
काल समय का कर आभास थोड़ा सा चेता हूँ मैं
परमेश्वर शरणार्थी तेरा शरण जगह चाहता हूँ मैं ।
कमल कोमल पांखूरी तन नव पल्लवित मधुकर मन।
सारे जहां रूपमय संचित आकाश असीम छोर यौवन ।।
डगर डगर यादों के झौके नित दिन तेरी याद दिलाते ।
कुछ कह जाते जाने वाले बना सहारा जग मे जी लेते।।
जीवन खंडित हो गया हैं
कोमल सपना टूट गया हैं
शिथिल शरीर हो गया हैं
अचेतन जीवन हो गया हैं ।
राह का भ्रमित राही भटकाव ही का सार लेकर ।
मान बेठा जीवन ही को सुख का आगार जी भर ।।
आज मन बेताब हैं क्यों चैतन्यता जड़ जात हैं क्यों ।
प्राण तडप बढ रही निरंतर मौत का आगोश हो ज्यौ।।
काली घनी घटा घनघोर
घायल तन मन कमजोर
शीतल कंपित देह जर्जर
विकल चित कंपन थरथर।
बड़ी भयंकर रात काली सुझता नहीं कोई किनारा ।
रहूं कैसे हर जगह पर तांडव भय का हैं नजारा ।।
छोड चुका सब आस नहीं हैं
कहीं पर कोई रसधार नही हैं
विपदा घनी तारनहार नहीं हैं
जग थोथा कोई सार नहीं हैं ।
आखिर हे राम तेरा सहारा सभी खोये संसार हैं गहरा।
गोते लगा लगा कर हारा पार न पाऊं तू ही सहारा ।।
मैं अज्ञानी दंभ का मारा मिले तेरी राह का किनारा ।
नाम ही जानूं प्रभु तुम्हारा नाम नाव का केवल सहारा ।।
कितने जन्मों से भटक रहा हूँ
गिनती नहीं प्रभु जान सका हूँ
नीज अहंकार छ्दम् छलता हूँ
सरल जीवन जी नहीं सका हूँ
भेद अपना जग से छिपाकर
बहुरूप बना घूमा पर हितकर
कर्म मेरे ओछे चाल तामस कर
प्रभु भार बन चुका पुरा धरा पर।
नाथ अब शरण तुम्हारी जैसा भी हूँ करो रखवारी
शरण रज बना कर दया करी अब चितवन नाथ तुम्हारी।
पीर नीर झकझोर गया हैं जग विहार उजड गया हैं
नहीं पहचान पवन सा गला हैं उमडा अभी बरस गया हैं ।
चल आगे अब अबोध जीवन वेदना चल तू बन जा सहारा
पार तेरे निशा का गहन तम विकसित हुआ झरता सवेरा।
आज आस बस हम हुई हैं
मानस का तम साथ हुआ हैं
अभिसार कामना नाश हुई हैं
मन सरल सारथी बना हुआ हैं ।
पांव धरा पर जमते नहीं हैं उठना किस विध हो सकेगा
काम जरा सा सहारा नहीं हैं हिम तरलवत कैसे होगा ।
दीप मंदिर जग झंझावत से जगमग सा पर डौल रहा
तेज हवा की कठोरता से अरमान बुझ गये संचय रहा।
बुझे जीवन दीप सा पर काल तेरे वश ही रहा
भाव अलि सिंगार बन तेरा आज समर्पित ही रहा।
मिटकर धूल बन गया हूँ कण कण से मिल गया हूँ
नामोनिशान मिटा गया हूँ सार धरातल बन गया हूँ ।
बोल अन बोल हो गया हैं मोल जीवन खो गया हैं
गोल घेरा घिर गया हैं रे जीवन अब तू मिट गया हैं ।
चेतन सारा खो गया हैं भाव कोमल खो गया हैं
आग ताप आ गया हैं झुलस जीवन बुझ गया हैं ।
बोल कहां सब खो गया हैं अतीत सारा छीन गया हैं
लूट संसार मेरा गया हैं खाली संसार छोड़ गया हैं ।
खालीपन कसक रह गयी हैं निशा अवसाद घिर गया हैं
झील का गहरापन रह गया हैं बहाव सपना गुम गया हैं ।
भार भारी भूल भारी भोगता रहा
छल जल मय चंचल आँचल रहा
मन मोहित मर्दन बन मशाल रहा
पर सत सार चेतना विलग रहा।
ठीक ठंडी ठांव ठहरे पास कैसे
डिग रही डाल डगमग डोली ऐसे
घर घनेरी घाट पर घन घेरे जैसे
होता विटप विकट वार प्रहार कैसे ।
काल के कराल का करार जीवन
नेह नीरज निशा निर्मित नार ऐसे ।
लपेट लेता लालिमा को अंगार सम
मन मनोज मार तन टूटता हो जैसे ।।
वाह वहीं वात्सल्य वचन वाहक
चंचल चंदन सम चितवन धारक
बाल बचपन बहुत बढते नाहक
तेरा मेरा मेल हैं मोहक अमोलक।
देखते ही झलक तेरी धमनियां प्रवाहित मेरी
नेह गति तीव्र होकर प्राणों की संगीत लौरी।
विरह जीवन दे गया हैं मोह बंधन तोड़ गया हैं ।
काल कौर छोड़ गया हैं बुढ़ापा वेरी हो गया हैं ।।
प्रेम विरल बन बह गया हैं ।
सुखा मरूस्थल रह गया हैं ।।
काल तेरे रूप घनेरे ललनाओ के ललित फेरे।
मन मोहक जाल हैं घेरे बाल भोले मोहक हैं तेरे ।
अबोध आखिर आगोश तेरे बोध जड बहु काल तेरे ।
नजर उठाकर घेरा तेरा होता श्वास फिर अवरुद्ध मेरे ।।
काल लिप्त यह जीवन हो गया हैं
राग संसार शून्य वेराग हो गया हैं
तनिक मोह जीवन नही रह गया हैं
संसार भारमय घना बोझ हो गया हैं ।